देवनागरी वर्णमाला का प्रथम अक्षर। कंठ्य वर्ण। मूल व्यंजनों का स्वतंत्र उच्चारण इस अक्षर की सहायता से होता है।
निषेधात्मक उपसर्ग; जैसे-अरूप, असुंदर।
अदभुत राम-नाम के अंक १-९०
जोग जुगुति, जप, तप, तीरथ-ब्रत इनमे एको अक न भाल----१-१२७।
अक भरि लीन्हों, लीन्हो अंक भरी :- हृदय से लगा लिया, गोद में ले लिया। उ.- (क) पुत्र-कबन्ध अंक भरि लीन्हों धरति न इक छिन धीर-१-२९। (ख) धन्य-धन्य बड़भागिनि जसुमति निगमनि सही परी। ऐसे सूरदास के प्रभु कौं लीन्हों अंक भरी--१०-६९।
अंक भरि लेत :- छाती से लगा लेते हैं, गोद में लेते हैं। उ.- छिरकत हरद दही हिय हरषत, गिरत अंक भरि लेत उठाई–१०- १९।
अंक भरै :- गोद में लेती है, दुलार करती है। उ.- जैसे जननि जठर.अन्तरगत सुत अपराध करे। तौऊ जतन करै अरु पोषे निकसे अंक भरे-१-११७।
आनंदित ग्वाल-बाल, करत बिनोद ख्याल, भरि-भरि धरि अंकम महर के-१०-३०।
(क) ग्वालनि देखि मनहिं रिस काँपै। पुनि मन मैं भय अंकुर थापै-५८५।
(ख) अदभुत रामनाम के अंक। धर्म अँकुर के पावन द्वै दल मुक्ति-वधू ताटंक---१-९०
अंकुर फोड़ना, उगना, उत्पन्न होना।
अंखुवाया हुआ, जिसमें अंकुर हो गया हो।
उत्पन्न हुए, उगे, प्रकटे।
(क) अंकुरित तरु-पात, उकठि रहे जे गात, बन-बेली प्रफुलित कलिनि कहर के-१०-३०।
(ख) फूले फिरैं जादौकुल आनँद समूल मूल, अंकुरित पुन्य फूले पछिले पहर के-१०.३४।
हाथी को हाँकने का टेढ़ा काँटा, अंकुश।
न्यारो करि गयंद तू अजहूँ, जान देहि का अंकुस मारी-२५८९।
मन बस होत नाहिने मेरैं।…..। कहा कहौं, यह चऱयौ बहुत दिन, अंकुस बिना मुकेरैं--१-२०६।
ईश्वर के अवतार राम, कृष्ण आदि के चरणों का एक चिह्न जो अंकुश के आकार का माना जाता है।
ब्रज जुवती हरि चरन मन वै। ….। अंकुस-कुलिस-बज्र-ध्वज परगट तरुनी-मन भरमा ए-६३१।
(क) खेलत कहूँ रहौं मैं बाहिर, चितै रहहि सब मेरी ओर। बौलि लेहि भीतर घर अपने, मुख चूमति, भरि लेतिं अँकोर-३९८।
(ख) झूठे नर कौं लेहि अँकोर। लावहिं साँचे नर को खोर-१२-३।
अंकम भरि - छाती से लगाकर। उ.- हँसि हँसि दौरे मिले अंकम भरि हम-तुम एकै ज्ञाति १०-३६।
अंकम भर्यौ :- [भूत.] (स्नेहवश) छाती से लगाया, गले लगाया। उ.- (क) माता ध्रुव को अकम भर्यौ-४-९। (ख) कबहुँक मुरछित ह्वे नृप परयौ। कबहुँक सुत को अंकम भर्यौ--६-५।
अंकम भरि लेइ :- अपने में लीन करती है। उ.- संत दरस कबहूँ जो होइ। जग सुख मिथ्या जानै सोइ। पै कुबुद्धि ठहरान न देइ। राजा को अंकम भरि लेइ ४-१२।
अंकम लैहै :- [भवि.] गोद में लेगा। उ.- अब उहि मेरे कुँअर कान्ह को छिन-छिन अंकम लैहे २७०५।
आलींगन,परि रंभण, गोद, गले लगाना।
सूर स्याम बन तें ब्रज आए जननि लिए अँकमाल-२३७१।
दै अंकमाल :- आलिंगन करके, गले लगाकर, गोद लेकर। उ.- जुवति अति भई बिहाल, भुज भरि दै अंकमाल, सूरदास प्रभु कृपाल, डार्यो तन फेरी--१०-२७५।
अंकवार भरत :- आलिंगन करते हैं, गले या छाती से लगाते हैं। उ.- (सखा) बनमाला पहिरावत स्यामहिं. बार-बार अँकवार भरत धरि-४२९।
भरि धरौं अँकवारि :- छाती से लगा लूँ, आलिंगन कर लूँ। उ.- कोउ कहति, मैं देखि पाऊँ, भरि धरौं अंकवारि-१०-२७३।
भरि दीन्हीं (लीन्ही) अँकवारि :- छाती से लगा लिया। उ.- (क) झूठे हि मोहिं लगावति ग्वारि। खेलत तैं मोहिं बोलि लियौं इहि, दोउ भुज भरि दीन्हीं अँकवारि-१०-३०४। (ख) बाहँ पकरि चोली गहि फारी भरि लीन्ही अँकवारि-१०-३०६। (ग) सूरदास प्रभु मन हरि लीन्हों तब जननी भरि लए अँकवारि-४३०।"
नैन मूंदति दरस कारन स्रवन सब्द बिचारि। भुजा जोरति अंक भरि हरि ध्यान उर अंकवारि-७८१।
कनक कलस मधुपान मनौ कर भुज निज उलटि धसी। ता पर सुंदरि अंचर झाँप्यो अंकित दंस तसी-सा. उ. २५।
अँगोछे या कपड़, से पोंछकर।
उत्तम बिधि सौं मुख पखरायौं ओदे बसन अँगौछि-१०-६०९।
अति सरस बसन तन पोंछ। ले कर-मुखकमल अँगोछे-१०-१८३।
अनेक अँगोछे या देह पोछने के कपड़े।
(क) कछु कछु खाई दूध अँचयौ तब जम्हात जननी जाने-१०-२३०।
(ख) ग्वाल सखा सबहीं पय अँचयौ---३९६।
भोजन के पश्चात हाथ-मुँह धोकर कुल्ली की।
अंचल, आँचल, साड़ी का छोर, पला।
निकट बुलाइ बिठाइ निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ---९-८३।
(क) जसुमति मन अभिलाष करै। कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै---१० - ७६।
(ख) अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पिलावति---१०-११०।
साड़ी का छोर, आँचल, पल्ला।
(क) इतनी कहत, सुकाग उहाँ तें हरि डार उड़ि बैठ्यौ। अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यौ, सुख जु अनि उर पैठ्यौ-९-१६४।
(ख) तेजु बदन झाँप्यौ झुकि अचल इहै न दुष मेरे मन मान-सा ० उ० १५।
लोचन सजल, प्रेम पुलकित तन, गर अंचल, कर-माल---१-१८९।
सप्त ऋषियों में से एक, जिनकी गिनती दस प्रजापतियों में हैं। थे ब्रह्मा के पुत्र थे;अनुसूया इनकी स्त्री थी जिससे तीन पुत्र हुए-दत्तात्रेय दुर्वासा और सोम।
[सं. अति == अधिक + उत्थ = उटा हुआ]
[सं. अ = नहीं + हिं. तोड़]
भृंग मिले भारजा बिछुरी जोरी कोक मिले उतरी पन च अब काम के कमान की। अथवत आए गृह बहुरि उवत भान उठौ प्राननाथ महा जान मनि जानकी----१६०९।
[सं. अस्तमन = डूबना, प्रा, अत्थवन]
[सं. अस्तमन = डूबना, प्रा, अत्थवन]
लुप्त होना, नष्ट होना, चला जाना।
वियोजक अव्यय जिसका प्रयोग उस स्थान पर होता है, जहाँ कई शब्दों या पदों में से केवल एक को ग्रहण करना हो। या, वा, किंवा।
जंघनि कौं कदली सम जानै। अथवा कनक खंभ सम मानै-३-१३।
[सं. स्थायि = जगह, पा. ठानीय | प्रा. ठाइअँ]
[सं. स्थायि = जगह, पा. ठानीय | प्रा. ठाइअँ]
गाँवों में पंचायत की जगह।
[सं. स्थायि = जगह, पा. ठानीय | प्रा. ठाइअँ]
[सं. अस्तमन, प्रा. अत्थवन, हिं. अयवना]
[सं. स्थ राई =स्थिर, हिं. अथान, अयाना]
निबुआ, सूरन, आम, अथानों और कराँदनि की रुचि न्यारी---१०-२४१।
[सं. अस्तमित-डूबा हुआ. प्रा. उत्थवन अथाना]
[सं. अ= नहीं + स्था= ठहरना, अथवा अगाध]
मन-कृत-दोष अयाह तरंगिनि, तरि नहिं सक्यौ, समायौ। मेल्यौ जाल काल जब खैंच्यो, भयौ मीन जल-हायौ--१-६७।
[सं. अ= नहीं + स्था= ठहरना, अथवा अगाध]
अपरिमिति, अपार, बहुत अधिक।
(क) सूरज-प्रभ गुन अथाह धन्य धन्य श्री प्रियानाह निगमन को अगाध सहसानन नहिं जानै २५५७।
(ख) बिरह अथाह होत निसि हमकौं बिन हरि समुद समानी--२७९६।
[सं. अ= नहीं + स्था= ठहरना, अथवा अगाध]
जिसकी थाह न हो, जिसकी गहराई का अंत न हो, अगाध।
तुम जानकी जनकपुर जाहु। कहा आनि हम संग भरमिहौ गहबर बन दुख-सिंधु अथाहु-९-२३।
[वि. सं.अ = नहीं + सं. स्तोक, पा. थोक, प्रा. थो =हिं. थोड़ा]
जो थोड़ा न हो, अधिक, बहुत।
नीति बिन बलवान सीषत नीक जानन जोर। काज आपन सभुझ कैं किन करैं आप अथोर-सा ६१।
विलझण, विचित्र, अनूठा,अपूर्व।
(क) अदभुत राम नाम के अंक-१.९०।
(ख) देखौ यह बिपरीत भई। अदभुत रूप नारि इक आई, कपट हेत क्यौं सहैं दई-१०-५३।
(ग) ये अदभुत कहिबे न जोग जग देखत हीं बनि आवै--सा. ४।
(घ) गृह तैं चलौ गोष कुमारि। बरक ठाढ़ौ देख अदभुत एक अनूपम मार--स.१४।
[सं. अदलपति = शिव + रिपु (शिव का शत्रु = काम = प्रद्युम्न) + पिता (प्रद्युम्न का पिता = कृष्ण ) + पत्नी (कृष्ण की पत्नी =यमुना)]
अदलपति-रिपुपिता-पतिनी अब न जह फेर----सा , ११६।
चतुर, काइयाँ, चालबाज, निर्दयी।
सेवत सगुन स्याम सुन्दर को लही मुक्ति हम चारो। हम सालोक्य सरूप, सरोज्यो रहत समोर सह ई। सो तजि कहत और की औरै तुम अलि बड़े अदाई-३२९०।
जो दानी न हो, जिसने कुछ किया न हो, कृपण।
हरि कौ मिलन सुदामा आयौ। …..'। पूरब जनम अदात जानिकै तातौं कछ मँगायौ। मूठिक तंदुल बाँधि कृष्ण की बनिता बिनय पठायौ---६ ० उ.--६५।
न देनेवाला, कृपण व्यक्ति।
न देनेवाला, कृपण व्यक्ति।
[ज्ञं अ = नहीं + फा. दाना == जाननेवाला]
[सं. अ = नहीं + दाम = रस्सी या बधन] कठिनाई, असमंजस।
प्रजापति की पुत्री जो कश्यप ऋषि की पत्नी और सूर्य आदि तेंतीस देवताओं की माता थी।
दक्ष की कन्या के गर्भ स उत्पक्ष तेंतीस देवता।
कुदिन, कुसमय, दुर्भाग्य।
[सं. अ = नहीं + दृष्टि = विचार (अथवा अदृष्ट= भाग्य )]
[सं. अ = नहीं + दृष्टि = विचार (अथवा अदृष्ट= भाग्य )]
[सं. अदृष्ट, प्रा. अदिट्ठ]
बिना देखा हु आ , आतदेखा, गुप्त।
[सं. अ = नहीं + सं. दीर्घ, या दोघ, प्रा. दीह]
[स, अद्वद्व, प्रा. अदुं द]
[स, अद्वद्व, प्रा. अदुं द]
[स, अद्वद्व, प्रा. अदुं द]
जिसका ज्ञान इंद्रियों को न हो, अगोचर।
काका नाम बताऊँ तोकौं। दुखदायक अदृष्ट मम मोकौं--१-२९०।
(क) बछरा भए। अदृष्ट कहूं खोजत नहि पाए---४९२।
(ख) उ.---जब रथ भयौ अदृष्ट अगौचर लोचन अति अकुलात २८६१।
[सं. आदेश = आज्ञा, शिक्षा]
[सं. आदेश = आज्ञा, शिक्षा]
निर्दोष, निष्कलंक, दूषणहीन
चंपकली सी नासिका राजत अमल अदोस---२०६५।
आश्चर्यजनक, विचित्र, अनोखा, अनूठा।
रूप मोहिनी धरि ब्रज आई। अद्भुत साजि सिंगार मनोहर, असुर कंस दै पान पठाई--१०-५०।
उर-कलिंद तैं धँसि जल-धारा उदर धरनि परवाह। जाहि चली धारा ह्वै अध कौं नाभी-हृद अवगाह--६३७।
(क) तामै एक छबीलौ सोरग अध सारंग उनहारि। अध सारँग परि सकलई सारग अब सारँग बिचारि-सा. उ-२। भादौं कौं अधराति अँध्यारी --१०-११।
जैवत रुचि अधिको अधिकैया--२३२१।
[सं. अर्द्ध = आषा + हिं. घटना == पूरा उतरना।]
जिसका ठीक अर्थ न निकले, अटपटा।
जिसने पेट भर खाया न हो, अधखाया।
सूर-स्याम बलराम प्रातहीं अधजेंबत उठि धाए---४५४।
[सं. अर्द्ध, प्रा. अद्ध, हि, अध = आधा + पर (प्रत्य.)]
आधे मार्ग में, बीच ही में।
हम सब गर्व गँवारि जानि जड़ अध पर छाँड़ि दई--३३०४।
(क) अब मोसौं अलसात जात है। अधम-उधारनहारे हो-१-२५।
(ख) अध कौ मेरु बढ़ाइ अधम तू, अंत भयौ बलहीनौ-१६५।
कहा कहौं हरि केतिक तारे पावन-'पद परंतगी। सूरदास यह बिरद सवन सुनि गरजत अघम अनंगी--१.२१।
[सं. अधम + हिं. ई (प्रत्य.)]
( क ) औरनि कौं जम कैं अनुसासन कोटिक धावैं। सुनि मेरी अपराध-अधमई, कोऊ निकट न आवैं---१-१९७।
(ख) सूरस्याम अधमई हमहिं सब, लागैं तुमहिं भलाई-१०४९।
( क) हुतीं जिती जग मैं अधमाई सो मैं सबै करी-१-१३०।
(ख) अधम की जौ देखौ अधमाई। सुनु त्रिभुवन पति, नाथ हमारे, तो कछु कह्यौ न जाई--१-१८।
(ग) नैना लुब्धे रूप को अपने सुख मई।.…. मन इंद्री तहाँई गए कीन्ही अधमाई---पृ० ३२३।
[सं. अधोमुख = नीचे की ओर मुह किए]
स्याम भजनि की सुंदरताई।…...। बड़े बिसाल जानु लौं परसत, इक उपमा मन आई। मनौ भुजंग गगत तैं उतरत बधमुल रह्यो झुलाई----६४१।
[सं. 'अ = नहीं + धृ== धरना]
पाप, असद्व्यवहार अन्याय, कुकर्म।
[सं. अर्द्ध = आधा + रात्रि]
(क) उस पर देखियत ससि सात। सोवत हुती कुँवरि राधिका चौंकि परी अधर--सा. उ.। २६।
(ख) तब ब्रज बसत बेनु रव धुनि करि बन बोली अधरातनि-३०२५।
भालै जवाक रंग बनानी अधरैं अंजन परगट जानी---१९६७।
पाप, पातक, अन्याय, दुराचार,।
नैन अनीन, अधर्मिन कै बस, जहँ कौ तहाँ छयौ---१-६४।
( क ) एक अधार साधु-संगति कौ, रचि पधि मति सँचरी। याहूँ सौंज संजि नहि राखी, अपनी धरनि धरी--१-१३०।
( ख ) दोनदयाल, अवार सबनि के परम सुजान, अखिल अधिकारी---१-२१२।
( ग ) अबऊ अधार जु प्रान रहत है, इन बसहिन मिलि कठिन ठई री--२७८९।
हरि परीच्छितहिँ गर्भ मॅझार। राखि लियौ निज कृपा-अधार-१-२८९।
अश्रय, सहारा, अवलंब। यौं-प्रानअधारा--प्रान के अधार, परम प्रिय।
ताजे मैं पाती लिखी तुम प्रान अधारा--१० उ. ८।
रवि-ससि-ज्योति जगत परिपूरन, हरति तिमिर रजनी। उड़त फूल उड़गन नभ अंतर, अंजन घटा घनी-२-२८।
हनुमान की माता अंजना जो कुंजर नामक बानर की पुत्री और केशरी की स्त्री थी।
दोनों हथेलियों को मिलाकर बनाया गया संपुट, अंजुली।
अजुली में भरा हुआ जल आदि द्रव अथवा अन्य वस्तु।
प्यारी स्याम अंजली डारै। वा छबि कौ चित लाइ निहारै। मनो जलद-जल डारत ढरै-१८४४।
अंजन, सुरमा या काजल लगवाकर।
दोऊ अलबेले बने जु आए आँखि अँजाइ--२४४२।
आपुन हँसत पीत-पट मुख दै आए हो आँख अँजाय-२४४६ (३)।
दोनों हथेलियों को मिलाकर बनाया हुआ संपुट।
हथेलियों को मिलाने से बना हुआ संपुट।
सिर पर मीच, नीच नहिं चितवत, आयु घटति ज्यौं अजुलि पानी---१-१४९।
काठ के डंडे में लगा हुआ साधुओं का पीढ़ा।
( क ) अब यह ज्ञान सिखावन आए भस्म अधारी सेव–२९८३।
( ख) सृङ्गी भस्म अधारी मुद्रा दै यदुनाथ पठाए-३०६०।
(ग) दंड कमंडलु भस्मं अधारी तौ युवतिन कहुँ दीजै----३११७।
(घ) सीगी मुद्रा भस्म अधारी हमको कहा सिखावत-३२१८।
यात्रियों के सामान का झोला।
सहारा देनेवाली, प्रिय, भली।
मम आ-घटा, मोह की बूँदे, सरिता मैन अपारौ। बूड़त कतहुँ थाह नहिं पावत, गुरुजन-ओट-अधारौ----१-२०९।
प्रानअधारो-प्राण की आधार, प्राणप्रिय।
सूरदास प्रभु तिहारे मिलन कौ भक्तन प्रान अधारो पृ. ३५१।
[सं. अर्द्ध = आधा + आबर्त = चक्कर]
औटाने पर गाढ़ा होकर आधा रह जानेवाला।
खोवामय मधुर मिठाई। सो देखत अति रुचि पाई। कछु बलदाऊ कौं दीजै। अरु दूध अधावट पीजै---१०-१८३।
छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवन तै अधिक धायौ-१-५।
करत भोजन अति अधिकई भुजा सहस पसारि ९२९।
[सं. अधिक + हिं. आई (प्रत्य.)]
[सं. अधिक + हिं. आई (प्रत्य.)]
(क) स्रवनिन की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि-कथा सुधा-रस पावै–२-७।
(ख) देखौ काम प्रताप अधिकाई। कियौ परासर बस रिषिराई---१-२२९।
(क) राधे तेरे रूप को अधिकाई। जो उपमा दीजै तेरे तन तामें छवि न समाई-स. उ. १९।
(ख) इकटक नैन टरै नहिँ छबि की अधिकाई-पृ. ३१८।
[सं. अधिक + हिं. आई (प्रत्य.)]
जब लौं एक दुहौगे तब लौं चारि दुहौंगो, नंद दुहाई। झूठहि करत दुहाई प्रातहिं देखहिंगे तुम्हरी अधिकाई-६६८।
(क) यह चतुराई अधिकाई कहाँ पाई स्याम बाके प्रेम की गढ़ि पढ़े हो यही--२००८।
(ख) सोवत महा मनो सुपने सखि अवधि निधन निधि पाई।•••••••। जो जागौँ तो कहा उठि देखौँ बिकल भई अधिकाई-२७८४।
अधिक किया, बढ़ाया, वृद्धि की।
सूरदास-प्रभु-पान पर सि नित, काम-बेलि अधिकाए-६६१।
अधिक होता है, वृद्धि पाता है।
सारँग सुत छवि बिन नथुनी-रस बिंदु बिना अधिकात----सा, ५२।
बड़ी, अधिक हुई, वृद्धि पाई।
(क) महा दुष्ट लै उडयो गोपालहिँ, चल्यौ अकास कृष्न यह जानी। चापि ग्रीव हरि प्रान हरे, दृग-रकत-प्रवाह चल्यौ अधिकानी-१०-७८।
(ख) देखते मूर अग्नि अधिकानी, नभ लौं पहुँची झार--५९३।
कार्यभार प्रभुत्व, आधिपत्य।
[सं. अधिकारी + नि (प्रत्य.)]
योग्य या उपयुक्त व्यक्ति।
धर्म-कर्मअधिकारिन सौं कछु नाहिंन तुम्हरौ काज। भू-भर हरन प्रगट तुम भूतल, गावन सत-समाज---१-२१५।
[सं. अधिकारिन हिं. अधिकार]
(क) दीनदयाल अधार सबनि के, परम सुज्ञान अखिल अधिकारी---१-२१२।
(ख) कान्ह अचगरयौ देत लेहु सब आँगनवारी। कापहि भागत दान भए कबते अधिकारी---१११०।
[सं. अधिकारिन हिं. अधिकार]
योग्यता रखनेवाला, उपयुक्त पात्र।
(क) ऊधो कोउ नाहिंन अधिकारी। लैं न जाहु यह जोग अपनो कत तुम होत दुखारी ३२९१।
अधिकारी की ठसक या ऐंठ, गर्व।
जब जान्यौ ब्रज देव मुरारी। उतर गई तब गर्व खुमारी। ब्याकुल भयौ डर्यौ जिंय भारी। अनजानत कीन्ही अधिकारी-१०६६।
मैं तोहिँ सत्य कहौं दुरजोधन, सुनि तू बात हमारी। बिदुर हमारौ। प्रानपियारौ, तू विषया-अधिकारी-१-२४४
लोचन ललित कपोलनि काजर, छबि उपजति अधिकारी---१०९१।
हम तुम जाति-पाँति के एकै, कहा भयौ अधिकी द्वै गैयां---७३५।
जेंवत रुचि अधिको अधिकैया-२३२१।
हमरे तौ गोपतिसुत अधिपति बनिता और रनते--सा० उ० ३४।
प्रकृति को जड़ से चेतनावस्था प्राप्त करानेवाला, ईवर।
अब हौं माया हाथ बिकानौ।........। हिंमा-मद-ममता -रस भूल्यो, आसाहीं लपटानौ। याही करत अधीन भयौ हौं निंदा अति न अघ, नौ---१-७४।
परवशता, परतन्त्रता, अज्ञाकारिता।
पीछे ललिता आगे स्यामा प्यारी तो आगे पिय मारग फूल बिछावत जात ….। सूरदास-प्रभू की ऐसी अर्धीनता देखत मेरे नैन सिरात--२०६८।
[सं. अधीन + ना (प्रत्य.)]
आयु बँधार पुंजि लै सौंपी हरिरस रति के लीने। ज्यौं डोरे बस गुडी देखियत डोलत सम
अधीने–पू० ३३५।
आश्रित, आज्ञाकारी, दबैल, वशीभूत।
हरि तुम बलि कौं छली। कहा लीन्यौ। बाँधन गए, बँधाए अपनु, कौन सयानप कीन्यौ ? लए लकुटिया द्वारै ठाढ़े, मन अति रहत अधीन्यौ---१-१५।
अक्षित , वशीभूत, आज्ञाकारी।
जा दिन ते मुरली कर लीन्ही।…..। तब ही ते तनु सुधि बिसराई निसि दिन रहति गोपल अधी-ही-२३३५।
धैर्यर हित, बेचैन, व्याकुल।
(क) जोरी मारि भजल उतही कौं, जात जमुन कै तीर। इक धावत पाछैं उनहीं के पावत नहीं अधीर-५३४।
(ख) नैंन सारंग सैन मोतन करी जानि अधीर--सा ० ४४।
अधीरता, व्याकुलता , उद्विग्तता।
अपूर्ण खंडित, अधकचरा, अकुशल, अकेला।
मन वाचा कर्मना एक दोउ एकौ पल न बिसारत। जैसे मीन नीर नहिं त्यागत ए खंडित ए पूरन। सूर भ्याम स्यामा दोउ देखौ इत उत कोऊ न अधूरन--पृ० ३१५।
नीचा मुँह किए हुए. मुँह लटकाए हुए।
गर भ-बास दस मास अधोमुख. तहं न भयो विश्राम--१-५७।
बेसुध होना सुधबुध भुलाना।
अंगरहित, बनी देह का, अशरीर।
सूरद' स यह बिरद स्रवन सुनिं, गरजत अधम अनंगी १-२१।
एहि थर बनी कीड़ा गज-मोचन और अनंत कथा स्रुतिं गाई-.-१-६।
[सं. अनंन + हिं. नि. (प्रत्य.)]
फिर-फिरि जोनि अनतनि भरम्यौं, अब सुख-सरन परयौ--१-१५६।
(क) चौक चंदन लीपिकै, धरि आरती सँजोइ। कहति घोषकुमारि, ऐसौ अनँद जौ नित होइ-१०-२६।
(ख) बिविध बिलास अनंद रसिक सुख सूरस्थाम तेरे गुन गावति----सा. उ. १३
(ग) यह छबि देखि भयौ अनंद अति आपु आपुर्ने ऊपर वारी-सा ९८।
आनंदित, प्रसन्न, हर्षयुक्त।
बोल न बोलिए ब्रजचद। कीन है सतोष है सब मिलि, जानि आप अनंद-सा. ५६।
आनंदित होना, प्रसन्न होना।
कह्यो जुधिष्ठिर सेवा करत। तातै बहुत अनंदित रहत-१-२८४।
[सं. अन् = नहीं + अहं = पाप = विघ्न =बाधा]
जैसे बने गिरिराज जू तैसो अन को कोट। मगन भए पूजा करौं नर नारी बड़ छोट–९११।
वह जिसका ईश न। हो, परमात्मा, कृष्ण।
दधिसुत बाहन मेखला लेके बैठि अनईस गनोरी-सा, उ, ५२।
सुनि सखी सूर सरबस हरह्यो साँवरै', अनउतर महरि कै द्वार ठाढ़ो-१०-३०७।
अनुपयुक्त ऋतु, अकाल, असमय।
जातैं परयाै स्यामधन नाउँ। इतने निठुर और नाहँ काऊ कविं गावत उपमान। चातक की रट नेह सदा, वह ऋतु अनऋतु नहिँ हारत-पृ० ३३०।
[सं. आकणं, प्रा. आकणन, हिं. अकनना, अनकना]
[सं. आकणं, प्रा. आकणन, हिं. अकनना, अनकना]
[से अकर्ण, प्रा. आकणन हिँ. अकनना, अकनना]
छिपे-छिपे या चुपचाप सुनकर।
अनकनि दिए :- चप रहकर, चुपचाप सुन कर। उ.- सूरदास प्रभु त्रिय मिलि नैन प्रान मुख भयौ चितए करुखिअनि अनकनि दिए-२०६९।
[सं. अन = नहीं + कथ = कहना, हिं. अनकहा]
अवाक् रहकर, चुप होकर। उ.- मो मन उनही को भयौ। परयौ प्रभु उनके प्रेमकोस में तुमहूँ बिसरि गयौ।......। सुर अनकही दै गोपिन सौं स्रवनि सूँदि उठि धायौ-३४८८।
[सं.अन् = बुरा + अक्ष = आँख, प्रा.अनख्ख]
(क) मृगनैनी तू अंजन दै।…...। नैन निरखि अँग अंग निरखियौ अनख पिया जु तजै-२२५४।
(ख) धनि धनि अनख उरहनो धनि धनि पनि माखन धनि मोहन खाए--२८४।
[सं.अन् = बुरा + अक्ष = आँख, प्रा.अनख्ख]
कर कंकन दरपन लै देखो इहि अति, अनख मरी। क्यों जीवै सुयोग सुनि सूरज बिरहिनि विरह भरी-३२००।
[सं.अन् = बुरा + अक्ष = आँख, प्रा.अनख्ख]
[सं.अन् = बुरा + अक्ष = आँख, प्रा.अनख्ख]
[सं.अन् = बुरा + अक्ष = आँख, प्रा.अनख्ख]
हित की कहे अनख को लागति है समुझहु भले सयानी-२२७५।
रुष्ट, खीझी हुई। झुंझलाई हुई।
बेगि चलिए अलख जहँ तुम इहाँ उह वहाँ जरति है २२५९।
क्रोध करना, झुंझलाना, खीझना।
गुन अवगुंन की समुझ न संका, परि अई यह टेव। अत्र अनखाइ कहौँ, पर अपनेैँ राखौ बाँधि-बिचारि। सूर स्याम के पालनहारैं आवति हैं नित गारि-१-१५०।
उठत सभ। दिन मधि, सैनापति भीर देखि, फिरि आऊँ-न्हात-खात मुख करत साहिबी, कैसे करि अनखाऊँ--९-१७२।
( क ) जब लगि परत निमेष अंतरा जुग समान पल जात। सूरदास वह रसिक राधिका निमिष पर अति अनखात--१३४७।
(ख) सूर प्रभु दासी लोभाने ब्रज बधू अनखात---२६८०।
क्रोध करती हैं, खीझती हैं, झुँझलाती हैं।
ऊधौ जब ब्रज पहुँचे अइ।…….।गोपनि गृह-ब्योहार बिसारे मुख सम्मुख सुख पाइ। पलक वोट (ओट) निमि पर अनखाती यह दुख कहा समाइ---३४४४।
क्रोध करना, रिसना, झुँझलामा, खीझना।
लाल कुँवर मेरौ कछून जानै, तू है तरुनि किसोर।…….।सूरदास जसुदा अनखानी यह जीवनधन मोर--१०-३१०।
खिझाते हो, अप्रसन्न करते हो।
काहे को हो बात बनावत। ••••••। वा देखत हमको तुम मिलिहौ काहे को ताको अनखावत--१८७०।
[हिं. अनखना + आहट (प्रत्य.]
अनखने या क्रोध दिखाने की क्रिया, अनख।
पूर सनेह ग्वालि मन अँटक्यौ अंतर प्रीति जाति नहिं तोरी-१०-३०५।
(ख) पद-रिपु पट अँटक्यौ न सम्हारति, उलटपलट उबरी-६५९।
ब्रह्मांड, लोकपिंड, विश्व।
(क) सब्दादिक तैं पंचभूत सुंदर प्रगटाए। पुनि सबकौ रुचि अंड, आपु मैं आपु समाए २-३६।
(ख) तिनतैं पंचतत्व उपजायौ। इन सबकौ इक अंड बनायो-३-१३।
(ग) एक अंड कौ भार बहुत है, गरब धर्यौ जिय सेष-५७०।
अति प्रचंड यह अंड महा भट जाहि सबै जग जानत। सो मदहीन दीन ह्वै बपुरो कोपि धनुष सर तानत-३३९२।
मादा जीव जन्तुओं से उत्पन्न गोल पिड जिसमें से बाद को बच्चा निकलता है।
यह अंडा चेतन नहिं होई। करहु कृपा सो चेतन होइ-३-१३।
लाज के साज मैं हुती ज्यों द्रोपदी, बढ्यौ तन-चीन नहिं अंत पायौ-१-५।
सूरदास भगवंत भजन करि अंत बार कछ लहियै-१-६२।
हम अनखी या बात को लेत दान को नाउँ-११४१।
अप्रसन्न करती (है) खिझाती (है)
मेरो बिलग मानति यह जानति या बातन मैं क्छु पैयत है। सूर स्याम न्यारे न बूझिये यह मो को नहि भावै, काहे को अन खैयत है--२१४६।
कबहूँ मोकौ कछु लगावति कबहूँ कहूति जनु जाहु कहीं। सूरदास बातैं अनखौहीं नाहिंन मोपै जात सही-१२४८।
शरीर की सुधि नहीं रख पाता, बेसुध हो जता है, सुध-बुझ भुला देता है। विदेह हो जाता है।
जाकौ निरखि अनंग अनंगत ताहि अनंग बढ़ावै। सूर स्याम प्यारी छबि निरखत आपुहि धन्य कहावै–८७५।
पंखीपति सबही सकुचाने चातक अनग मर्यौ-२८९५।
नीकैँ गाइ गुपालहिँ मन रे। जा गाए निर्भय पद पाए अपराधी अनगन रे--१-६६
[सं. अन = नहीं + हिं. गढ़ना]
[सं. अन = नहीं + हिं. गढ़ना]
जिसे किसी ने बनाया न हो, स्वयंभू।
ऊधौ राखिये यह बात। कहत हौ अनगढ़ व अनहद सुनत ही चपि जात--३२९२।
[हिं. अन् + अगवना = आगे होना]
[हिं. अन् + अगवना = आगे बढ़ना]
[हिं. अन् + अगवना = आगे बढ़ना]
हस उज्ज्वल पंख निर्मल, अग मलि मलि न्हाहिँ। मुक्ति-मुक्ता अनगिने फल, तहाँ चुन चुनि खाहँ---१-३३८।
[सं. अन् = विरुद्ध + घरी = घड़ी]
बिना बुलाया हुआ, अभिमंत्रित, अनाहूत।
[सं. अन् = नहीं + हिं. चाहना]
जोन चाहे, जो प्रेम न करे।
अज्ञानतावश नासमझी के कारण।
डगरि गए अनजान ही गह्यो जाइ बन घाट---१००६।
[सं. अन् + हिं. जानना (अनजान )]
अनजाने से, बिना जाने ही, अज्ञानतावश,
(क) धीर-धीर कहि कान्ह असुर यह, कंदर नाहीं। अनजानत सब परे अंधा-मुख-भीतर माहीं---४३१।
(ख) अनजानत अपराध किए प्रभु राखि सरन मोहिं लेहु---५५८।
(ग) ब्याकुल भयो डरगौ जिसे भारी। अन जानत कीन्हीं अधिकारी--१०६६।
[सं. अन् + हिं. जानना =अनजान]
अज्ञानतावश, नादानी में, नासमझी के कारण।
अनजाने मैं करी बहुत तुमसौं बरियाई। ये मेरे अपराध छमहुँ, त्रिभुवन के राई---४९२।
उपद्रव, अन्याय, अत्याचार।
[सं. अन् = नहीं + सं. दृष्ट, प्रा. डिट्ट, हिं. डीठ]
[स. अ = नहीं + नत = झुका हुआ]
[सं. अन्यत्र, प्रा. अन्नत]
और कहीं, दूसरी जगह, अन्य स्थान पर।
(क) हरि चरनारबिंद तजि लागत अनंत कहूँ तिन की मति काँची१-१८।
(ख) जोग-जज्ञ-जप-तप नहिं कींन्हौ , बेद बिमल नहि भाख्यौं। अति रस लुब्ध स्वान जूठनि ज्यों, अनत नहीं चित राख्यौ--१-१११।
(ग) अंतकाल तुम्हरे सुमिरन गति, अनत कहूँ नहि दउँ १-१६४।
(घ) मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै–१-१६८।
(ङ) राखियै दृग मद्ध दीजै अनत नाहीं जान सा. १०७।
[सं. अन्यत्र, प्रा , अन्नत्त, हिं. अनत]
दूसरी जगह को, अन्य स्थान के लिए, और कहीं।
(क) मुरली मधुर बजावहु मुख ते रुख जनि अनतै फेरौ-सा. ८।
(ख) जाके गृह मैं प्रतिमा होई। तिन तजि पूजै अनतै सोइ--१२-३।
बिना देखे हुए ही, अनजान में ही।
(क) कहहि भूख औ नींद जीवन हौं जानत नाहीं। अनदेखे वे नैन लगे लोचन पथ. वाहीं-१० उ. ८।
(ख) सुनहु मधुप अपने इन नैमन अन देखे बलबीर। घर-आँगन न सुहात रैनि दिन बिसरे भोजन-नीर-३१३७।
इहिं मिस देखन अवति मालिनि, मुँह फः टे जुगँवारि। अनदोषे कौं दोष लगावतिं , दई देइगौ टारि-१०-२९२।
[सं. अन् = नहीं + भव = होना]
तुम घट ही मो स्याम बताए।…..। मोहन बदन बिलोकि मानि रुचि हँसि हरि कंठ लगाये। हम मतिहीन अजान अल्पमति तुम अनभौ पद ल्याए---३२०१।
[सं. अयमनस्क, हिं. अनमना (पुं.)]
मैं तुम्हें हँसत-खेलत छाँड़ गई, अब न्यारे अनबोले रहे दोऊ। इत तुम रूखे ह्वेै रहे गिरिधर उत अनमनी अंचल उर माई मुख जंच लगाइ रहीं ओऊ---२२४०।
[सं. अन्यमनस्क, हिं. अनमना]
मेरे इन नैन। इते करे। ........। धरे न धीर अनमने रुदन बल सो हठ करनि परे-पृ.३३१।
[सं. अन्यपनस्क, हिं. अनमना ]
खिन्न, उदास, सुम्त उचटे चिल का।
लाल अनमनै कत होत. हो तुम देखो धौँ कैसे कैपे करि लाड होँ-२२०९।
[हि अन् ( उप ) + सायना = नापन]
जो नापा न जा सके, जो न समावे।
(क) भक्त अनन्य कछु नहिं माँगे। तातै मोहिं संकुच अति लागै--३-१३।
(ख) और न मेरी इच्छा काइ। भक्ति अनन्य तुम्हारी होइ-७-२।
(ग) मधुकर कहि कैसे मन मानै। जिनके एक अनन्य ब्रत सूझै क्यौं दूजौ उर आनै-३१३६।
बच्चों को पहलेपहल अन्न चटाने का संस्कार, चटावन, पसनी, पेहनी।
कान्ह कुँवर की करहु पासनी, कछु दिन घटि षट् मास गए। नद महर यह सुनि पुलकित जिय, हरि अनप्राशन जोग भए–१०८८।
भिन्न-भिन्न, अनेक, विविध।
द्रुम फूले बन अनबन भाँती।
[सं. अन् = नहीं + हिं. बोलना, पुं. अनबोला]
(क) हौँ पठई इक सखी सयानी, अनबोली दै दैन। सूरस्याम राधिका मिलै बिनु कहा लगे दुख सैन--७४९।
(ख) अनबोली क्योँ न रहै री आली तू आई मौसौँ बात बनावन--२२०४
[सं. अन् = नहीं + हिं. बोलना]
(क) चिबुक उठ य कह्यौ अब देखो अजहुँ रहति अनबोले-१९०९।
(ख) जो तुम हमैं जिवायौ चाहत अन बोले होइ रहिए ३०६३।
[सं. अन् = नहीं +हिं. भला]
सूर अनभल आन को सुनत बृक्ष बैरि बुताय-सा. उ.-४५।
[सं. अन् = नहीं + हिं. भली]
सूर प्रभु को मिली भेटं। भली अनभली चून हरदी रंग देह छाही-१७८८।
[स. अन् + हिं. भाना = अच्छा लगना]
[सं. अन्+हिं. भावना = अन भावना, अन भाया]
जो अच्छा न लगे, जो न रुचे।
खोलि किवार पैठि मंदिर मैं दूध दही सब सखनि खवायौ। ऊखल चढ़ि सीकैँ कौ लीन्हौ, अन धावत भुइँ मैँ ढर कायौ-१०-३३१।
प्रकरम, अविधि, अज्ञान, अवज्ञा, अन मारग. अनरीति। जाकौ नाम लेत अघ उपजै , सोई करत अनीति---१-१२९।
[स. अन = नहीं +हिं. मिलन।]
[स. अन = नहीं +हिं. मिलन।]
[सं. अन् = नहीं + मिल = मिलना और उकिन]
अक्रम तिशयोक्ति अलंकार जिसमें कारण के साथ ही कार्य का होना बताया जाता है।
गिरिजापति-पितु-पितु-पितु ही ते सौगुन सी दरसावै। ससिसुत-वेद-पिता की पुत्री आज कहा चित चावै। सूरज सुन माता सुबोध की अ पुत्र आदि ढहावै। सूरज प्रभु मिलाप हित स्यानी अनैमिल उकिन गनावै-सा ० १५।
[सं. अन = नहीं + हिं. मिलना पुं. अनमि नता]
बेमेल, बेजोड़, बेतुकी, अनुचित।
ये री मदमत ग्वालि फिरति जोबन मदमाती। गोरस बेचनहारि गुजरी अति इतराती। अनमिलती बातें कहति सुन पै है तेरो नाह। कहँ मोहन कहँ तू रहै कवहिं गहो तेरी बाँह-१०६५।
[सं. अन = नहीं + हिं. मिलना पुं. अनमि नता]
स्थिर दृष्टि, टकटकी के साथ।
अनमेष दृग दिए देखे ही मुखमंडली वर वारि-२२१६।
[सं. अन् = नहीं + हिं. मोल ]
[सं. अन् = नहीं + हिं. मोल ]
बिना प्रयास या परिश्रम, अचानक, एकाएक।
(क) अदभुत राम नाम के अंक……..। अंधकार अज्ञान हरन को रविससि जुगल-प्रकास। बासर-निसि दोउ करेैं प्रकासित महा कुमग अनयास---१-९०।
(ख) घर ही बैठे दो उ दास। ऋष सिद्धि मुक्ति अभयपद दायक आ इ मिले प्रभु हरि अनयास---१० उ०-१३५।
रंगरहित, रंगहीन, दूसरे रंग का।
सेत, हरोै, रातो अरु पियरौ रंग लेत है धोई। कारौ अपनी रंग न छाँडेै, अनरँग कबहुँ न धोई--१-६३।
लीन्हे पुहुप पराग पवन कर क्रीड़त चहुँ दि सि ध इ। रस अनरस संय, ग बिरहिनी भरि छाँडति मन भाई--२३१०।
अनुचित व्यवहार, अत्याचार।
इतनी कहत बिभीषन बोल्यौ बधू पाँप परौं। यह अनरीति सुनी नहिं स्रवननि अब नई कहा करौं–९-९८।
भोजन अच्छा न लगने की बीमारी।
मोहन काहैं न उगिलो माटी। बार-बार अनरुचि उपजावति, महरि हाथ लिए साँटी|१०-२५ ४।
[सं. अन् = नहीं = बुरा + रूप]
[सं. अन् = नहीं = बुरा + रूप]
मधुकर मन सुनि जोग डरेै। …….। और सुमन जो अमित सुगंधित सीतल रुचि जो करै। क्यौं तुम कोकहिं बनेै सरै औ और सबै निदरै-३३११।
उपद्रव, उत्पात, अनिष्ट, बिगाड़।
जो उपयुक्त न हों, | जिन पर विश्वास न किया जा सके, अनुचित।
दिन प्रति सबै उरहने के मिस आवति हैं उठि प्रात। अनलहते अपराध लगावतिँ, बिकट बनावतिँ बात--१०-३२६।
[सं. अन् = नहीं + अ. लायक-योग्य]
अनलायक हम हैं की तुम हौ कहो न बात उघारि। तुमहू नवल नवल हमहूँ हैं बड़ी चतुर हो ग्वारि-२४२०।
[सं. अन् = नहीं + लक्ष्य = देखने योग्य]
[सं. अन = नही + वाद = वचन]
देख हुलसत हीय सब के निरखि अद्भुत रूप। सूर अनसँग त जत तावत अयोपतिका सूप-सा० ३८।
प्रसंगति' नामक अलंकार जिसमें कार्य का होना एक स्थान पर वर्णित हो और कारण का दूसरे स्थान पर; अथवा जो समय किसी कार्य के लिए निश्चित है तब कार्य का होना ने दिखाकर अन्य समय दिखाया जाय।
[सं. उज्ज्वल, हिं. उजाला, उजेरा]
छीनना, हरना, लेना, मूसना।
(क) सूरदास ठगि रही ग्वालिनी, मन हरि लियौ अँजोरि–१०:२७०।
(ख) मारग तौ कोउ चलन न पावत, धावत गोरस लेत अँजोरि--१०.३२७।
(ग) सूर स्याम चितवत गए मो तन, तन मन लियौ अंजोर-६७०।
उजेली, प्रकाशमयी, उज्ज्वल।
मनि आभरन डार डारनि प्रति, देखत छबि मनहीं अँटकाए---७८४।
भीतर तैं बाहर लों आवत। घरआँगन अति चलत सुगम भए, देहरि अंटकावत १०-१२५।
असमय, कुसमय, कुअवसर, बेमौका।
ऋतु बसन्त अनस मेै अधम मति पिक सहाउ लेै धावत। प्रीत म सँग न जान जुवती रुचि बोले हु बोल न आवत--३४८६।
[सं. अन् = नहीं + हिं. सहना]
योग का एक साधन जि प में हाथ के अंगूठों से कान बंद करके शब्द विशेष सुनते हैं।
(क) ऊधो रखिए वह बात। कहत हो अनगढ़िन अनहद सुनत हो चपि जात---३२९२।
( ख) हृदय-कमल मैं ज्योति विराजै, अनहद नाद निरन्तर बाजै--३४४२।
अहित, अपकार, बुराई, हानि।
(क) बालबिनोद बचन हित-अनहित बार-बार मुख भाखै। मानौ बग बगदाइ प्रथम दिसि आठ-सात-दस नाखै१-६०।
(ख) चाहत गंध बैरी बीर। आपनो हित चहत अनहित होत छोड़त तीर-सा० २८।
[सं. अन् = नहीं + हिं. होना]
[सं. अन् = नहीं +हिं. होना]
किहिँ बिधि करि कान्हहिँ समुझेैहौं ? मैं ही भूलि चंद दिखरायौ, ताहि कहत मैं खैहौं। अनहोनी कहुँ भई कन्हैया, देखी-सुनी न बात। यह तो अहि खिलौना सबकौ, खान कहत तिहिँ तात--१०-१८९।
[सं. अनाकर्णन, हिं. आनाकानी]
सुनी अनसुनी करना, टालमटोल।
अकस्मात, अचानक, सहसा, एकाएक।
सुने हैं स्याम मधुपुरी जात। सकुचति कहि न सकति काहू सौं गुप्न हृदय की बात है संकित बचन अनागत कोऊ कहि जो गई अधरात--२५१९।
नित्य अखड अनूप। अनागत अबिगत अनघ अनंत। जाको आदि को उ नहिं जानत को उ नहि पावत अंत
(क) देखेहू अनदेखे से लागत। यद्यपि करत रंग भरि एकहि एकटक रहे निमिष नहिं त्यागत। इत रुचि दृष्टि मनोज महासुख उत शोभा गुन अमित अनागत-१६९५।
(ख) पल इक माँह पलट सौं ली जत प्रगट प्रीति अनागत। सूरदास स्वामी बंसी बस मुरछि निमेष न जागत२३४२।
संगीत के अंतर्गत ताल का एक भेद।
संगीत का वह ताल या विराम जो गायन में चार मात्राओं के बाद आता है। और कभी-कभी सम का काम देता है।
उपजावत गावत अति सुंदर अनाघात के ताल---२३२०।
(क) परम अनाथ विवेक नैन बिनु, निगम-ऐन क्यों पावै---१-४८।
(ख) सूरदास अनाथ के हैं सदा राखनहर-स. ११७।
जिसका आदि न हो, स्थान और काल से अबद्ध।
[सं. अ = नहीं + हिं. नापना]
[सं. अ = नहीं + हिं. नापना]
बिना प्रयास या परिश्रम, बैठे बिठाए, अकस्मात, सहसा।
कनक संपुट कोकिला रव बिबस ह्वेै दे दान। बिकच कंज अनारंगिन पर लसित करत पै पान स ० उ०-५।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अनारी। अपनो दूध छाँड़ि को पीवै खारे कूप को बारी ३३००।
सब यादव मिलि हरि सौं इह कह्यो सुफलक सुत जहँ होइ। अनावृष्टि अतिवृष्टि होति नहिं इह जानत सब कोई--१०-उ०-२७।
जिसका नाश न हुआ हो, जो टूटा हुआ न हो।
जल चरजासुत-सुत सम नासा धरे अनासा हार---सा ० ३५।
बृथा, व्यर्थ निष्प्रयेजन।
होउ मन, राम-नाम कौ गाहक। चौरासी लख जीव-जोनि मैं भटकत फिरत अनाहक---१-३१०।
योग की एक क्रिया जिसमें हाथ के अंगूठों से कान मूँदकर ध्यान करने से शब्द-विशेष सुनते हैं।
आकाश वाणी, देववाणी, गगनगिरा।
समदत भई अनाहत बानो कंस कान झनकारा। याकी कोखि औतरे जो सुत करै प्रान परिहारा।……. तब बसुदेव दीन ह्वै भाष्यौ पुरुष न तिय बध करई। मोको भई अनाहत बानी तातै सोच न टरई-१०४।
बिना बुलाया हुआ, अनिमंत्रित।
[सं. अन्यायिन, हिं. अन्यायी]
अन्यायी, अनीतिकारी, अंधेर करने वाला।
अरे मधुप लंपट अनियाई यह संदेस कत कहैं कन्हाई---३४०८।
जो सब दिन न रहे, अस्थायी।
[हिं. अनी = सेना +प== पालक = स्वामी]
अष्टसिद्धियों में पहली जिससे सूक्ष्म रूप धारण करके अदृश्य हो जाते हैं।
एकटक दृष्टि से देखने वाला।
स्थिर दृष्टि, टकटकी के साथ।
[सं. अणि = नोक +हिं. आर (प्रत्य.) हिं. अनियारा]
नुकीला, कटीला, धारदार, तीक्ष्ण।
(क) नैन कमल-दल से अनियारे। दरसत तिन्हैं कटैं दुख भरे-३-१३।
(ख) उ०-ठाढ़ी कुँअरि राधिका लोचन मीचत तहँ हरि आए। अति बिसाल चंचल अनियारे हरि हाथनि न समाए–६७५।
[सं. अणि = नोक + हिं. आर (प्रत्य.) हिं. अनियारा]
नुकीला, कटीला, तीक्ष्ण, पैना।
(क) रघुपति अपनो प्रन प्रतिपारयौ तारयो कोपि प्रबल गढ़, रावन टूक टूक करि डारयौ। ……..रहयौ माँस को पिड, प्रान ले गयौ बान अनियरौ-९-१५९।
(ख) जाहि लगै सोई पै जानेै प्रेम-बान अनियरौ--२८४८।
श्रीकृष्ण के पौत्र, प्रद्युम्न के पुत्र जिनका विवाह ऊषा से हुआ था।
जिसका वर्णन न हो सके,अकथनीय।
भौंह कमान समान बान सेना हैं युग नैन अनी।
नारदादि सनकादि प्रजापति, सुर-नर-असुर-अनी। काल-कर्म-गुन और अन्त नहिं. प्रभु इच्छा रचनी--२-२८।
सारंगसुन नीकन में सोहत मनो अनीक निहार--सा० ३५।
[सं. अ = नहीं + नीतन == नेत्र]
तमहर सुत गुन आदि अंत कवि को मतिवंत विचारो। मेरे जान अनीतन इनको कीनो बिध गुन वीरो-सा ० ४०।
जाको नाम लेत अघ उपजै, सोई करत अनीति--१-१२९।
अज-अनीह-अबिरुद्ध-एकरस, यहै अधिक ये अवतारी---१०-१७१।
पक्ष में रहने वाला, हितकर।
मुकुट सिर धारैँ, बनमाल कौस्तुभ गरैँ चतुर्भुज स्याम सुन्दर हिँ ध्यायौ। भए अनुकूल हरि, दियौ तिहिँ तुरत बर जगत करि राज पद अटल पायौ-४-१०।
[सं. अनुकूलन, हिं. अनुकूल]
[सं. अनुकूलन, हिं. अनुकूल]
लोचन सपने के भ्रम भूले। ............। मोते गये कुम्ही के जर लौं ऐले वे नि्रमुले। सूर स्याम जलरामि परे अब रूप-रंग अनुकुले-प्रृं० ३३४।
दरभूषन षनषन उठाइ दै नीतन हरि घर हेरत। तनु अनुगामी मनि मैं भैके भीतर सुरुच सकेरत---सा ०--३।
कालीदमन के सि कर पातन। अघ अरिष्ट | धेनुक अनुघातन----९८२।
इहिँ विधि उच्च-अनुच्च तन धरि-धरि, देस-विदेस बिचरती-१-२०३।
संगति रहे साधु की अनुदिन भवदुख दूरि नसावत २.१७।
( क ) सोभित सूर निकट नासा के अनुपम अधरनि की अरुनाई---६ १६।
(ख) गृह ते चलो गोपकुमारि। खरक ठाढ़ो देख अदभुत एक अनुपम मार--सा ० १४।
भुजा बाम पर कर छबि लागति उपमा अंत न पार-६८७।
(ख) सोभा सिन्धु न अंत रही री--१०-२९।
(क) छन मंगुर यह सबै स्याम बिनु अंत नहिं सँग जाइ-.-१-३१७।
(ख) पर्यौ जु काज अंत की बिरियाँ तिनहुँ न अनि छुड़ायौ---२-३०।
(क) पूरन ब्रह्म पुरान बखानै। चतुरानन सिव अंत न जानै-१०-३।
(ख) जाको ब्रह्मा अंत न पावै--३९३।
दूसरे स्थान पर, अलग, दूर।
कुंज कुंज में क्रीड़ा करि करि गोपिन कौ सुख देंहों। गोप सखन सँग खेलत डोलौं तिन तजि अंत न जैहौं।
अंत करनेवाला, यमराज, काल।
भव अगाध-जल-मग्न महा सठ, तजि पद-कूल रह्यो। गिरा रहित ब्रृक-ग्रसित अजा लौं, अन्तक अनि गह्यो-१-२०१,
सन्निपात ज्वर का एक भयंकर भेद जिसमें रोगी किसी को नहीं पहचानता।
व्याकुल नंद सुनते ए बानी।. डसि मानौं नागिनी पुरानी। ब्याकुल सखा गोप भए व्याकुल। अंतक दशा भयौ भय आकुल-२३६४९
जानकारी, परीक्षा-जग्य ज्ञान।
[सं. अनुभव, हिं. अनुभवना]
अनुभव करती है, समझती है, मानती है।
पुन्य फल अनुभवति सुतहिँ बिलोकि कै नँद-घरनि---१० १०९।
अनुभव या जानकारी रखने वाला।
सखा परस्पर मारि करैं, कोउ कानि न मानै। कौन बड़ौ को छोट, भेद-अनुभेद न जानै--१०-५८९।
जमुमन देख अपनी कान। वर्ष सर को भयो पूरन अवै ना अनुमान-सा. ११४।
सूर प्रभु अनमान कीन्हौ, हरोैं इनके चीर-७८३।
एक अलंकार जिसमें अटकल के आधार पर कोई बात कही जाय।
लै कर गेंद गए हैं खेलन लरिकन संग कन्हाई। यह अनुमान गयौ काली तट सूर साँवरो माई-सा. १०२।
[सं. अनुमान, हिं. अनुमानना]
अनुमान करते हैं, सोचते हैं।
यह संपदा कहौ क्यों पचिहै बालसँघाती जानत है। सूरदास जो देते कछु इक कहो कहा अनुमानत हैं-पृ. ३३०।
[सं. अनुमान, हिं. अनुमानना]
अनुमान करती हूँ, सोचती-विचारती हूँ।
स्यामहूँ मैं कैसे पहिचानौ…...। पुनि लोचन ठहराइ निहारति निमिष मेटि वह छबि अनुमानौं। औरे भाव और कछु सोभा कहौ सखी कैसे उर आनौं---१४२९।
[सं. अनुमान, हिं. अनु मानना]
अटकल लगाई, अनुमान किया, सोचा, विचारा।
(क) राधा हरि के भावहिं जान्यो। इहै बात कैहौं इन आगे मन ही मन अनुमान्यौ--१५२५।
(ख) मधुबन ते चल्यौ तबहि गोकुल नियरान्यौ। देखत ब्रज लोग स्याम आयौ अनुमान्यो २९४९।
अनुमान किया, सोचा, विचार।
अब नहिं राखौंँ उठाइ, बैरी नहिं नान्हों। मारी गज-पै रुँदाइ मनहिँ यह अनुमान्हौ---२४७५।
अंबरीष राजा हरि-भक्त। रहै सदा हरि पद अनुरक्त-९-५।
चरननि चित्त निरंतर अनृरत, रसना चरित-रसाल १-१८९।
सूरदास अनुराग प्रथम तें विषय बिचार बिचारो---स ० ४•।
[सं. अनुराग, हि अनुरागना]
आलस होता है, प्रेम करता है, लीन होता है।
स्याम बिमुख नर-नारि बृथा सब कैसे मन इनिसों अनुरागत-११७५।
[सं. अनुराग, हि अनुरागना]
लोले पोल झलक कुंडल की, यह उपमा कछु लागत। मानहुँ मकर सुधा-सर क्रीड़त, आपु-आपु अनुरागतअ ६४५।
[सं. अनुराग, हिं. अनुरागना]
आसक्त होती है, प्रीति बढ़ाता है।
गूँगी बातनि योँ अनुरागति, भँवर गुजरत कमल मोँ बंदहिँ---१०-१०७।
[सं. अनुराग, हिं. अनुरागना]
सप्रेम, सरुचि, लगन के साथ।
आजु नँद नंदन रंग भरे।…….। पुहुप मंजरी मुक्तनि माला अँग अनुरागि धरे। रचना सूर रची बृंदाबन, आनँद काज करे--६८९।
[सं. अनुरागिन, हिं. अनुरागिनी]
प्रेम करने वाली, अनुराग रखने वाली।
नँदनंदन बस तेरे री। सुनि राधिका परम बड़भागिनि अनुरागिनि हरि केरे री--१६४१।
अनुराग करने वाला, प्रेमी।
अबिनासी कौ आगम जान्यौ सकल देव अनुरागी १०-४।
[सं. अनुराग, हिं. अनुरागना]
(क) लै बसुदेव धँसे दह सूधे, सकल देव अनुरागे-१०-४।
(ख) नवल गुपाल, नवली राधा, नये प्रेम-रस पागे। अंतर बनबिहार दोउ क्रीड़त, आपु -आपु अनुरागे---६८६।
(ग) देवलोकि देखत सब कौतुक, बलि-केलि अनुराग-४१६।
(घ) आवत बलराम स्याम सुनत दौरि चलीं बाम मुकुट झलक पीताम्बर मन मन अनुराग-२९५६।
[सं. अनुराग, हिं. अनुरागना]
अनुरक्त होता है। प्रीति करता है।
त्रि कुटी संग भ्र भग तराकट नैन-नैन लगि लागेै। हँपनि प्रकास सुमुख कुंडल मिलि चद सूर अनुर गे ३० १४।
[स. अनुराग, हिं. अनुर गना]
ऐसो जानि मोह कौंत्य गौ। हरिचरनार बिंद अनुरागेै।-७-२।
[सं. अनुराग, हिं. अनुरागना]
(क) करि संकल्प अन्नजल त्याग्यौ। केवल हरि-पद सौं अनुराग्यौ-१-३४१।
(ख) सिव पद-कमल हृदय अनुराग्यौ---४-५।
(क) तुम सन्मुख मैं बिमुख तुम्हारौ, मैं असाध तुम साध। धन्य-धन्य कहि-कहि जुवतिन को आप करत अनुराध--पृ. ३४३ (१)।
(ख) वहै चूक जिय जानि सखी सुन मन ले गए चुराय।…….। सूर स्याम मन देहि न मेरौ पुनि करिहौं अनुरोध----१४६२।
विनय करना, मनाना, याचना करना।
[सं. अनुराध, हिं. अनुराधना]
अराधना की, याचना की, मनाया, विनय की।
ग्रीव मुतलरी तारि कै अचरा सौं बाँध्यौ। इह बहानौ करि लियौ हरि मन अनुराध्यौ----१५४१।
पीछे पीछे या साथ साथ चलता है।
तुम बिनु प्रभु को ऐसी करै। जो भक्तिन कैं बस अनुसरै--१.२७७।
(आज्ञा आदि का) पालन करता है।
राजा सेव भली बिधि करै। दंपति आयसु सब अनुसरै१-२८४।
भक्ति-पंथ को जो अनुसरै। सो अष्टांग जोग कौं करै-२-२१।
सुकदेव कह्यो जाहि परकार। सूर कह्यौ। ताही अनुसार-३-६।
अनुसरण करना, देखा देखी कार्य करना।
[सं. अनुसरण, हिं. अनुसारना]
अनुसरण की, अनुकूल क्रिया की।
(क) ऐसी बिधि बिनती अनुसारी-३-१३।
(ख) तब ब्रह्मा बिनती अनुसारी-७-२।
(ग) को है सुनत कासों हौ कौन कथा अनुसारी-३२९१।
सूर इन्द्र पूजा अनुसारी। तुरत करौ सब भोग सँवारी-१००७।
सूरदास सम रूप नाम गुन अंतर अनुचर-अनुसारी-१०-१७१।
साथ चल सके, अनुयायी हो सके।
नहिं कर लकुटि सुमति सतसंगति, जिहिं आधार अनुसरई---१-४६।
पीछे चलता है, साथ चलता है।
पतित उद्धार किए तुम, हौं तिनकौं अनुसग्तौ---१-२०३।
यहि प्रकार बिष मतम तरिए। योग पथ क्रम-कम अनुसरिए-३३०८।
अनुकूल आचरण करूँगा, (आज्ञा आदि) मानूँगा।
नृपति कहयौ सो करिहौं। तुम्हरी अज्ञा मैं अनुसरिहौं-९-२।
(क) रिषि कह्यौ बहुत बुरोै तैं कीन्हौं। जो यह साप नृपति कों दोन्हौं।…...ताकी रच्छा हरि जूकरी। हरी अवज्ञा तुम अनुपरी-१-२९०।
(ख) तिन बहु सृष्टि तामसी करी। सो तामस करि मन अनुसरी-३-७।
अजहूँ स्रावग ऐसोहि करै। ताही कौ मारग अनुसरैं--५.२।
यहाँ और कासौं कहिहौं गरुड़गामी। मधु-कैटभ-मथन, मुर भौम केसी भिदन कंस-कुल काल अनुसाल हारी-१० उ०-५०।
और नि कौं जम कैं अनुसासन, किंकर कौटिक धावै। सुनि मेरी अपराध-अधमई कोऊ निकट न आवै-१-१९७।
[क्रि. स. ‘अनुहरना' का कृदन्त रूप]
मंजु मेचक मृदुल तन अनुहरत भूषन भरनि। मनहूँ सुभग सिँगारसिसु-तरु, फरयौ अदभुत फरनि--१०-१०९।
अनुकरण करना, आदर्श पर चलना।
हरि बल सोभित यौं अनुहार। ससि अरु सूर उदै भए मानौ दोऊ एकहिँ बार-२५७२।
[सं. अनुहार, हिं. अनुहारि (स्त्री.)]
गति. मराल, केहरि कटि, कदली युगल जंघ अनुहारो-२२००।
एक अलंकार जिसमें दूषित वस्तु पाने की इच्छा उसकी कोई विशेषता देखकर हो।
करत अनुज्ञा भूषन मोको सूर, स्याम चित अवै--सा० ६९।
चुपचाप रहने या मौन धारने वाला।
जिसकी उपमा न हो, अद्वितीय, बेजोड़।
हरि जस बिमल छत्र सिर ऊपर राजन। परम अनूप----१-४०।
वह प्रदेश जहाँ जलअधिक हो।
(क) सदन-रज तन स्याम सोभित, सुभग इहि अनुहारि। मनहुँ अंग-बिभूति राजति संभु सो मदहारि-१०-१६९।
(ख) गिरि समान तन अगम अति पन्नग की अनुहारि-४३१।
(ग) रोमावली अनूप बिराजति, जमुना की अनुहारि-६३७।
(घ) आज घन स्याम की अनुहारि। उनइ आए साँवरे रे सजनी देखि रूप की आरि-२८२९।
(ङ) है कोउ वैसी ही अनुहारि। मधुबन तन ते आवत सखी री देखहु नैन निहारि-२९५१।
(क) बलि गइ बाल रूप मुरारि। पाइ पैजनि रटति रुनझन, नचावति नँदनारि।…...। सूर सुर-नर सबै मोहे, निरखि यह अनुहारि-१०-११८।
(ख) सुनहु सखी ते धन्य नारि। जो अपने प्रानबल्लभ की सपनेहु देखते हैं अनुहारि-२७९५.
बहु मिष्टान्न बहुत बिधि भोजन बहु व्यंजन अनुहारि---९९२।
(क), मुकुट कुण्डल तनु पीत बसन कोउ गोबिंद की अनुहारी-३४४१।
(ख) आजु कोउ स्याम की अनुहारी। आवत उत उमँगे. सुन सबही देखि . रूप की वारी--२९५७।
[सं. अनुहारण, हिं. अनुहारना]
तुल्य करना, समान करना, उपमा देना।
देखिः री हरि के चंचल तारे। कमल बीन को कहा एती छबि खंजनहू न ज त अनुहारे-१ ३३३।
(क) स्य म भुजनि की सुन्दरताई। चन्दन खौरि अनूपमा राजतिसो छबि कहीं न जाई-६४१।
(ख) अद्भुत एक अनूपम बाग-१६८०।
धन्य अनुराग धनि | भाग धनि सौभाग्य धन्य। जोवन-रूप, अति अनूपी | १३२५।
एक से अधिक, असंख्य, अनगिनती।
[सं. अनृत, हिं. पं. अनेरा]
कर सौं कर लै, लगाइ, महरि पै गई लिवाय, आनँद उर नहिं समाइ, बात है अनेरी-१०-२७५।
(क) ज्यों जल मसक जीव-घट अंतर मम माया इमि जानि---२-३८।
(ख) हौं अलि केतने जतन बिचारौं। वह मूरति वाके उर अंतर बसी कौन बिधि टारौं सा. ७५।
निरखि सुन्दर हृदय पर भृगु-पाद परम सुलेख। मनहूँ सोभित प्रभु अन्तर सम्भू-भूषन बेष-६६५।
(क) मलिन बसन हरि हेरि हित अंतर गति तन पीरो जनु पातै-सा. उ.४६।
(ख) अंगदान बल को दै बैठी। मंदिर आजु आपने राधा अंतर प्रेम उमेठी--सा. १००।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतरगत ही भावै---१२।
(क) कमल-नैन, करुनामय, सकल-अंतरजामी-१-१२४।
(ख) सूर बिनती करै, सुनहु नँद-नंद तुम कहा कहौ खोलि कै अंतरजामी-१-२१४।
हृदय की जलन; हृदय का संताप
अंतरदाह जु मिट्यो ब्यास कौ इक चित ह्वै भागवत किऐं-१-८९।
करि अँतरधान हरि मोहिनी रूप कौं, गरुड़ असवार ह्वै तहाँ आए ८-८।
भयैं अंतरध्यान बीते पाछिली निस जाम--सा. ११८।
(क) रे रे चपल बिरूप ढीठ तू बोलत वचन अनेरौ-९-१३२।
(ख) क़ारौ कहि कहि तोहिं खिझावत, बरजत खरो अनेरौं। १००२ १६।
(ग) अबलौं मैं करी कानि, सही दूध-दही, हानि, अजहूँ जिय जानि-मानि, कान्ह है अनेरौ-१०-२७६।
(घ) अरी ग्वारि मैमंत बोलत बचन जो अनेरौ। कब हरि बालक भये, गर्भ .. कब लियौ बसेरौ--१११४।
लोक-बेद कुल कानि मानत अति ही रहत अने रौ--पृ० ३२२।
नि कसबी हम कौन मग हो कहै बारी बैस। मोह को यह गर्व सागर भरी आइ अनैस-स०१७
बुरा मानना, रूठना, मान करना।
तरुनिन की यह प्रकृति अनैसी थोरेहिं बात। खिसावैं–११५२
बुरे भाव से, बुरी तरह से।
जो इष्ट न हो, अप्रिय,बुरा।
जनम सिरानी ऐसैं ऐसे। कै घर-घर भरमत जदुपति बिन, कै सोवत, के बैसैं। के कहूँ।
खान-पान-रमनादिक, कै कहुँ बाद अनैसें-१-२९६।
ज्ञा कारन सुन सुत सुन्दर बर कीन्हौं इती अनैहो ( कीन्हीं ‘इती अरै )। सोइ सुधाकर देखि दमोदर या भाजन में हैं, हो (माँहि परै) १०-१९५।
अनूठी, निराली, अदभुत, विलक्षण।
झगरिनि तैं हौं बहुत खिझाई। कंचन हार दिऐै नहिं मानति, तुही अनोखी दाई--१०-१६
भूषनपति अहारजा फल से मेघ अनोखे दोऊ----सा. १ ०३।
सूर स्याम कौं हटकि न राखौ, तैंही पून अनौखौ जायौ--१०-३३१।
प्रिय, सुन्दर। काकै नहीं अनोखौ ढोटा, किहिं न कठिन करि जायौ। मैं हूँ अपने औरस पुतैं बहुत दिननि मैं पायौ १०.३३९।
[सं. अन्योन्य] परस्पर, आपस में।
दोऊ लगत दुहुन ते सुन्दर भले अनोन्या आजसा ०.४५।
एक अलंकार जिसमें दो वस्तुओं की क्रिया या गुण की उत्पत्ति पारस्परिक संबंध के कारण हो।
होनों | होउ होउ सो अबहीं यहि ब्रज अन्न न खाऊँ-२७८०।
एक, उत्सव, जो कार्तिक मास में दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपक्ष को वैष्णवों के यहाँ मनाया जाता है। इसमें अनेक प्रकार के व्यंजनों और फलों से भगवान् का भोग लगाते हैं।
अन्नकट बिधि करत लोग सब नेम सहित करि पकवान्ह-९१०
अन्नकूट जैसो गोबर्धन--१०२५।
ता मित्र को परगातम मित्र। इक छिन रहत न सो अन्यत्र-४-१२।
न्याय विरुद्ध व्यवहार, अनीति।
(क) पुत्र अन्याइ करै बहुतेरे। पिता एक अवगुन नहिं हेरै--५४।
(ख) सेए नाहिं चरन गिरधर के, बहुत करी अन्याई| १-१४७।
[सं. अन्यायिन्, हिं. अन्यायी]
अनुचित कार्य या अनीति करने वाला।
अन्याई को बास नरक मों यह जानत सब कोई-३४९४।
[सं. अन्याय] [वि. अन्यायी]
अनीति, न्याय विरुद्ध आचरण।
करत अन्याय न बरजौ कबहूँ अरु माखन की चोरी--२७०८।
[सं. अन्याय] [वि. अन्यायी]
[सं. अ = नहीं + हिं. न्यारा].
[सं. अ = नहीं + हिं. न्यारा].
[सं. अ = नहीं + हिं. न्यारा].
अंचल चंचल फटी कंचुकी विलुलित बर कुच सटी उघारी। मानो नव जलदबंधु कीनी बिधु निकसी नभ कसली अन्यारी २३०१।
मोको तुम अपराध लगावत वृथा भई अन्यास। झुकत कहा मोपर ब्रजनारी सुनहु न सूरजदास-२९३४।
फूली फिरत जसोदा तन-मन, उबटि कान्ह अन्हवाइ अमोल-१०-९४।
गज कौं कहा सरित अन्हवाएँ, बहुरि धरै वह ढंग--१-३३२।
मोहन, आउ तुम्हैं अन्हवाऊँ-१०-१८५।
नंद करत पूजा, हरि देखत। घण्ट बजाइ, देव अन्हवायौ, दल चन्दन लेै भेंटत-१०-२६१।
यह कहि जननी दुहुँनि उर लावति। सुमना, सत अँग परसि, तरनि-जल, बलि-बलि गई, कहि कहि अन्हवावति-५१४।
स्नान कराने को, नहलाने को।
जसुमति जबहिं कह्यौ अन्हवावन रोइ गये हरि लोटत री -१०.१८६।
बिप्रनि कह्यौ याहि अग्हवावहु। याकैँ अंग सुगंध लगाव हु--५-३।
जबै अवौं साधु संगति, कछुक मन ठहराइ। ज्यौंँ गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ १.४५।
हम लंकेस-दूत प्रतिहारी, समुद-तीर कौँ जात अन्हाए-९-१२०।
स्नान करते हुए, नहाते हुए।
नहाते-खाते :- आशय यह कि दैनिक जीवन सुखमय हो, चिन्ता उनके पास न फटकै। उ.- कुसल रहैँ बलराम स्याम दोउ, खेलत खात अन्हात---१०-२५७।
यह कहिकै रिषि गए अन्हान . ९-५।
वेद धर्म तजि केै न अन्हावै। प्रजा सकल कोँ। यहै सिखावै---१-२।
कान्ह कह्यौ, गिरि दुध अन्हाबहु १०२३।
(क) कैसे बसन उतारि धरैं हम कैसे जलहि समैबौ। नंद-नंदन हमको देखैगे, कैसे करि जु अन्हैबौ-७७९।
(ख) नंद-नंदन हम को देखैगे, कैसे करि जो अन्हैबो ८१८।
काम करने में अशक्त असमर्थ।
सुभट भए डोलत ए नैन।…….. आपुन लोभ अत्र लै धावत पलक कवच नहिं अंग। हाव भाव रस लरत कटाक्ष न भ्रकुटी धनुष अपंग-पृ० ३२६।
पतिकौ धर्म इहे प्रतिपालेै, जुवती सेवा ही को धर्म। जुवती सेवा तऊ न त्यागै जो पति कोटि करेै अपकर्म---पृं० ३४१ (१)।
अहंकारि लंपट अपकाजी सग न रह्यो निदानी। सूरस्याम बिनु नागरि राधा नागर चित्त भुलानी---१६४७।
[सं. अपकारिन, हिं. अपकार)
यह ससि सीतल काहे कहियत।…...। मीनकेत अम्बुज आनंदित ताते ताहित लहिंयत। बिरहिन अरु कमलनि त्रासत कहुँ अपकारी रथ नहिंयत-२८५६।
[सं. अपकारिन, हिं. अपकार)
[सं. अप = अपना + घात = मार]
[सं. अ = नहीं + पक्षी = पक्षवाला]
[सं. अप्सरा, प्रा. अच्छरा]
भयभीत होना, डरना, शंकित होना।
मन जो कहो करै री माई। ……..। निलज भई तन सुधि बिसराई गुरुजन करत इराई। इत कुलकानि उतै हरिकौ रस मन जो अति अपड़ाई-१६६९।
[सं. अपर, हिं. परावा = पराया]
(क) महर ढोटौना सालि रहे। जन्महि तें अपड़ाब करत हैं गुनि गुनि हृदय कहे-२४६३।
(ख) हँसत कहत कीधौं सतभाव। यह कहती औरै जो कोऊ तासौं मैं करती अपड़ाव-१२४०।
जौ मेरे दीनदयाल न होते। तौ मेरी अपत करत कौरव-सुत, होत पंड़बनि ओते-१:२५९।
[सं. अ = नहीं-+ पत्र, प्रा. पत्त, हिं. पत्ता]
[सं. अ = नहीं-+ पत्र, प्रा. पत्त, हिं. पत्ता]
[सं. अ = नहीं-+ पत्र, प्रा. पत्त, हिं. पत्ता]
प्रभु जू हौं तौ महा अधर्मी। अपत, उतार, अभागौ, कामी, बिषयी निपट कुकर्मी-१-१८६।
[सं. अपात्र, पा. अपत्त + ई (हिं. प्रत्य.)]
नयना लुब्धे रूप के अपने सुख माई। …...। मिले धाय अकुलाय कै मैं करति लराई। अति ही करी उन अपतई हरि सों समताई-पृ० ३२३।
[सं. अपात्र, पा. अपत्त + ई (हिं. प्रत्य.)]
कान्ह तुम्हारी माय महाबल सब जग अपवस कीन्हो हो। सुनि ताकौ सब अपतई सुरु सनकादिक मोहे हो-पृ० ३४९ (५९)।
[सं. अ = बुरी + पत्ति = गति]
बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रोन-करन ब्रतधारी। कहि न सकत कोउबात बदन पर, इन पतितनि मो अपति बिचारी--१-२४८।
( क ) माधौ नैंकु हटकौ गाइ। भ्रमत निसि-बासर अपथपथ, खगह गहि नहिं जाइ-१-५६।
( ख ) अपथ सकल चलि चाहि चहुँ, दिसि भ्रम उघटत मतिमंद--१-२ ० १।
( ग ) हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। ते क्यौं नीति करैं आपुन जिन और न अपथ छुड़ाए। राजधर्म सुन इहै सूर जिहि प्रजा न जाहिं सताए---३३६३।
बिना पैर के रंगनेवाले जंतु। यथा साँप, केंचअ।
राजा इक पंडित पौरि तुम्हारी।…...अपद-दुपद पसु भाषा बूझत, अबिगत अल्प-अहारी-८-१४।
[सं. अप= बुरा + हिं. दाँव ]
चाल बाजी, चालाकी, कुचाल, घात।
कियौ वह भेद मन और नाहीं। पहले ही जाइ हरि सों कियौ भेद वहि और वे काज कासों बताहीं। दूसरें आइकै इद्रियनि लै गयौ ऐसे अपदाँव सब इनहिं कीन्है पृ० ३२१।
[हिं. अप--अपने को + देखा = देखने वाला]
[हिं. अपना + पौ य पा (प्रत्य.)]
[हिं. अपना + पौ य पा (प्रत्य.)]
[हिं. अपना + पौ य पा (प्रत्य.)]
ज हमकौ कछु सुंदरताई। भक्त जानि के सब अपनाई।
अपने पक्ष में करूँ, स्ववश करूँ।
सूरस्यास बिन देखे सजनी कैसे मन अपनाऊँ।
अंत या संहार करने वाला,विनाशक।
भक्त भय हरन असुर अंतकारी १० उ.---३१।
जाति | स्वभाव मिटैं नहिं सजनी अंतत उबरी कुबरी-३ १८८।
(क) जब जहाँ तन बेष धारौं तहाँ तुम हित जाइ। नैकु हूँ नहि करौं अंतर, निगम भेद न पाइ ६८३।
(ख) जो जासौं अंतर नहि राखै सो क्यों अंतर राखें---११९२
मध्यवर्ती काल, बीस का समय।
(क) इहि अंतर नृपतभया आई।
(ख) पिता देखि मिलिबे को धाई-९-३। तेजु बदन झाँप्यो झुकि अंचल इहै न दुख मेरे मन मान। यह पैं दुसह जु इतनेहि अंतर उपजि परैं कछु आन --सा० उ. १५।
(क) जा दिन ते नैनन अंतर भयो अनुदिन अति बाढ़ति है बारि २७९५।
(ख) एक दिवस किन देखहू, अंतर रहौ छपाई। दस को है धौं बीस को नैननि देखौ जाइ - १०६८।
(ग) कठिन बचन सुनि स्रवन जानकी सकी न बचन सँभारि। तृन अंतर दै दृष्टि तरौंधी, दियों नयन जल ढारि-९-७९।
(घ) पट अंतर दै भोग लगायो आरति करी बनाइ-२६१।
अगर्व जानि पिय अंतर ह्वै रहे सो मैं बृया बढ़ायौ री-१८१६।
कहाँ गए गिरिधर तजि मोकौं ह्याँ कैसे मैं आई। सुरस्याम अंतर भए मोते अपनी चूक सुनाई-१८०३।
(क) गोबिंद प्रीति सबनि की मानत। जिहिं जिहिं भाइ करत जन सेवा, अंतर की गति जानत१-१३। (ख) सूर तो सुहृद मानि, ईश्वर अंतर जानि, सुनि सठ झूठौ हठ-कपट न ठानि-१-७७।
(ग) राजा पुनि तब क्रीड़ा करै। छिन भरहू अंतर नहि धरे-४-१२।
(घ) अंतर ते हरि प्रगट भए। रहत प्रेम के बस्य कन्हाई युवतिन को मिल हर्ष दए-१८३२।
तब मैं कह्यौ, कौन हैं मोसी, अंतर जानि लई-१८०३।
अपने अनुकूल करना, अपने वश में करना।
ग्रहण करना, | शरण में लेना।
अपना बनाया, अंगीकार या ग्रहण किया, शरण में लिया।
अब हो हरि, सरनागत आयौ। कृपानिधान सुदृष्टि हेरिये, जिहिं पतितनि अपनायौ-१-२०५।
सूर दास प्रभु निरखि मगन भए, प्रेम-बिबस कछु सुधि न अपनियाँ-१०-१०६।
[सं. आत्मनो, प्रा. अतणों, अप्पणो; हिं. अपना]
करत अपनी अपनी :- स्वार्थ दिखाते हैं, केवल अपनी ही चिंता करते हैं। उ.- कहा कृपिन की मात्रा गनियै, मरत फिरत अपनी अपनी। खाइ न सकेै, खरच नहिं जानै, ज्यों भुवंग सिर रह। मनी-१-३९।
अपनी सी कीन्हीं :- शक्ति भर प्रयत्न किया, भरसक चेष्टा की। उ.- दोवल कहा देति मोहिं सजनी तू तो बढ़ी सुजान। अपनी सी मैं बहुतै कीन्हीं रहित न तेरी आन।
अपनै सुख कौं सब जग बाँध्यौ, कोऊ काहू कौ नाहीं--१-७९।
कारौ अपनौ रंग न छाँडै, अनरँग कबहुँ न होई-१६३।
[हिं. अप = अपना + सं. वश]
(क) जो बिधना अपबस करि पाऊँ। ता सखि कही होइ कछु तेरी अपनी साध पुराऊँ।
(ख) कान्ह तुम्हारी माइ महाबल सब जग अपबस कीन्हो हो---पृ. ३४२ (५९)।
कौर-कौर-कारन कुबुद्धि, जड़, कितै सहत अप मान-१-१०३।
[सं. अपमान, हिं. अपमानना]
अपमान करते हैं, तिरस्कारते हैं।
हारि जीति नैना नहिं जानत। धाए जात तहीं को फिरि फिरि वै कितनो अपमानत-पृ. ३२८।
[सं. अपमान, हिं. अपमानना]
अपमान करती हैं, तिरस्कारती हैं।
ताको ब्रजनारी पति जानै। कोउ आदर कोऊ अपमानै-१९२६।
(क) माया नटी लकुट कर लीन्हे, कोटिक नाच नचावै।…..। महा मोहिनी मोहि आतमा, अपमारगहिं लगावै-१-४२।
(ख) चोरी अपमारग वटपारयौ इति पटतर के नहिं कोऊ हैं---११५९।
कुमार्गी, अन्यथाचारी, कुपंथी।
नैना नोनहरासी ये। चोर ढुंढ बटपार अन्याई अपमारगी कहावै जे पृ. ३२६।
सबै खोट मधुबन के लोग। जिनके संग स्याम सुन्दर सखि सीखे सब अपयोग-३०५२।
[सं. अपर = दूसरा + हिं. पार-छोर]
जिसका पारावार न हो, असीम।
भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि। रहे बिवरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरी डरनि १०-१०९।
[हिं. जप = आप + सं. रत = लगा हुआ]
स्वयं में लगा हुआ, स्वार्थी।
[हिं. अप = आप + सं. रति = लीनता]
[सं. अ = नहीं + पर्णं = पत्ता]
[सं. अ = नहीं + स्पर्श,चारौं मुख अस्तुति करत, छमौ मोहि अपराध-४९२।. परस]
[सं. अ = नहीं + स्पर्श,चारौं मुख अस्तुति करत, छमौ मोहि अपराध-४९२।. परस]
[सं. अ = नहीं + स्पर्श,चारौं मुख अस्तुति करत, छमौ मोहि अपराध-४९२।. परस]
जो अछूता न हो, अछूत, जो छूना न चाहे दूर रहने वाला।
ऊधौं तुम हो अति बड़भ'गी। अपरस रहत सनेह लगा ते नाहिन मन अनुरागी---३३४९।
[सं. अपराधिन, हिं. अपराधिनी]
अपरा धिनि मर्म न जान्यौ अरु तुमहू ते तूटी-१० उ० ८०।
तुम मो से अपराधी माधव, केतिक स्वर्ग पठाए (हो)-१-७।
चारौं मुख अस्तुति करत, छमौ मोहिं अपराध-४९२।
जब ते बिछुरे स्याम तबते रह्यौ न जाइ सुनौ सखी मेरोइ अपराधौ--१८०९।
अलख अनंत-अपरिमित महिमा, कटि-तट कसे तनीर-९-२६।
कृपा सिंधु, अपराध अपरिमित छमौ, सूर तैं सब बिगरी-१-११५।
रहि रहि देख्यौ तेरौ ज्ञान। सुफल कसुत सरबस रस ले गयौ तू करन आयौ ज्ञान। बृथा कत अपलोक लावत कहत यह उपदेस-३१२३।
अर्जुन बहुत दुखित तब भये। इहाँ अपसगुन होत नित नये। रोवैं बृषभ, तुरग अरु नाग। स्याम द्यौस, निसि बोलैं काग-१-२८६।
रोग-विशेष, मृगी, | मूर्छ।
सुत भीतमजासुतपित नाहीं चहत हार | चित हेरों। अपसमार जहँ सूर समारत बहु बिषाद उर पेरों--सा ० ६७।
[हिं. अप = अपना + सर प्रत्य.)]
आप ही आप, मनमाना, अपनी तरंग का, अपने मन का।
रहु रे मधु कर मधु मतवारे………। लोटत पीत पराग कीच महँ नीच न अंग सम्हारे। बारंबार सरक मदिरा की अपसर रटत उघारे २९९०।
काहे को अपसोच मरति है। नैन तुम्हारे नाहीं---पृ० ३२१।
तातैं अब मरियत अपसोसनि। मथुरा हूँ तैं गये सखी री, अब हरि कारे कोसनि–१० उ०-८८।
भैनी मात पिता बंधव गुरु गुरुजन यह कहैं। मोसों। राधा कान्ह एक सँग बिलसत मन ही मन अपसोसों--१२२ १।
[हिं. अप-अपना + सं. स्वार्थी]
स्वार्थ साधने वाला, मतलबी है।
नैना, लुब्धे रूप को अपने सुख माई। अपराधी अपस्वारथी मोको बिसराई-पृ० ३२३।
सोच सोच तू डार देखि दीनदयाल अयो।….। अपहरन पुनि बरन बंस हरि जानि हौं केहि योग भयौ---१० उ०----१८।
तुव मुख देखि डरत ससि भारी। कर करि कै हरि हेरयौ चाहत, भाजि पताल गयौ अपहारी--१०.१९६।
[सं. अ = नहीं + पान == पेय]
भच्छि अभच्छ, अपान पान करि, कबहुँ न मनसा धापी। कामी बिबस कामिनी कै रस, लोभ लालसा थापी---१-१४०।
अपना, अपने वश का, अपने हाथ का।
निकट बसत हुती अस कियौ अब दूर पयाना बिना कृपा भगवान उपा उ न सूर अपान १० ३ ०-८१।
[सं. अ = नहीं + प्रा.पाप]
[सं. अ-नहीं-पाद, पात = पैर]
[सं. अ-नहीं-पाद, पात = पैर]
सब मिलि गए जहाँ पुरुोत्तम, जिहिं गति अगम, अपारा----१०-४।
रसना। एक नहीं सत कोटिक सोभा अमित अगरी पृ०---३१६।
जिसका पार न हो, सीमा रहित, बहुत बढ़ी चढ़ी।
ममता-घटा, मोह की बूंदे, सरिता मैन अपारौ। बूड़त कतहुँ थाह नहिँ। पावत, गुरुजन-ओट अधारौ---१-२०९।
[हिं. आत्मनो, प्रा., अत्तणो, आप्पणों हिं. अपना]
अनुप करि :- अपना करके, अपना समझकर। अपने अनुकूल बनाकर। उ.- जौ हरि ब्रत निज उर न धरैगो। तौ को अस त्राता जु अपुन करि कर कुंठाव पकरैगौ-१-७५।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
आत्मभाव, निजस्वरूप, आत्मज्ञान।
(क) अति उन्मत्त मोह-माया-बस नहिं कछु बात बिचारौ। करत उपाव न पूछत काहु, गनत न खोटो खारौ। इन्द्री स्वाद-बिबस निसि बासर आप अपुतपौ हारौ--१-१५२।
(ख) अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ। सब्दहिं सब्द भयौ उजियारोैं, सतगुरु भेद बतायौ--४-१३।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
(क) अपुनपौ आपुन ही बिसरायौ। जैसे स्वान काँच-मंदिर में भ्रमि भ्रमि भूकि मरचौ--२-२६।
(ख) अदभुत इक चितयौ हौं सजनी नंद महर कै आँगन री। सो मैं निरखि अपुनपौ खोयौ, गई मथानी माँगन----१०-१३७।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
ऐसौ कौन मारिहै तोको, मौहि कहै सो आइ। वाकौं मारि अपुनपो राखै, सूरब्रजहिँ सो जाइ-१०६०।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
कृष्ण कियौ मन ध्यान असुर इक बसत अँधेरे। बालक बछरन राखिहौं एक बार लै जाउँ। कछुक जनाऊँ अपुनपोै , अब लौं रह्यौ सुभाउ-४३१।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
अपनायत, आत्मीयता, सम्बन्ध।
प्रगनित गुन हरिनाम तिहारैं अनौं। अपुनपौ ) धारौ। सूरदास स्वामी यह जन अब, करत करत स्रम हान्यौ १-१५७।
[हिं. अपना+पोै या पा (प्रत्य.)]
[सं. अ = नहीं + पृष्ठ, पा. पुट्ट + पीठ
[सं. अ = नहीं + पृष्ठ, पा. पुट्ट + पीठ
[सं. अपुष्ट, प्रा. अपुट्ठ)
[सं. अस्फुट प्रा. अप्फुट]
[सं. अ = नहीं + पृष्ठ = पीठ, प्रा. पुट्ट = पीठ, हिं. अपूठना]
रावन हति, लै चलौं साथ ही, लका धरौं अपूटी। यातौं जिय सकुवात, नाथ की होइ प्रतिज्ञा झूठी-९-८७।
[सं. अ = नहीं + पूत = पवित्र]
मध्यवर्ती काल, बीच का समय।
जब लगि हरत निमेष अंतरा युगसमान पल जात---१३४७
गीत की स्थाई या टेक के अतिरिक्त पद या चरण।
(बाजा आदि) बजाना या फूँकना।
भरा हुआ, फैला हुआ, व्याप्त।
[सं. अ = नहीं + पीड = दबाना, ढकेलना]
[सं. अप्रविष्ट, पा. अपविठ्ठ, प्रा. अपइठ्ठ]
जहाँ पहुँच न हो सके, दुर्गम।
इन्द्र सभा में नाचने वाली देवांगना।
भोजन से तृप्त होना अधाना।
जो फूला या खिला न हो अविकसित।
[सं. अ = नहीं + बंध = बंधन]
जो बंधन में न हो, अबद्व, निरंकुश।
हमतौ रीझि लटू भइ लालन महाप्रेम तिय जानि। बंध अबध अमित निसि बासर को सुरझावति आनि-२८११।
[सं. अथ, प्रा. अह; अथवा सं. अद्य]
स्रुति अबतंस बिराजत हरिसुत सिद्ध दरस सुत ओर-सा. उ०-२७।
तोकौं अबध कहत सब कोऊ तातैं सहियत बात। बिना प्रयास मरिहौं तोकौं, आजु रैनि कै प्रात-९-७९।
(ख) रावन कह्यौ, सो कह्यौ न जाई, रह्यौ क्रोध अति छाइ। तब ही अबध जानि केै राख्यौ मंदोदरि समुझाइ---९-१०४।
शास्त्र में जिसे मारने का दान न हो।
[सं. अबोध पुं. हिं. अबोध]
त्यागी, संत, साधु, विरागी।
सरिता सिंधु अनेक अबर सखी बिलसत पति सहज सनेह--२७७१।
जो वर्णन न हो सके, अकथनीय।
[सं. अ = नहीं + वर्ण = रंग]
बिना रूप रंग का, वणंशून्य।
सुक सारद से करत विचारा। नारद से पावर्हि नहिं पारा। अबरन बरन सुरति नहिँ धारै। गोपिनि के सो बदन निहारै-१०•३।
[सं. अ = नहीं + वर्ण = रंग]
जो एक रंग का न हो, भिन्न।
[सं. आराधन, हिं. अवराधना ]
उपासना करे, पूजे, सेवा करे।
ऊवौ मन न भए दस-बीसं। एक हुतो सो गयौ स्याम सँग को अबराधे ईस----३१४६।
अबल प्रहलाद, बलि दैत्य सुखहीं भजत, दास ध्रुव चरन चित-सीस नायौ--१-११९।
[सं. अबला + नि (प्रत्य.)]
अबलनि अकेली करि अपने कुल नीति बिसरी अबधि सँग सकल सूर भइ भाजै २८१६।
[सं. अबल = अजोर + हुताशन-अग्नि + मध्य-बी च ( अजोर' और 'अग्नि का मध्य = जोग)]
अबल हुताशन केर संदेसो तुमहुँ मद्ध निकासो---सा ० १०५।
मन मैं डरी, कानि | जिनि तोरै, मोहि अबला जिय जानि-९-७९।
अकल अनीह अबाध अभेद। नेति नेति कहि गावहिँ बेद।
खेलौ जाइ स्याम सँग राधा …...सँग खेलत दोउ झगरन लागे, सोभा बढ़ी अबाधा--७०५।
[सं. अ = बुरा + बेला = हिं. बेर == समय]
(क) सूरदास प्रभु कहत चलौ घर, बन मैं आजु अबार लगाई ४७१।
(ख) चलो आजु प्रातहि दधि बेचन नित तुम करति अबार---१०७८।
बानरहितजापति पतिनी से बाँधे बार अबार-सा० ३५।
उत ब्रजनारि संग जुरि कै वे हँसति करति परिहास। चलौ न जाइ देखियै री वै राधा को जु अबास----१६१९।
(क) अबिगत गति कछु कहते न आवै-१-२।
(ख) काहू के कुल-तन न बिचारत। अबिगत की गति कहि न परति है, ब्याध अजामिल तारत----१-१२।
(ग) अपद-दुपद-पसु-भाषा बूझत, अबि गत अल्प अहारी--८-१४।
जो विचलित न हो,अचल, स्थिर, अटल।
अजहूँ लगि उत्तानपादसुन अबिचल राज करै-१-३७।
मिथ्या, ज्ञान, अज्ञान, मोह।
कोटिक कला काछि दिख राई, जल थल-सुधि नहिँ काल। सूरदास की सबै अबिद्या दुरि करौ। नँदलाल----१-१५३।
व्यवस्था विरुद्ध, नियम रहित कर्तव्य विरुद्ध।
राग द्वेष विधि अबिधि, असुचि-सुचि, जिहिँ प्रभु जहाँ सँभारौ। कियौं न कबहुँ बिलंव कृपानिधि, सादर सोच निवारौ १.१५७।
[सं. अविनाशिन, हिं. अविनाशी]
अज, अबिनासी, अमर प्रभु, जनमै-मरै न सोइ-२-३६।
[सं. अविनाशिन, हिं. अविनाशी]
चोवा चंदन अबिर, गलिनि छिरकावनि रे-१०-१८।
श्देत रंग की बुकनी जो वल्लभ-सम्प्रदायी मंदिरों में उत्सवों पर उड़ाई जाती है।
अलक अबिरल, चारु हार-बिलास, भकुटी भंग-६२७।
[सं. अविवेकिन, हिं. अविवेकी]
[सं. अविवेकिन, हिं. अविवेकी]
प्रेमहिन। करि छीरसागर भई मनमा एक। य्य’म म’न से अंग चंदन अमी के अबिपेक---सा० उ०-५।
अबिहित बाद-बिबाद सकल मत इन लगि भेष धरत। इहिं बिधि भ्रमत सकल निस-दिन गत, कछु न काज सरत–१ ५५।
रंगीन बुकनी जो होली के दिनों में मित्र परस्पर डालते हैं।
उड़न गुलाल अबीर जोर तहँ विदिस दीप उजियारी--२३९१।
(क) खेलन कौं हरि दुरि गयौ री। संग संग धावत डोलत है, कह धौं बहुत अबेर भयौ री-१०-२१९।
(ख) आजु अबेर भई कहुँ खेलत, बोलि लेहु हरि कौं कोउ बाम री--१०.२३५।
चकित भई ग्वालिन-तन हेरौ। माखन छाँड़ि गई मथि वैसेहिं. तब तैं कियो अबेरौ। देखेै जाइ मटुकिया रीती, मैं राख्योै कहुँ हेरि-१०-२७१।
कीर कंदव मंजुका पूरन सौरभ उड़त अबेस। अगर धूप सौरभ नासा सुख बरसत परम सुदेस।
(क) हो रघुनाथ, निसाचर कैं संग अबै जात हौं देखी--९.६४।
(ख) जसुमति देख आपनो कान। बर्ष सर को भयौ पूरन अबै ना अनुमान-सा. ११४।
(ग) हरि प्रति अंग-अंग की सोभा अँखियन मग ह्वै लेउ अबै--१३००।
[सं. अ = नहीं + हिं. बोल]
जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भवसागर मैं कबहुँ न झुकै, अभय निसाने बाजैं-१-३६।
अभय दयौ :- शरण दी, निर्भय क्रिया। उ.- ब्रह्मा रुद्रलोक हूँ गयो। उनहुँ ताहि अभय नहिँ दयौ।
निर्भय करना, शरण देना, रक्षा का वचन देना।
न रहरि देखि हर्ष मन कीन्हौ। अभयदान प्रहलादहिं दीन्हौ---७-२।
पिता बचन खंडै सो पापी, सोइ प्रहलादहिँ कीन्हौ। निकसे खभ-बीच तै नरहरि, ताहि अभयपद दीन्हौ-१-१०४।
[सं. अ = नहीं + भार = बोझा]
(क) सूरदास कवन के अभरन लेै झगरिनि पहिराई--१०-१६।
(ख) इक अभरन लेहिँ उतारि, देत न संक करें---१०-२४।
[सं. अ = नहीं + हिं. बोल]
जिसके विषय में बोल न सके, अनिर्वचनीय।
[सं. अ = नहीं + हिं. बोलना]
मान या रिस के कारण न बोलना।
[सं. अ = नहीं + हिं. बोल ]
कबहुँ न भयौ सुन्यौ नहिँ देख्यौ तनु ते प्रान अबोले-२२७५।
आए माई दुर्ग स्याम के संगी।….। सूधी कहत सबन समुझावत, ते साँचे सरबंगी। औरन को सरवसु लै मारत आपुन भए अभगी।
भच्छि अभच्छ, अपान पान करि, कबहुँ न मनसा ध पी--१.१४०।
कबहुँ बाँधति, कबहुँ मारति, महरि बड़ी अभागि-३८७।
[सं. अभागिन, हिं. अभागिनी]
तृष्ना बहिन, दीनता सहचरि, अधिक प्रीति बिस्तारी। अति निसंक, निरलज्ज अभागिनि, घर-घर फिरत न हारी-१-१७३।
अभागा, भाग्यहीन, मन्दभाग्य।
प्रभु जू हौं तौ महा अधर्मी। अपत, उधार, अभागौ, कमी, विषय निपट कुकर्मो--१-१८६।
(क) तहँ अरि पंथ पिता जुग उहित बारिज बिबि रंग भजो अमास-सा० उ०-२८ और २७२३।
(ख) नाथ तुम्हारी जोति अभास। करत सकल जग मैं परकास १० उ.-१२९।
जो जन बिस्तार सिला पवनसुत उपाटी। किंकर करि बान लच्छ अंतरिच्छ काटी-९-९६।
(क)अंतरिच्छ श्री बंधु लेत हरि त्यौं ही आप अपनी घाती---सा. ५०।
(ख) अंतरिच्छ में परो बिंबफल सहज सुभाव मिलावों-सा. उ. १०३।
अंतरिच्छन सिंधु-सुत से कहत का अनुमान-सा. ७८।
(क) लगे फरकन अंतरिछ अनूप नीतन रंग--सा. ७५।
(ख) हरि को अंतरि छ जब देखी। दिग्गज सहित अनूप राधिका उर तब धीरज लेखी-सा. ८३।
अभिद अछेद रूप मम जान। जो सब घट है एक समान-३-१३।
मिला हुआ, सटा हुआ, सबद्ध।
अब इह बर्षा बीति गई।…..। उदित दारु चंद्रिका अवर उर अंतर अमृत मई। घटी घटा सब अभिन मोह मोद तमिता तेज हई-२८५३।
बाँधे अभिमान :- पर्व से युक्त हैं। उ.- अदि रसाल जगफल के सुत जे बाँधे अभिमान। सूरज सुत के लोक पठावत से सब करत नहान--सा० ९-७४।
[स. अभिमानी +हिं. नि (प्रत्य.)]
अभीमानियो से, अहंकारियों से।
यह आस। पापिनी दहै।…….धन-मद-मूढ़नि, अभिमानिनि मिलि, लोभ लिए दुर्बचन स है-१-५३।
[सं. अभि = सामने + रण = युद्ध]
[सं. अभि = सामने + रण = युद्ध]
नैन चकोर सतत ससि, कर अरचन अभिराम२-१२।
रमण करने वाली, व्याप्त होने वाली।
यमुना पुलिन मल्लिका मनोहर सरद सुहाई यामिनि। सुन्दर ससि गुन रूप राग निधि अंग अंग अभिरामिनि--पृ० ३४४।
[सं. अभिलषण, हिं. अभिलाखना]
बिधि मन चक्रित भयौं बहुरि ब्रज कौं अभिलाख्यौ-४९२।
(क) पट कुचैल, दुरबल द्विज देखत, ताके त दुल खाए (हो)। संपति दै बाकी पतिनी कौं, म म अभिलाष पुराए (हो)--१.७।
(ख) पर-तिय-रति अभिलाष निसादिन मन-पिटरी लै भरतौ-१-२०३।
[सं. अभिलषण, हिं. अभिलाखना]
जब हिरनाच्छ जुद्ध अभिलाष्यौ, मन मैं अति गरबाऊ-१०-२२१।
[सं. अभिलाषिन्, हिं. अभिलाषी]
चाह रखने वाला, इच्छुक, रुचि रखने वाला।
निर्गन कौन देस कौ बासी।……. कैसो बरन भेष है। कैसो केहि रस में अभिलासी–३०६२।
सविधि मंत्र-पाठ के साथ जल | छिड़कना अधिकार प्रदान करना।
नायक या नायिका का प्रेमिका या प्रेमी से मिलने के लिए संकेत-स्थल को जाना।
प्रिय से मिलने के लिए नायिका का संकेत-स्थल को जाना।
[सं. अभिसारणम्, हिं. अभिसारना]
घूमे-फिरे, बिचरण किया, बिहार किया।
धनि गोपी धनि ग्वारि धन्य सुरभी बनचारी। धनि इह पावन भूमि जहाँ गोविन्द अभिसारी----३४४३।
उपमा एक अभूत भई तब, जब जननी पट पीत उठाए। नील जलद पर उडुगन निरखत, तजि सुभाव मनु तड़ित छपाए-१०.१०४।
करि अलिंगन गोपिका, पहिरै अभूषन चीर १०-२६।
इह अछेद अभेद अबिनासी। सर्ब गति अरु सबै उदासी-१२-४।
जिसको भेदा या छेदा न जा सके।
[सं. अभि = सामने + रण = लड़ाई]
अभै (पद) दियौ :- निर्भय कर दिया। उ.- (क) ध्वहिं अभय पद दियौ मुरारी-१-२८। (ख) सदा सुभाव सुलभ सुमिरन बस, भक्तनि अभै दियौ-१-१२१।
जिसका भोग न किया गया हो, अछुता।
[सं. अ = नहीं + भोगी = भोग करनेवाला]
इन्द्रियों के सुख से उदासीन।
अभ्यन्तर अन्तर बसे पिय मो मन भाए-१९६४।
हमारी सुरत लेत नहिँ माधो। तुम अलि सब स्वारथ के गाहक नेह न जानत अधो। निसि लौं मरत कोस अभ्यन्तर जो हिय कहो सु थोरी। भ्रमत भोर सुख ओर सुमन सँग कमल देत नहिँ को री---३२४४।
बार-बार एक काम को करना, अनुशीलन, आवृत्ति।
नाना रूप निसाचर अद्भुत, सदा करत मद-पान। ठौर-ठौर अभ्यास महाबल करत कुत-असि-बान-९-७५।
निरखि सुन्दर हृदय पर भृगु पाद परम सुलेख। मनहुँ सोभित अभ्र अन्तर संभु भूषन बष-६३५।
अकल्याण, दुख, अशुभ चिह्न।
(क) भागे सकल अमंगल जंग के-१०-३२।
(ख) सूर अमंगल मन के भागे--२३६७।
जो धीमा न हो, तेज (प्रकाश वाला)।
रही न सुधि सरीर अरु मन की पीवति किरन अमंद-१०-२०३।
[सं. आम्नापिक = वंश का; अथवा सं. आत्मन। प्रा. अप्पण, हिं., अपना से अपनैक' ]
[सं. आम्नापिक = वंश का; अथवा सं. आत्मन। प्रा. अप्पण, हिं., अपना से अपनैक' ]
(क) मेरे हित इतनौ दुख भरत। मोहिँ अमर काहे नहिँ करत–१-२२६।
(ख) अज अबिनासी अमर प्रभु, जनमै-मरेै ने सोइ-२-३६।
ग्रह नछत्र अरु बेद अरब करि खात हरष मन बाढ़ो। तातैं चहत अमर पद तन को समुझ समुझ चित काढ़ो--सं ० ६५।
[स. अमरराज = इन्द्र + (इन्द्र का) सुन = अर्जुन = पार्थ (पार्थ = पाय = पंथ)]
माधौ बिलम बिदेस रहो री अमरराजसुत नाम रइनि दिन निरखत नीर बहो----सा. उ.----५१।
अमरापति चरनन लैं एरयौ अब बीते जुग गुन की जोर---९९५
भूषन सार सूर स्रम सीकर सोभा उड़त अमल उजियारी----सा० ५१।
चम्पकली सी राधिका राजत अमल अदोष---२०६५।
(क) आनंदकंद चंद मुख निमि दिन अवलोकन यह अमल परयो। सूरदास प्रभु सों मेरी गति जनु लुब्धक कर मीन तरयो-१०-८९१।
(ख) हरि दरमन अमल परयो लाज न लजानी।
राधा की एक सखी गोपी का नाम।
कहि राधा किन हार चुरायो। ब्रज युवतिनि सबहिन मँ जानाति घर घर लै लै नाम बतायौ।…….। अमला अबला कंजा सुकुता हीरा नीला प्यारि १५८०।
बुलाना, निमंत्रित करना न्योता देना
[सं. आमंत्रण, हि, अमातना]
आमंत्रित करके, निमंत्रण देकर आह्वान करके।
कह्यो महरि सोैं करौ चड़ाई, हम अपने घर जाति। तुमहूँ करौ भोग सामग्री, कुल-देवता अमाति--८१३।
गर्वरहित निरामान सीधा सादा।
मानशून्य, अप्रतिष्ठित, अनादृत।
करि कछु ज्ञान अभिमान जान दै है कैसी मति ठानी। तन धन जानि जाम जुग छाया भूलति कहा अमानी।
जो मनुष्य के स्वभाव से बाहर हो।
जो मनुष्य के स्वाभाव से बाहर हो। अपरिमित।
उलट रीति नंदनंदन की घरिधरि भयौ सताप। कहियो जाइ जोग आराधै अबिगत अकथ अमाप ....२९७९।
आदि सनातन, हरि अविनासी। सदा निरंतर घट-घट बासी।…..| जरा भरन तेै रहति अमाया। मातु पिता, सुत बंधु न जाया---१०-३।
निस्वार्थ, निषकपट, निश्छल।
माधौजू थह मैरी इक गाय। …..। यह अति हरहाई, हट कत हुँ बहुत अमारग जाति----१.५१
[स, अ = नहीं +हिं. मिटना]
जो नष्ट न हो, स्थायी, अटल, अवश्यंभावी।
(क) अबिगत-गति कछु कहत न आवै। ज्यौं गूगैं मीठे फल कौ रस अंतरगत ही भावै। परम स्वाद सबही सु निरन्तर अमित तोष उपजाबै---१-२।
(ख ) अग अग प्रति अमित माधुरी | प्रगटति रस रुचि ठावहिं ठाउँ ६६३।
महीन साड़ी के नीचे पहनने का वस्त्र जिससे शरीर दिखाई न दे।
चोली चतुरानन ठग्यौ, अमर उपरना राते (हो)। अँतरोटा अवलोकि कैंअसुर महा मदमाते (हो)-१-४४।
(क) रुक्म रिसाई पिता सौं कह्यौ। सुनि ताकौ अंतर्गत दह्यौ--१० उ.-७।
(ख) बारंबार सती जब कह्यौ। तब सिव अंतर्गत यौं लह्यौ–४.५।
चितवृत्ति, मनोकामना, भावना।
करि समाधि अंतर्गत ध्यावहु यह उनको उपदेस-२९८८।
इमरती नाम की मिठाई जो उर्द की फेटी हुई महीन पीठी। और चौरेठे की बनती है।
[सं. अ == नहीं + हिं. मिलन]
[सं. अ == नहीं + हिं. मिलन]
[सं. अ == नहीं + हिं. मिलन]
[सं. अ == नहीं + हिं. मिलन]
[सं. अमृत, प्रा, अमिआ, हिं. अमिय]
[सं. अमृत, प्रा, अमिआ, हिं. अमिय]
(क) अमी-वचन सुनि होत हुलाहल देवनि दिवि दुन्दभी बजाई-९-१६९।
(ख) स्याम मनि से अंग चंदन, अमी से अबिसेक--सा० उ०----५।
घट सुत असन समै सुत आनन अमीगलित जैसे मेत-सा ० उ०---२९।
[सं. अमित्र, प्रा. अमित्त]
नैन अमीन अधर्मिनि कैं बस, जहँ कौ तहाँ छायौ...१-६४।
पुरा्णानुसार समुद्र से निकले चौदह रत्नों में एक जिसे पोकर जीव अमर हो जाता है।
अव्यर्थ अचूक, वृथा न होने वाला।
प्रभु तव माया अगम अमोन है लहि न सकत कोउ पार ....३४९४।
प्रभु तव माया अगम अमोन है लहि न सकत कोउ पार ....३४९४।
मूँदि रहे पिय प्यारी लोचन अति हित वेनी उर परसाए बेष्टित भुजा अमोचन-पृ.-३ १८।
[हिं. अमोरी (आम + औरी-प्रत्य.]
[हिं. अमोरी (आम + औरी-प्रत्य.]
और सखा सब जुरि-जुरि ठप्ढ़े अप दनुज सँग जोरि। फल को न म बुझावन लागे हरि कहिं दियौ अमोरि---२३७७।
[सं. अ = नहीं + हिं. मोल]
लोभी, लंपट, विषयिनि सोैं हिंत, यौं तेरी निबही। छाँड़ि कनक-मनि रतन अमोल क काँच की किरच गही-१-३२४।
देखिबे की साध बहुत सुनि गुर बिपुन अतिहि सुन्दर सुने दोउ अमोले---२४६७।
अम्मर लेत :- वस्त्र हरण करना, वस्त्र हटाना। उ.- सुता दधिपति सौं क्रोध भरी। अम्मर लेत भई खिझि बालहि सारँग संग लरी--२०७५।
हरि कह्यौ साग-पत्र मोहि अति प्रिय, अम्रित ता सम नाहीं---१-२४१।
जाको अयन जल में तेहि अनल कैसे भावै ….३१२९।
किए अयाची याचक। जन बहुरि-१० उ०--२४।
सूरदास प्रभु कहोैं कहाँ लागे है अयान मतिहीनी----३४४९
मोहन कत खिझत अयाना लिए लाइ हिऐं नँदरानी----१०-१८३।
मूर्छिंत, संज्ञाहोन, बेहोश।
द्रिगजापति पतनी पति सुत के देलत हम मुर्झानी। उठि उठि परत धरनि पर सुन्दर मंदिर भई अयानी–सा ० ५५।
(क) ऊधौ जाहु तुम्हैं हम जानैं।…...बड़े लोग न बिवेक तुम्हारे ऐसे भए अयाने--२९०६।
जानत ती नि लोक की महिमा अगलनि काज अयाने-३२२१।
जानि-बुझि कैहौ कत पठबौ सट बाबरी अयानो३४६७।
अज्ञानता से युक्त, मूर्खतापूर्ण।
चूक परी मोको सबही अंग कहा करौं गई भूलि सयान्यौ। वे उतही को गए हरष मन मेरी | करनी समुझि अयान्यौ-१४६०।
सिर पर कंस मधुपुरी बैठो छिनकही में करि डारोै सोग। फूँकि-फूँकि धरणी पग धारौ अब लागीं तुम करन अयोग १४९७।
जो योग्य न हो, निकम्मा, अपात्र।
अवस्थानुसार नायिका के दस भेदों में से एक। ऐसी नायिका जिसका पति बाहर से आया हो।
सूर अन सग तजत आवत अयोपतिका स्रूप-सा, ३९।
[सं. अर्थ्य = पूजा द्रव्य]
जग अरंभ करि नृर तहँ गयौ--९-३।
[सं. अ + रंभ = शब्द करना]
हौं तौ न भयोै री घर, देखत्यौ तेरी यौं अर, फोरतौ बासन सब, जानति बलैया--३७२।
निसि दिन। कलमलात सुनि सजनी सिर पर गाजत मदन अर। सूरदास प्रभु रहीं मौन ह्वेै कहि न स कति मैन के भर-२७६४।
शरीर में लगाने का एक सुगंधित द्रव्य।
खर कोै कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन-अंग-१-३३२।
एक रंग जो अरगजें . की तरह होता है।
उर धारी लटैं छूटी आनन पर भीजी फूले लन सौं आली हरि संग के लि। सोधे अगरजी अरु मरग जी सारी केसरि खोरि बिराजाति कहुँ कहुँ कुचनि पर दरकी अँगिया घन बेलि–१५८२।
भले हाजू जाने लाल अरगजे भीने माल केसरि तिलक भाल मैन मंत्र काचे-२००३।
अरगजा को सुगंध से युक्त। उ-तहीं जा हु। जहँ रैन बसे हो। काहे को दहन हो आए अंग अंग देखति चिन्ह जैसे हो। अरगजे अंग मर गजो माला बसन सुगंध भरे से हो---१९५३।
सन्नाटा खीचे हुए, मौन, चुप साधे हुए।
(क) ब्रह्मादिक सब रहे अर गाइ। क्रोध देखि कोउ निकट न जाइ-७-२।
सूनैं सदन मथनियाँ कै ढिग, बैठि रहे अरगाइ--१०-२६५।
सुनि लीन्हों उनही को कह्यौ। अपनी चाल समुझ मन माहीं गुनि अरगाइ रह्यौ---३४६७।
प्रान रहे अरगाइ :- प्राण सूख गए. विस्मित हो गए। उ.- जासों जैसी भाँति चाहिए ताहि मिल्यौ त्यौं छाइ। देस देस के नृपति देखि यह प्रान रहे। अर गाइ-१० उ० १६२।
पूजा केै अवसर नंद समाधि लगाई। सालिग्राम मेलि मुख भीतर बैठ रहे अरगा ई--१०-२६३।
(ख) कुँवरि राधिका प्रात खरिक गई तहाँ कहू” धौं कार खाई। यह सुनि महरि मन हिं मुसुक्यानी, अबहिं रही मेरैं गृह आई। सूर स्याम राधहिं कछु कारन, जसुमति समुझि रही अरगाई-७५४।
(ग) जननी अतिहि भई रिसिहाई बार बार कहैं कुँअरि राधिका री मोती श्री कहाँ गँवाई। बूझे ते तोहि जवाब न आवै कहाँ।
सन्नाटा खींच कर, चुप्पी साधकर, मौन होकर।
एक समय रही अरगाई-१५४४।
(घ) तबहिं राधा सखियन पै आई। आवत देखि सबनि मुख मूंदयौ जहाँ तहाँ रहीं अरगाई-१२८५।
छाँट लूँ, चुनूँ. नाम गिनाऊ।
बरनि न जाइ भक्त की महिमा बारंबार बखानौं। थ्रुव रजपूत बिदुर दासीसुत कौन कौन अरगानौं-१-११।
वह जल जो फूल, अक्षत आदि के साथ देवता पर चढ़ाया जाय।
वह जल जो हाथ-मुँह धोने के लिए किसी अभ्यागत को उसके आते ही दिया जाय।
हरि कौ मिलन सुदामा अ यौ। बिधि करि अरघ पाँवड़े दैदे अंतर प्रेम बढ़ायो।
वह जल जो बरास के आने पर भेजा जाय।
वह जल जो किसी के आने पर द्वार पर छिड़का जाय।
हृदय ते नहिं टरत उनके स्याम नाम सुहेत। अस्र सलिल प्रवाह उर मनो अरघ नैनन देत--३४८३।
(क) स्रवन सुजस सारंग-नाद-बिधि, चातकबिधि मुख-नाम। नैन:चकोर सतत दरसन ससि, कर अरचन अभिराम-२-१२।
(ख) स्रवन-कीतँनसुमिरन करै। पद-सेवन-अरचन उर धारै-९-५।
तुम न्याय कहावत कमलनैन। कमल-चरन कर कमल बदन छबि अरज सुनावत मधुर बैन---१९७७।
पांडु के मंझले पुत्र जो धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण और श्रीकृष्ण के अत्यंत प्रिय सखा थे। देवराज इन्द्र के आह्वान से कुंती के गर्भ से इनका जन्म हुआ था।
[सं. अवरुंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. अरुझना]
अटकता है, अड़ता हैं, हठ करता है।
ज्यौं बालक जननी सों अरझत भोजन को कछ माँगे। त्योहीं ए अतिही हठ ठानत इकटक पलक न त्यागे-पृ० ३३३।
[सं. अल = वारण करना, हिं. अड़ना]
[सं. अल = वारण करना, हिं. अड़ना]
हठ ठानता है; टेक बाँधता है।
मनसिज माधवे मानिनिहिं मारिहैं। त्रोटि पर लब अरततपर मौ अर निरषिनि मुख कों तारिहैं सा० उ०-४।
विरक्ति, चित्त का न लगना।
[सं. अल = वारण करना,हिं. अड़ना]
होनहारी होइहै सोइ अब इहाँ कत अरति। सूर तब किन फेरि राखे पाइ अब हेहि परति-२६६७।
भेंट, घूस, रिश्वत, उत्कोच।
(क) सूरदास प्रभु के जो मिलन को कुच श्री फल सों करति अकोर।
(ख) गए छँड़ाय तोरि सब बन्धन दै गए हँस नि अँकोर-३१५३।
[हिं. अंकोर (अल्प प्र.) + ई]
[हिं. अंकोर (अल्प प्र.) + ई]
तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे। फूँकति बदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाए अँकोरे-१०-२२४।
तापर सुन्दर अंवर झाँप्यो अंकित दंस तसी-२३०३।
कीनी प्रीति प्रगट मिलिवे की अंखियन सर्म गनाए--८३२।
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी-३०२९।
अपने ही अँखियानि दोष तै रबिहि उलूक न मानत---१-२०१।
कै हरि जू भए अन्तर्धान-१-२८६।
राधा प्यारी सङ्ग लिए भए अन्तर्धाना-- १७९२।
सूरदास प्रभु अंतर्यामी भक्त संदेह हर्यौ २५५२।
अंतर्द्धान, अदृश्य, लुप्त।
[सं. अल = वारण करना,हिं. अड़ना]
हठ करती है, टेक बाँधती है।
[सं. अर्थ + आई (हिं. प्रत्य.)]
समझा-बुझा कर, समाचार देकर।
पठवोै दूत भरत कौ ल्यावन, बचन कह्यौ बिलखाइ। दसरथ बचन राम बन गवने, यह कहियो अरथाई----९-४७।
[हिं. अर्थ + आना ( प्रत्य. )]
[हिं. अर्थ + आना ( प्रत्य. )]
मिली कुबिजा मलै लैकै सो भई अर धंग। सूर प्रभु बस भए ताके करत नाना रंग---२६७२।
कुबिजा स्याम सुहागिनि कीन्ही. रूप अपार जाति नहिं चीन्हीं। आपु भए पति वह अरधंगी। गोपिन नाव धरयौ नवरंगी--२६७५।
(क) अंत औसर अरध-नाम-उच्चार करि सुम्रत गज ग्राह तेैं तुम छुड़ाए--१-११९
कहै तौ जनक गेह दै पठवौं अरध लंक कोै राज-९-७९।
[सं. अर्द्ध = आधा + धाम = घर (घर का आधा == पाखा) (पाखा = पक्ष = दोसप्ताह)]
सखी री सुनु परदेसी की बात। अरध बीच दै गयौ धाम को हरि अहार चलि जात---सा० २३।
[सं. अल = वारण करना, हिं. अड़ना]
बरषि निकरे मेघ पाइक बहुत कीने अरनि। सूर सुरपति हारि मानी तब परे दुहुँ चरनि----९९५।
भली कही यह बात कन्हाई, अतिहीँ सघन अरन्य उजारि--४७२।
अर्पण की, भेंट को, दान दी।
जांबवती अरपी कन्या भरि मनि राखी समुहाय। करि हरि ध्यान गयौ हरि पुर कौ जहाँ जोगेश्वर जाय।
प्रान अरपै :- प्रान सूख गये, विस्मित हो गये, अर्पण कर दिये। उ.- तड़ित आधात तररात उतपात सुनि नर-नारि सकुचि तनु प्रान अरपै---९४६।
[सं. अर्पण, हिं. वर्त, अरपना]
(क) पट अंतर दै भोग लगायौ, आरति की बनाइ। कहत कान्ह बाबा तुम अरप्यौ, देव नहीं कछ खाइ--१०-२६१।
(ख) हम प्रतीति करि सरबस अरप्यौ गन्यौ नहीं दिन राती-३४१८।
लड़खड़ाकर, लटपटाकर, अड़बड़ाकर।
(क) सिखवति चलन जसोदा मैया। अरबराइ करि पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया-१०-११५।
(ख); गहे अँगुरिया ललन की नँद चलन सिखावत। अरबराइ गिरि परत हैं, कर टेक उठावत---१०-१२२।
टूटने या गिरने का अरररर शब्द करके गिरते (हुए)।
अरररात दोउ बृच्छ गिरे धर। अति अघात भयौ ब्रज भीतर-३९१।
टूटने या गिरने का अरररर शब्द करके।
तरु दोउ धरनि गिरे भहराइ। जर सहित अरराई कै, आघात सब्द सुनाइ--३८७।
(क)बरत बन पात, भहरात, झहरात अररात तरु महा धरनी गिरायौ-५१६।
(ख) घटा घनघोर घहरात अररात दररात सररात ब्रज लोग डरपे--९४६।
टूटने या गिरने का। अरररर शब्द करना।
छाजन का किनारा जहाँ से वर्षा का पानी नीचे गिरता है। ओलती, ओरौनी।
सजनी नैना गये भगाइ। अरवाती को नीर वेरडी कैसे फिरिहैं धाइ पृ.-३३१।
नहिं दुरत हरि पिय कौ परस। मन को अति आनंद, अधरन रँग, नैनन को अरस--२१०८।
मार मार कहि गारिहे धृग गाय चरैया। कंस पास ह्वै आइयै कामरी चढ़ैया। बहुरि अरस तेैं आनि कै तब अंबर लीजै।….। अरस नाम है महल को जहाँ राजा बैठे। गारी दै दै सब उठे भुज निज कर ऐंठे-२५७५।
शिथिल पड़ना, ढीला होना, मंद होना।
मिलना, भेंटना, आलिंगन करना।
[सं. स्पर्शन, हिं. अरसना-परसना]
छूकर, मिलकर, लिपटकर, झपटकर।
(क) खेलत खात गिरावहीं, झगरत दोउ भाई। अरसपरस चुटिया गहैं, बरजति है माई-१०-१६२।
(ख) चलत गति करि रुनित किंकिनि घुँघरू झनकार। मनो हंस रसाल बानी अरस परस बिहार-पृ० ३४६।
(ग) जो जेहि बिधि तासो तैसेहि मिलि अरस परस कुसलात २९४१।
आँख मिचौनी का खेल, छुआछुई।
काहू के मन कछु दुख नाहीं। | अरसि परसि हँसि हँसि लपटाहीं।
अलसाना, निद्राग्रस्त होना।
[सं. अलस, हिं. अरसाना, अलसाना]
अलसाकर, निद्राग्रस्त होकर।
मरगजे हार बिथुरै बार देखियत आइ गई एक याम यामिनी। और सोभा सोहाई अंग अंग अरसाय बोलति है कहा अलसामिनी--१५८१।
जग अशज ह्वेै गयौ, रिषिन तब अति दुख पायौ। लै पृथ्वी कौ दान, ताहि फिरि बनहिँ पठायौ--९-१४।
जेहि रस सिव सनकादि मगन भए संभु रहत दिन साधा। सो रस दिए सूर प्रभु तोकों सिवा न लहति अराधा-१२३४।
हम अलि गोकुलनाथ अराध्यौ---३०१४।
को कर-कमल मयानो धरिहै को माखन अरि खैहै---२५१२।
केशी दैत्य का | शत्रु, कृष्ण।
अरे' कहकर बुलाना, तिरस्कार करना।
एक राक्षस का नाम जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था !
अघ-अरिष्ट, केसी काली मथि, दावानलहिँ पियौ---१-१२१।
संबोधनार्थक अव्यय जिसका प्रयोग प्रायः स्त्रियों के लिए ही होता है।
अरी अरी सुन्दर नारि सुहागिनि, लागौं तेरैँ पाउँ--९-४४।
खेवनहार ने खेवत मेरै, अंब मो नाव अरी-१-१८४।
रमा, उमा अरु सची अरुधति निसि दिन देखन आवैं--पृ० ३४५।
शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाला संयोजक शब्द।
बिद्रुम अरु बंधूक बिंब मिलि देत कबिन छबि दान-सा० उ०-१५।
इक परत उठत अनेक अरुझत मोह अति मनसा | मही--१० उ०-२४।
कहो तुमहि हमको कहा बूझति। लैलै नाम सुनावहु तुमही मोसों काहे अरुझति----११०६।
(क) बाबा नंद, झखत किहिँ कारन, यह कहि मयामोह अरुझाइ। सूरदास प्रभु मातु-पिता कौ, तुरतहिँ दुख डरियौ बिसराइ-५३१।
(ख) नागरि मन गई अरुझाइ। अति बिरह तन भई व्याकुल घर न नैँ कु समाई-६७८।
रहे अरुझाई-उलझा रहे हैं, फाँस रहे हैं।
कहत सखा हरि सुनत नहीं सो, प्यारी सों रहे चित अरुझाई-७१७।
भक्त बछल बानौं है मेरोै, बिरुदहिँ कहाँ लजाऊँ। यह कहि मया-मोह अरुझाए सिसु ह्वै रोवन लागे-१०-४।
लटका दिये, टाँग दिये। लीन्हे छीनि बसन सबही के सबही लै कुंजनि अरुझाए-१०९३।
मन हरि ली हो कुँवरि कन्हाई …..। कुटिल अलक भीतर अरुझाने अब निरुवारि न जाई-१४७७।
मेरौ मन हरि चितवनि अरुझानो १२०६।
उलझाते हो, फँसाते हो, रोकते हो।
सूरस्याम माखन दधि लीजै जुवतिन कत अरुझावत-११०४।
ज्ञाइ न मिलो सूर के प्रभु को अरुझेन सों अरुझाहीं-पृ०२३८।
उलझ गया, फँसा। यौ०-अरुभि परयो (रह्यो) उलझ गया, फँस गया।
(क) ग्वाल-बाल सब संग लगाए, खेलत मैं करि भाव चलत। अरुझि परयौ मेरौ मन तब तैं, कर झटकत चक-डोरि हलत.-६७१।
(ख) क्यौं सुरझाऊँ री नंदलाल सौं अरुझि रह्यो मन मेरौ ४१७०।
खसि मुद्रावलि चरन अरुझी। गिरी धरनि बलही--३४५१।
रसना जुगल रसनिधि बोलि। कनक-बेलि तमाल अरुझी सुभुज बंध अखोलि-सा० उ०--५।
(क) प्रगटी प्रीति न रही छपाई। परी दृष्टि बृषभानु-सुता की, दोउ अरुझे, निरुवारि न जाई-७२०।
(ख) मन तो गयौ नैन हैं मेरे। …….क्रम क्रम गए, कहयौ नहिं काहू स्याम संग अरुझे रे-पृ० ३२०।
(ग) चंचल द्रग अंचलपट-दुति छबि झलकत चहुँ दिसि झालरी। मनु सेवाल कमल पर अरुझे भँवत भ्रमर भ्रम चाल री--१०.१४०।
दधि सुत जामे नँददुवार। निरखि नैन अरुझ्यो मनमोहन, रटत देहु कर बारंबार-१०-१७३।
नली खुर अरु प्रश्न लोचन, सेत सींग सुहाइ-१-५६।
उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससाँक किरनहीन, दीपक सु मलीन, छीन दुति समूह तारे.---१०-२०५।
(क) नान्हीं एड़ियनि अरुनता, फल बिंब न पूजै--१३४।
(ख) सूर स्याम छबि अरुनता (हो) निरखि हरषि ब्रज-बाल-१०-४२।
महल का मध्यभाग जहाँ रानियाँ रहती हैं, रनिवास।
नप सुनि मन आनन्द बढ़ायौ। अन्त पुर मैं जाइ सुनायौ–४-९।
एक मिठाई जो चौरेठे या पिसे हुए चावल की बनती है।
सुंदर अति सरस अँदरसे। ते घृत दधि-मधु मिलि सरसे--१०-१८३।
इन पै दीरघ धनुष चढ़ै क्यों, सखि यह संसय मोर। सिय-अंदेश जानि सूरज प्रभु लियो करज की कोर-९-२३।
(क) सूर निर्गुन ब्रह्म धरि के तजहु सकल अंदेस-१९७४-
(ख) छिन बिनु प्रान रहत नहि हरि बिन निसदिन अधिक अंदेस-१७५३।
समै पाइ समुझाइ स्याम सों हम जिय बहुत अंदेसो - ३४३१।
रवि के उदय मिलन चकई को ससि के समय अँदेसो-३३६५।
लछिनन, रचौ हुतासन भाई।...... आसन एक हुतासन बैठी, ज्यों कुन्दन-अरुनाई ९.१६२।
नीलांबर, पाटंबर, सारी, सेत, पीत, चूनरी, अरुनाए---७८४।
बोले तमचुर चारो याम को गजर मारचौ पौन भयौ सीतल तमतमता गई। प्राची अरुनानी धानि किरिन उज्यारी नभ छाई उडगन चंद्रमा मलिनता लई---१६१०।
लाल रंग का, लाल किया हुआ है।
[सं. अरुण + आरा (प्रत्य.)]
सम्बोधनार्थक अव्यय; रे, ऐ, ओ।
(क) सुनि अरे अंध दसकंध, लै सीय मिलि, सेतु करि बंध रघुबीर आयौ-९-१२८।
[सं. अल = धारण करना, हिं. अड़ना]
[सं. अल = धारण करना, हिं. अड़ना]
अड़ गये, हठ करने लगे, ठान लिया।
(क) कलबल कै हरि आइ परे। नव रँग बिमल नबीन जलधि पर, मान हुँ द्वै ससि आनि अरे.---१०-१४१।
(ख) पठवति हौं मन तिनहिं मनावन निसि दिन रहत अरे री-१४४२।
(ग) को जानै काहे ते सजती हम सों रहत अरे १८४१।
(घ) लंपट लवनि अटक नहिं मानत चंचल चपल अरे रे-पृ०-३२५।
[सं. अल = धारण करना, हिं. अड़ना]
( क) को करि लेइ सहाइ हमारौ प्रलय काल के मेघ अरे--९५३।
(ख) बादर ब्रज पर आनि अरे ...-९६८।
[सं. अल == धारण करना, [हिं. अड़ना] |
हठ करता है, टेक पकड़ता है।
जब दधि मथनी टेकि अरै। आरि करत मटुकी गहि मोहन, बासुकि संभु डरै---१४२।
[सं. अल == धारण करना, [हिं. अड़ना] |
भिड़ता हैं, लड़ता है, रगड़ता है।
कह्यौ न काहू को करै बहुरि अरै एक ही पाइ दै इक पग पकरि पछारयौ-१० उ०-५२।
जा कारन तैं सुनि सुत सुन्दर, कीन्ही इती अरै। सोइ सुधाकर देखि कन्हैया, भाजन माँहि परे-१०-१९५
अड़ गया, हठ किया, ठान लिया।
क्यौं मारोैं दोउ नन्द ढोटोना ऐसी अरनि अरो-२४६१।
[सं. आ + रोगना (रुज = हिं.सा), हिं. अरोगना]
नन्द भवन मैं कान्ह अरोगेैं। जसुदा ल्यावै षटरस भोगैं---३९६।
रुकते हो, ठहरते हो, अड़ते हो।
हित की कहत कुहित की लागत इहाँ बेकाज अरौ---३ ०६६।
बेदन अर्क बिभूषित | सोभा बेंदी रिच्छ बखानो-सा० १०३।
षोड़शोपचार में से एक, जल दूध आदि मिलाकर देवता पर चढ़ाना।
पूजा करने के योग्य, पूजनीय।
मझले पांडव का नाम। ये परम वीर और धनुर्विद्या में निपुण थे। श्रीकृष्ण से इनकी बड़ी मित्रता थी।
वो वृक्ष जो गोकुल में थे। नारद ऋषि के शाप से कुबेर के दो पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव इन पेड़ों के रूप में जन्मे थे। श्रीकृष्ण ने इनका उद्धार किया था।
जमल अर्जुन तोरि तारे, हृदय प्रेम बढ़ा इ-४९८।
शब्द का अभिप्राय, भाव, संकेत।
एकन कर है अगर कुमकुमा एकन कर केसर लै घोरी। एक अर्थ सों भाव दिखावति नाचति तरुनि बाल बृद्ध भोरी-२४३६।
इन्द्रियों के पाँच विषय- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
चतुर्वर्ग (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) में से एक, धन संपत्ति।
कहा कभी जाके राम धनी।......। अर्थ, धर्म अरु काम मोक्ष फल चारि पदारथ देत गनी--१-३९।
प्रयोजन का कारण या स्वामी, श्रीकृष्ण
हम तो बँधी स्याम गुन सुन्दर छोरनहार न कोई। जो व्रज त जो अर्थ पति सूरज सब सुखदायक जोई-स० १०५।
अर्थापत्ति नामक अलंकार। इसमें एक बात के कहने से दूसरों की सिद्धि आप से आप हो जाती है। उक्त उदाहरण का आशय है--ब्रज में ऐसा कोई नहीं है। जो अपने अर्थपति कृष्ण को छोड़ दे जो सब सुखों के दाता हैं। इससे सिद्ध हो गया कि बिना कृष्ण के सुख नहीं मिल सकता।
[सं. अर्थ + आना (प्रत्य.)]
कहाँ स्याम की तुम अर्धांगिनी मैं तुम सर की। नाहींँ.-२९३७।
ऐसी प्रीति की बलि जाउँ। सिंहासन तजि चले मिलन कौ सुनत सुदामा नाउँ।…...। अर्धगी बूझत | मोहन को कैसे हितू तुम्हारे-१० उ०---६२।
दो सम भागों में से एक,आधा।
अर्ध निसा तिनकौं लै गयौ--१-२८४।
ऊधो यह राधा सों कहियौ।…...। कहाँ स्याम की तुम अर्धांगिनी , मैं तुम सर की नाहीं--, २९३७।
अर्पण करता | है भेंट देता है।
पाँडे नहिंँ भोग लगावन पावे करि करि पाक जबै अर्पत है, तबहीं तब छ्वै आवेै १०-२४९।
सिव-संकर हमकौंँफल दीन्हौ। पुहुप, पान,। नाना फल, मेवा षटरस अर्पन कीन्हौं--७९८।
[सं. अर्पण, हिं. अर्पना, अरपना]
अगनिक तरु फल सुगंधमृदुल-मिष्ट-खाटे। मनसा करि प्रभुहिँ अर्पि, भोजन करि डाटे--९-९६
अर्पण करने पर, भोग लगाने पर, भेंट देते हैं।
बदत बेद-उपनिषद, छहोँ रस अर्पै भुक्ता नाहिँ। गोपी ग्वालनि के मंडल मेँ हँसि-हँसि जूठनिं खाहिं-४८७।
[सं. अल = धारण करना, हिं. जड़ना]
जैसे गज लखि फटिकसिला मैँ, दसननि जाइ अरयौ-२-२६।
[सं. अल = धारण करना, हिं. जड़ना]
लपकि लीन्हों धाइ दबकि उर रहे दोउ भ्रम भयौ जगह कहाँ गए वैयौंँ । अरयौ दै दसन धरनी कढ़े बीर दोउ कहत अबहीं याहि मारेै कैचौं-२५९२।
अब लगि अवधि अलंबन करि करि राख्यौ मनहिंँ सवाहि। सूरदास या निर्गुन सिंधु हँ कौन सकै अवगाहि-३१४५।
शब्द और अर्थ में विशेषता लाने की युक्ति।
विभूषित, आभूषणों से युक्त।
(क) भूषन बार सुधार तासु रंग अँग अंगन दीपत ह्वै है। यह बिधि सिद्ध अलंकृत सूरज सब बिधि सोभा छैहै--सा० ९७।
(ख) सुर स्याम के हेत अलंकृत की नौ अमल सुमिल हितकारी----सा० ९८।
यों प्रतषेद अलंकृत जबहू सुमुखी सरस सुनायौ। सूर कहो मुसु काय प्रानप्रिय मो मन एक गनायौ-स० ९५।
करत बिंगते बिंग दूसरी जुक्त अलंकृत माँही-सा ० ८७।
अति बल करि·करि काली हास्यौ। लपटि गयौ सब अंग-अंग प्रति, निविष कियौ सकल अल (बल) झारयौ--५७४।
इधर-उधर लटकते हुए छल्लेदार बाल।
[हिं. अलक = बाल, लाड़ = दुलार (लडैता = दुलारा)]
सूर पशिक सुन, मोहि रैन दिन बढ्यौ रहत उर सोच। मेरो अलकलड़ै तो मोहन ह्वहै करत सँकोच-२७०७।
[सं. अलक = बाल + हिं. सलोना == अच्छा]
हम तेरे ही नित ही प्रति आवै सुनहु राधिका गोरी हो। ऐसो आदर कबहुँ न कीन्ही मेरी अल कसलोरी हो-पृ० ३१९।
मस्तक के इधर उधर लटकते हुए धुँघराले बाल।
बिथुरि अलकैं रहीं मुख पर बिनहिं बपन सुहाइ--१०-२२५।
(क) अलख-अनंत-अपरिमित महिमा, कटितट कसे तूनीर-९-२६।
(ख) ब्रह्मभाव करि मैं सब देखौ। अलख निरंजन ही को लेखौ-३३०८।
(क) जोपेै अलख रह्यौ चाहत तौ बादि भए ब्रजन' यक-३३९३।
(ख) पूरन ब्रह्म अलख अबिनासी ताके तुम हो ज्ञाता-२९१९।
कह्यौ म यत्रेय सों समुझाइ, यह तुम बिदुर हिं कहियौ जाइ। बदरिका सरम दोउ मिलि आइ। तीरथ करत दोउ अलगाइ-३-४।
[हिं. अलग + आना (प्रत्य.)]
[हिं. अलग + आना (प्रत्य.)]
जिसका लक्षण ने कहा जा सके।
(क) अँग फरकाइ अलप मुसुकाने-१०-४६।
(ख) सोभित सुकपोल-अधर, अलप. अलप दसना--१०-९०।
(ग) चपल द्रग, पल भरे अँसुवा कछक ढरि ढरि जात। अलप जल पर सीप द्वै लखि मीन मनु अकुलात-३६०।
[सं. अलभ्य + हिं. ला (प्रत्य.)]
भली स्याम कुसलात सुनाई सुनतहि भयौ अँदेसो-३१६३।
[सं. अंदोल = झूलना, हलचल]
भहरात झहरात दवा (नल) आयौ। घेरि चहुं ओर, करि सोर अंदोर वन , धरनि आकास चहुँ पास छायौ-५९६।
जैसें अंधो अंधकूप मैं गनत न खाल-पनार--१-८४।
काम अंध कछु रही न सँभरि। दुर्वासा रिषि कौं पग मारि-६-७।
क्यौं राधा फिर मौन गह्यौ री। जैसे नउ आ अंव भँवर खर तैस हि तै यह मौन कह्यौ री--१३१०।
[सं. अलभ्य + हिं. ला (प्रत्य.)]
[सं. अलभ्य + हिं. ला (प्रत्य.)]
आजु राधिका रूप अन्हायौ। देखत बने कहत नहिं आवै मुख छबि उपमा अन्त न पायौ। अलबेली अलक तिलक केसरि कौ ता बिच सेंदुर बिन्दु बनायौ-२०६३।
इहाँ ग्वालि बनि बनि जुरी सब सखी सहेली। सिरनि लिए दधि दूध सबैं यौवन अलबेली-१००७।
(क) कन्हैया हालरोै हलरोइ। हौं वारी तव इन्दु-बदन पर, अति छबि अलसभरोइ-१० ५६।
(ख) कुंजभवन तैं आजु राधिका अलस, अकेली आवत--सा० १३।
अलसा जाती है, कलांत होती है, शिथिलता का अनुभव करती है।
काया हरि के काम न आई। भाव-भक्ति जहँ हरि-जस सुनियत, तहाँ जात अलसाई---१-२९५।
आलस्य दिखाना, उदासीनता दिखाना।
अब मोसों अलसात जात हौ अधम-उधारनहारे-१२५।
आलस्य या शिथिलता | का अनुभव करना।
थक गये, क्रांत हुए, शिथिल हो गये।
बल मोहन दोऊ अलसाने-१०-२३०।
वह युवती जो अलसायी हुई या निद्रामग्न हो।
मरगजे हार बिथुरि बार देखियत आइ गई, एक याम यामिनी। औरै सोभा सोहाई अंग अग अरसाय बोलति है कहा अलसामिनी-९५८१।
अलिबाहन को प्रीतम बाला ता बाहन रिपु
[सं. अलिबाहन (कमल) + प्रियतम (कमल का प्रियतम = समुद्र) + बाला (समुद्र की वाला = समुद्र की स्त्री = गंगा) + बाहन (गंगा का वाहन करने वाला = शिव) + रिपु(शिव का रिपु = काम)]
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सौं संपुट माँझ गह्यौ-२८०९।
[सं. अलस + औहौं (प्रत्य.)]
आलस्ययुक्त, क्लांत, शिथिल।
[सं. अलस + औहां (प्रत्य.)]
क्लांत, आलस्ययुक्त, शिथिल।
जावक भाल नागरस लोचन मसिरेखा अधरनि जो ठए। बलि या पीठि | बचन अलिसौहैं बिन गुन कंटक हार बनाए--२०९१।
गावत स्याम स्यामा रंग। सुघरगतिनागरि अलापति सुर धारति पिय संग--पृ०-३५१ (७६)।
सुर खींचती है, तान लगाती है।
नटवर बेष धरे ब्रज आवत।….. अधर अनूप मुरलि सुर पूरत गौरी राग अलापि बजावत--२३४६।
दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ राई-१-२६९।
घास-फूस से जलायी हुई आग जिसको गाँव के लोग तापते हैं, कौड़ा।
हृदय से लगाने की क्रिया, परि रंभण।
( क ) करि अलिंगन गोपिका, पहिरै अभूषन-चीर-१०-२६।
(ख) सूर लरयौ गोपाल अलिगन सकल किए कंचन घट .. ८९०।
छिति पर कमलकमल पर कदली पंकज कियौ प्रकास। तापर अलि सारँग प्रति सारँग रिपु लै कीनो बास-सा. उ. २८।
हौं अलि केतने जतन बिचारौं। वो मूरत वाके उर अन्तर बसी कौन बिधि टारौं सा. ६७।
जो लिप्त न हो, जो कोई संबंध न रखे, बेलौस, निर्लिप्त।
जीवन-मुक्त रहै या भाइ। ज्योँ जल-कमल अलिप्त रहा इ--३-१३।
रोग द्वेष से मुक्त, अनासक्त।
देहऽभिमानी जीवहिँ जानै। ज्ञानी तन अलिप्त करि मानै---५.४।
[सं. अलि = भौंरा + बाहन = राबारी]
(क) गुन गावत मंगलगीत, मिलि दस पाँच अली-१० २४।
(छ) का सतरात अली बतरावत उतने नाच नचावै-सा ० ८४।
(ग) बन ते आजु नँदकिसोर। अली आवत करत मुरली की भहाधुनि घोर--सा. ३९। श्रेणी, पंक्ति।
[सं. अ = नहीं +हिं. लोक ]
[सं. अलि = भौंरा + गण (भौंरों का समूह। भौंरे काले होते हैं, इसलिए अलीगन सें अर्थ लिया गया, कालिमा = श्यामता = काजल )]
चारि कीर पर पारस बिद्रुम आजु अलीगन खात--सा० ९।
[सं. अ = नहीं + लीन = रत]
[सं. अ = नहीं + लीन = रत]
[अवरंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. उलझना]
[अवरंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. उलझना]
[अवरंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. उलझना]
[अवरंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. उलझना]
[सं. लुट = लोटना = लड़खड़ाना]
पिवत धूम उपहास जहाँ तहँ अपयस स्रवन अलेखे--३०१४।
सूरदास यह मति आए बिन, सब दिन गए अलेख। कहा जानै दिनकर की महिमा, अंध नैन बिन देखे--२-२५।
का करति तुम बात अलेखे। मोसों कहति स्याम तुम देखे तुम नीके करि देखे-१३११।
अरु जो जतन करहुगे हमको ते सब हमहिं अलेखै। सूर सुमन सा तव सुख मानेै कमलनैन मुख देखेैं --३३९३।
जो देखने में न आवे, अदृश्य।
अनदेखी बात, मिथ्या दोष, कलंक।
[सं. अ = नहीं + लाल = चंचल]
एक अलंकार जिसमें अधेर की तुलना में आधार की अल्पता का वर्णन हो।
नैन सारँग सैन मोतन करी जानि अधीर। आठ रवि तें देख तब तें परत नाहिं गम्भीर। अल्प सुर सुजान का सो कहो मन की पीर-सा० ४४। [यहाँ नेत्रों की अपेक्षा रास्ते की अल्पता का वर्णन होने से ‘अल्प' अलंकार है]
समझ पड़ना, विचार में आना।
[सं. अवगत + हिं. ना (प्रत्य.)
निन्दा, करना, अपमान करना।
नीचा दिखाना, पराजित करना।
[सं. अव + गृ, हिं. अवगारना]
कहा कहत रे मधु मतवारे। …...। हम जान्यौ यह स्याम सखा है। यह तो औरे न्यारे। सूर कहा या के मुख लागत कौन याहि अवगारे--३२६८।
अथाह, बहुत गहरा, अत्यंत गंभीर।
(क) उर-कलिंद तैं धँसि जलधार। उरर-धरनि परवाह। जाहि चली घारा ह्वै अध कौ, नाभी-हृद अवगाह-६३७।
(ख) बिहरत मानसरस कुमारि। कैसे हुँ निकसत नहीं, हो रही करि मनुहारि। मौन पारि अपार रचि अवगाह अंस जु वारि-२०२८।
जल में प्रवेश करके स्न न करना।
[सं. अवगाहन, हिं. अबगहना]
खोजते हैं, ढूँढ़ते हैं, छानबीन करते हैं।
कबहुँ। निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर मौं पकरन चाहत। किलकि हँसत राजत द्वै दँतिगाँ, पुनि-पुनि ति हिँ अव. गाहत-१०-११०।
[सं. अवगाहन, हिं. अबगहना]
सोचते विचारते हैं, समझते हैं।
(क) नागरि नगर पंथ निह रै। …….।अंग सिँगार स्याम हि कीने वृथा होन यह चाहत। सूर स्याम आवहिँ की नाहीं मन-मन यह अवगाहत-१५९८।
(ख) कहा होन अबही यह चाहत। जहँ तहँ लोग इहै अवगाहन--१०४९।
[सं. अवगाहन, हिं. अबगहना]
धारण करते हैं, ग्रहण करते हैं, अपनाते हैं, स्थापित करते हैं।
अंधसुत - ध़तराष्ट्र के पुत्र।
अंबर गहत द्रौपदी राखी, पलटि अंधसुत लाजैं - १-३६।
ऐसे बादर सजल करत अति महाबल चलत घहरात करि अंधकाला---९४६।
[सं. अंध = अंधकार + हिं. धुंध]
अति विपरीत तृनावर्त आयौ। बात चक्र मिस ब्रज के ऊपर नंद पौरि के भीतर आयौ। अंधधुंध (अँधाधुंध) भयौ सब गोकुल जो जहां रह्यो सो तहाँ छपायौ--१०-७७।
(ख) कोउ ले ओट रहत बृच्छन की अंधधंध दिसि बिदिस भुलाने-९५१।
(ग) अँधधुंध मग कहूँ न सूझे--१०५०।
[सं. अवग'हन. हिं. अवगाहना]
सोच-विचार कर, समझ-बूझ कर।
जब मोहिँ अंगद कुसल पूछि हैं, कहा कहोैंगो ताहि। या जीवन तेै मरन भलो है. मैं देख्यौ अवगहि-९-७५।
(ख) यह देखत जननी मन ब्याकुल बालक मुख कहा अ हि। नैन उघारि, बदन हरि मूँघोै, माता मन अवगाहि-१०-२५३।
[सं. अवगाहन, हिं. अवगाहना]
कोउ कहै दैहैँ दाम नृपति जेतौ धन चाहैं। कोउ क है जैऐ सरन सबै मिलिबुधि अवगा हैं-५८९।
[सं. अवगाहन, हिं. अवगाहना]
ग्रहण करता है, धारण करता या अपनाता है।
(क) तमोगुनी चाहै या भाइ। मम बैरी क्यौ हूँ मरि जाइ। सुद्धा भक्ति मोहि कौं चाहैं। मुक्ति हुँ कौं सो नहिं अवगा है-३-१३।
(ख) तमोगुनी रिपु। मारि बो चाहै। रजोगुती धन कुटुँबऽवगा है-३-१३।
[सं. अवगाहन, हिं. अवगाहना] |
निमज्जित होता हूँ, धँसता या पैठता हूँ, मग्न होता हूँ।
चलाता या हिलाता डुलाता हूँ।
घाट-बाट अवघट जमुना तट बातै करत बनाइ। कोऊ ऐसौ दान लेते है कौने सिख पढ़ाय-१०२९।
[सं. अव = नहीं +हिं. चित्त]
[सं. उत्सं.ग, प्रा. उच्छंग, हिं. छग]
इक-इक रोम बिराट किए तन, कोटि-कोटि ब्रह्मांड। सो लीन्हों अवछंग जसोदा, अपनै भरि भुजदंड---४८७।
आज्ञा का उल्लंघन, अवहेला।
जोपै हृदय माँझ हरी। तो पै इती अवज्ञा उनपै कैसे सही परी–३२००।
[सं. आवर्तन, प्रा. आवट्टन]
[सं. आवर्तन, प्रा. आवट्टन]
औटाकर, आँच पर गरमाने से गाढ़ा करके।
[हिं. अवडेर + ना (प्रत्य.)]
. चक्कर में डालना, फँसाना।
घुमाव फिरावदार, चक्करदार।
[सं. अव + हिं. ढार या ढाल]
जैसी मौज हो, वैसा ही करने वाला, मनमौजी।
लच्छ सौं बहु लच्छ दीन्हो, दान अवढर-ढरन-१-२०२।
प्रकट होता, जन्मता, उत्पन्न होता।
जौ हरि कौ सुमिरन तू करतौ। मेरैं गर्भ आनि अवतरतो ४-९।
प्रकट होना, उपजना, जन्मना।
जन्मते, प्रकट होते, अवतार लेते।
जो प्रभु नर देही नहि धरते। देवै गर्भ नहीं अवतरते---११८६।
अवतरे, उत्पन्न हुए, जन्म लिया।
धनि माता, धनि पिता, धन्य सो दिन जिहि अवतरि-५८९।
जन्म लूँगा, प्रकट होऊँगा।
बहुरि हिमाचल केँ अवतरी। समय पाइ सिव बहुरो बरी-४-५।
प्रकट हुए, अवतार लिया, जन्मे।
बिष्नु-अंस सौँ दत्त अवतरे--४-३।
प्रकट हों, उपजें जन्म लें।
याकै गर्भ अवतरैं जे सुत, सावधान ह्वै लीजै-१०-४।
प्रकटा, जन्मा र उपजा पैदा हुआ।
धन्य कोषि वह महरि जसोमति, जहाँ अवतरयौ यह सुत आई-७६१।
नहिं ऐसौ जनम बारंबार। पुरबलो लौं पुन्य प्रगट्यौ, लह्यौ नर अवतार-१-८८।
स्वच्छ, निर्मल। पीत, पीला।
कोशल देश जिसकी प्रधान नगरी अयोध्या थी।
दसरथ चले अवध आनंदत--९-२३।
ग्रह निरुक्ति की अवध बाम तू भड सूर हत सखी नवीन--सा० ९६
(क) लोचन चातक जीवो नहिं चाहत। अवध गए धावस की आसा क्रम क्रम करि निरबाहत--२७७१।
( ल ) सूर प्रान लटि ला ज न छौंड़त सुमिरि अवध आधार-२८८६।
सिव न अवध सुन्दरी बधो जिन--१६८७।
सुखमा सीला अवधा नंद बृंदा जमुना सारि--१५८०।
लीन्हौ अवतार :- जन्म लिया, शरीर ग्रहण किया। उ.- तुम्हरेैं भजन सबहिं सिंगार। ........। कलिमल दूरि करन के काजैं, तुम लीन्हों जग मैं अवतार---१-४१।
अवतार धरना :- जन्म ग्रहण।
अवतार करना :- शरीर धारण किया।
परसुराम जमदाग्नि गेह लीनौ अवतारा---९१४।
त्रिभुवन नायक भयौ आनि गोकुल अवतारी-४९२।
(क) बारंबार बिचारति जसुमति, यह लीला अवतारी। सूरदास स्वामी की महिमा, कापै जात बिचारी-१०-३८८।
कहत ग्वाल जसुमति धनि मैया बड़ौ पूत तेैँ जायौ। यह कोउ आदि पुरुष अवतारी भाग्य हमारे आयो।
धन्य कोख जिहिं तोको राख्यौ, धन्य घरी जिहिं तू अवतारी-७०३।
रचे, बनाये, उत्पन्न किये।
आपु स्वारथी की गति नाहीं। बिधिना ह्याँ काहे अवतारे जुवती गुनि पछिनाहीं-पृ. ३२०।
उत्पन्न किया, रचा, बनाया।
अब यह भूमि भयानक लागै बिधिना बहुरि कंस अवतार यौ-२८३२।
यह ही मन आनन्द अवधि सब। निरखि सरूप बिबेक नयन भरि, या सुख तेैँ नहिं और कछु अब-१-६९।
निर्धारित समय, प्रति ज्ञात काल।
(क) इतने हिँ में सुख दियौ सबन कौ मिलिहैं अवधि बताइ---२५३३।
(ख) दिवसपति सुतमात अवधि विचार प्रथम मिलाइ-सा० ३२।
तेरी अवधि कहत सब कोउ तातै कहियत बात। बिनु बिस्बास मरि है तो कौं आजु रैन के प्रात।
अबधि बदी :- समय नियत किया। उ.- निसि बसि बे की अवधि बदी--मोहिं साँझ गएँ कहि आवन। सूर स्याम अनतहिं कहुँ लुबधे नैन भए दोउ सावन। अवधि देना---समय निश्चित करना।
दै सीता अवधेस पाइँ परि, रहु लकेस कहावत ९-१३३।
हमारी जन्म भूमि यह गाउँ। सुनहु सखा सुग्रीव-विभीषन, अवनि अजोध्या नाउँ-९-१६५।
[सं. अवनि = पृथ्वी + हिं. धरि ==धारण करने वाला]
भृकुटि को दंड अवनिधरि चपला बिबस ह्वेै कीर अरयौ-सा० उ० १४।
कुटिल अलक बदन की छबि, अवनी परि लोलै-१०-१०१।
(क) नहिं मोतैं कोउ अवर अनाथा-१ ०६९।
(ख) नवमो छोड़ अवर नहिँ ताकत दस जिन राखेै साल स,-२९।
पूजा या आराधना करने वाला।
योग ज्ञान ध्यान अवराधन साधन मुक्ति उदासी। नाम प्रकार कहा रुचि मा नहि जो गोपाल उदासी ३१०१।
उपासना करना, पूजा या सेवा करना।
उपासना की, सेवाअर्चना को।
ननी निरखि चकित रही.ठाढ़ी, दम्पति-रूप अगाधा। देखति भाव दुहुँ न कौ साई,जो चित करि अवराधा-७०५।
उपासना या पूजा-सेवा करके।
जोगी जन अदराधि फिरत जिहिँ ध्यान लगाए। ते ब्रजबासिनि संग फिरत अति प्रेम बढ़ाए-४९२।
उपासना करते हैं। पूजते हैं।
पति कै हेत नेम, तप साध। संकर सौं यहि कहि अवराधै-७९९।
[सं. अंध = अंधकार + हिं. धुंध]
स्याम अकेले आँगन छाँड़े, आपु गई कछु काज घरै। यहि अंतर अँधबाइ उठी (अँधवाह उठ्यो) इक गरजत गगन सहित घहरै-१०-७६।
रे दसकंध, अंधमति, तेरी आयु तुलानी आनि ---९-७९।
[सं. अंधवायु. हिं. अँधबाई]
( क ) इहि अंतर अँधबाह उठ्यौ इक, गरजत गगन सहित घहरै-२०-७६।
( ख ) धावहु नन्द गोहारि लगौ किन, तेरी सुत अँधवाह उड़ायो-१०-७७।
अति बिपरीत तृनाबर्त आयौ। बात-चक्र-मिस ब्रज ऊपर परि, नद पौरि के भीतर धायौ।…..। अँधाधुंध भयो सब गोकुल, जो जँह रह्यौ सो तहीं छपायौ--१०-७७।
[सं. अंधकार, प्रा. अँबयार]
अनुमान या कल्पना करता है, सो वता है।
(वित्र) खचिए या बनाइए, चित्रित कीजिये।
स्याम तन देखि री आपु तन देखिए। भीति जौ होइ तौ चित्र अवरेखिए-१०-३०७।
चंपक-पुहुप-बरन-तन-सुन्दर मनौ चित्र-अवरेखी। हो रघुनाथ, निसाचर कै संग अबै जात हौं देखी--९-६४।
फिरत प्रभु पूछत बन द्रुम बेली। अहो बंधु काहू अवरेखी (अवलोकी) इहिं मग | बधू अकेली-९-६४।
[सं. अवरोधना, प्रा. अवरोहन]
[सं. अव + लघना, हिं. अवलघना]
राम प्रताप, सत्य सीता कौ, यहै नाव-कन्धार। तिहि आधार छिन मेै अवलंध्यौ, आवत भई न बार-९-८९।
वे उत रहत प्रेम अवलंबन इतर ते पठयौ योग-३४९२ १
लिखे हुए, रँगे हुए, चित्रित।
ऐसे मेघ कबहुँ नहिँ देखे। अति कारे काजर अवरेखे-१०४८।
अनुमान या कल्पना करते हैं, सोचते हैं।
ऐसे 5, कहत गये अपने पुर सबहिं बिलक्षण देख्यौ। मनिमय महल फटिक गोपुर लखि कनक भूमि अवरेख्यौ।
[सं. अब = विरुद्ध-+ रेव = गति]
[सं. अब = विरुद्ध-+ रेव = गति]
[सं. अब = विरुद्ध-+ रेव = गति]
[सं. अब = विरुद्ध-+ रेव = गति]
[सं. अब = विरुद्ध-+ रेव = गति]
(क) ऊधौ हरि के अवरै ढंग-३३२७।
(ख) ऊधौ अवरै कान्ह भए-३३८४।
आश्रित, सहारे पर स्थित, टिका हुआ।
ऐसे और पतित अवलंबित ते छिन माहिं तरे---१-१९८
राधा की एक सखी गोपी का नाम।
ब्रज जुवतिनि सबहिन मैं जान ति घर-घर लै-लै नाम बतायी ........। अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि-१५८०।
(क) मुख आँसू अरु माखन-कनुका, निरखि बैन छबि देत। मानौ स्रवत सुधानिधि मोती उडुगन अवलि-सभेत--३४९।
(ख) अति रमनीक कदंब छाँह-रुचि परम सुहाई। रजत मोहन मध्य अवलि बालक छबि पाई-४९२।
अति सुदेश मृदु हरत चिकुर मन मोहन-मुख बगराई। मानौ प्रगट कंज पर मंजुल अलि-अवली फिरि आई----१०-१०८।
चित दै अवलोकहु नँदनंदन पुरी परम रुचिरूप। सूरदास प्रभु कंस मारि कै हो उ यहाँ के भूप-२५६१।
देखकर, निहार हरि केरी-२४५७।
(ख) सखी रही राधा मुख हेरी। चकृत भई कछु कहत न आवै, करन लगी अवसेरी-१६५२।
(ग) जब तें नयन गए मोहिं त्यागि।इंद्री गई, गया तन तें मन उनहिंबिना अवसेरी लागि---१८८४।
ढूँढ़ति है द्रुम-वेली बाला भईं बेहाल करति अवसेरे-१८१३।
सोहौं एक अनेक भाँति करि सोभित नाना भेष। ता पाछे इन गुननि गए तैं, रहिहोैं अवसेष-२-३८।
बिपति-काल पांडव-बधु बन मैं राखी स्य म ढरी। करि भोजन अवसेस जज्ञ को त्रिभुवन भूख हरी-१-१६।
चिह्नित करना, लकीर खींचना।
कुच कुंकुम अवलेप तरुनि किए सोभित स्यामल गात।
दिखाई देता है, सूझता है, निहारने ले।
(क) हृद बिच नाभि, उदर त्रिबली बर, अबलोकत भव-भय भाजै १-६९।
( ख) भव सागर मै पैरि न लीन्हौ।………...। अति गंभीर तीर नहिं नियरैं किहिं बिधि उतरयौ जात। नहिं अधार नाम अवलोकत, जिततित गोता खात-१-१७५।
फिरत बृथा, भाजन अवलोकत सूनैं भवन अजान-१-१०३।
रबि करि बिनय सिवहिं मन लीन्हौं। हृदय माँझ अवलोकन कौन्हौं-७९९।
(क) मैं बलि जाऊ स्थाम-मुख-छबि पर। ……..। बलि-बलि जाऊँ चारु अवलोकनि, बलि-बलि कुण्डल-रबि की-६६४।
(ख) उ.--.-मृदु मुसुकनि नेक अवलोक नि हृदये ते न हरै----१८८३।
(ग) देखि अचेत अमृत अवलोकनि चले जु सी चि हियौ-२८८६।
मरन अवस्था को नृप जानै। तो हूँ घर न मन मैं ज्ञाने-४-१२
तिरस्कार करना, अवज्ञा करना।
वह गढ़ा जिसमें कुम्हार बर्तन पकाते हैं।
(क) 'अबलौ नान्हे-नुन्हे तारे, ते सब बृथा-अकाज। साँचे बिरद सूर के तारत, लोकनि-लोक अवाज---१-९६।
(ख) कहियत पतित बहुत तुम तारे, स्रवननि सुनी अवाज-१-१०८।
(ग) त्राहि त्राहि द्रोपदी पुकारी, गई बैकुण्ठ-अवाज खरी---१-२४९।
ब्रज पर सजि पावस-दल आयौ।'......। चातक मोर इतर पर दागन करत अवाजै कोयल। स्याम घटा गज असन बाजि रथ चित बगाँति सजोयल--२८१९।
अकरम अविधि अज्ञान अवाया (अवज्ञा) अनमारग अनरीति। जाकौ नाम लेत अघ उपजे, सोई करत अनीति-१-१२९।
जो विचलित न हो। | सदा बनी रहने वाली, अटल, स्थिर।
खेलत नवल किसोर किसोरी।……...। देत असीम सकल ब्रज जुवती जुग-जुग अबिचर जोरी–२३९३।
[सं. अविनाशिन, हिं. अविनाशी]
सूर मधुपुरी आइकेै ये भए अविनासी।
संक्षिप्त लेखा या वृत्तांत।
करि अवारजा प्रेम-प्रीति को, असल तहाँ खतियावै। दूजे करज दूरि करि देयत, नैकुँ न तामै आवै-१-१४२।
(क) भयौ पलायमान दानव-कुल, व्याकुल सायक-त्रास। पजरत धुना, पताक, छत्र, रथ, मनिमय कनक-अवास -९-८३।
(ख) बाजत नंद-अवास बधाई। बैठे खेलत द्वार आपने सात बरस के कुँअर कन्हाई-९-१२।
चितवत मन्दिर भए आवास। महल महल लाग्यौ मनि पासा-२६४३।
जिसमें विकार न हो, निर्दोष।
व्यर्थ हो, निष्प्रयोजन ही, वृथा ही।
सूतत रही अविर्था सुरपति--१०३९।
[सं. अंधकार. प्रा. अँधयार]
भयउदधि जमलोक दर सै निपट ही अँधियार-१-८८।
[सं. अंधकार, प्रा. अँधयार]
[प्रा. अँधयार +हिं. ई = अँधारी]
तेज आँधी जिससे अंधकार छा जाय,काली आँधी।
ता सँग दासी गई अपार। न्हान लगीं सब बमन उतार। अँधियारी आई तहँ भारी। दनुज सुता तिहिं तैं न निहारी। बसन सुक्र तयना के लीन्हे। करत उतावलि परे न चीन्हे-९-१७४।
[प्रा. अँधयार +हिं. ई = अँधारी]
अँधियारी भादौं की रात--१०-१२।
सूर स्याम मंदिर अँधियारै, ( जुबति ) निरखति बारंबार-१०-२७७।
उन्मत्त, मतवाले, आवेशयुक्त।
आयौ पर समझैँ नहीं हरि होरी है। राजा रंक अवेश अहो हरि होरी है-२४५३।
गरल अशन अहि भूषण धारी---८३७।
आषाढ़ नामक महीना जो ज्येष्ठ के पश्चात् और श्रावण के पूर्व आता है।
वल्लभकुल में मान्य आठ कृष्ण-श्रीनाथ, नवनीतप्रिय मथुरानाथ, विट्ठलनाथ,द्वारकानाथ, गोकुलनाथ, गोकुल चन्द्र, नदनमोहन।
अष्टम मास सँपूरने होइ-३-१३।
[सं. अष्टम = आठवाँ ( + ग्रह) सूर्य से आठवाँ ग्रह ‘राहु', फिर ‘राहु' शब्द से राह या रास्ता अर्थ हुआ)]
आवत थी बृषभानु नँदिनी आजु सषी के संग। ग्रह अष्टम मिली नंदसुत अंग अनंग उमंग-सा० ८२।
[सं. अष्ट ( = आठ = वसु, क्योंकि वसु आठ माने जाते हैं। + सुर ( = देव) (वसु + देव से बना वसुदेव )
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव।
[सं. (अष्ट == आठ, 'वसु' आठ होते हैं अतएव अष्ट = वसु) + सुर( = देव... दोनों को मिलाने से बना 'वसुदेव') + सुत (= (वसु देव के पुत्र)
ये है हेमपुर अष्ट सुरन सुन दिनपति ही को बास---सा० ९५।
योग-क्रिया के आठ भेद--यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि।
भक्तिपंथ कौं जो अनुसर। सो अष्टांग जोग कौं करैं-२-२१।
पुराणानुसार सर्पो के आठ कुल शेष, वासुकि कंबल, कार्बोटिक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। दूसरों के मत से आठ कुल ये हैं तक्षक, महापदभ, शंख, कुलिक, कंबल, अश्वतर, धृतराष्ट्र और बलाहक।
चिता मानि चितै अंतरगति, नाग-लोक कौं धाए। पारथ-सीस सोधि अष्टाकुल तब यदुनंदन ल्याए-१ २९।
वल्लभ-संप्रदाय में मान्य- श्रीकृष्णः शरणं मम।
भोजन सब लै धरे छहौं रस कान्ह संग अष्टौ सिधि-९२३।
किसी से संबंध न रखने वाला, न्यारा, निर्लिप्त, माया रहित।
मृग.तन तजि, ब्राह्मन-तन पायौ। पूर्व-जन्म-सुमिरन तहँ आयौ। मन मैं यहै बात ठहराई। होय असंग भजौं जदुराई-५ ३।
भ्रम-भायौ मन भयो पखावज, चलत असंगत चाल--१-१५३।
यह पूरन हम निपट अधूरी, हम असंत यह संत-१३२४।
जिसकी सम्हाल या देख भाल न हो सके।
असंभाव बोलन आई है, ढीठ ग्वालिनी प्रात-१०-२९०।
[सं. अ = नहीं + शंभु = कल्याण]
नसै धर्म मन बचन कार्य करि सभु असंभु करई। सिंधु अचं भौ करई)। अचला चल चलत पुनि थाकै, चिरंजीति सो मरई-९-७८।
(क) जौ हरि ब्रत निज उर न धरैगौ। तौ को अस त्राता जु अपुन करि, कर कुठावँ पकरैगौ---१-७५।
(ख) धन्य नंद, धनि धन्य जसोदा, जिन जायौ अस पूत--१०-३६।
ज्वाला-प्रीति, प्रगट सन्मुख हठि, ज्यौं पतंग तन जारयौ। बिषय-असक्त , अमित अध ब्याकुल, तबहूँ कछु न सँभारचौ-१.१०२।
साधु-सील सद्रूप पुरूष कौ, अप जस बहु उच्चरतौ। औधड़ असत कुचीलनि सौं मिलि, माया जल मेँ तरतो----१-२०३।
हुतौ आढय तब कियौ असदव्यय करी न ब्रजबन-जात्र। पोषे नहिं तुव दास प्रेम सौं पोष्यौ अपनौ गात्र---१-२१६।
असन, बसन बहु बिधि दए (रे) औसर-औसर आनि-१-३२५।
नृपति सुरसरी कैँ तट आइ। कियौ असनान मृत्तिका लाइ…...-१-३४१।
अंजन रंजित नैन, चितवनि चित चोरै, मुख-सोभा पर बरौँ अमित असमसर---१०-१५१।
[सं. अ = नहीं + हिं. सयाना]
[सं. अ = नहीं + हिं. सयाना]
जिसे कहीं शरण या आश्रय न हो, अनाथ।
प्रभु, तुम दीन के दुख-हरन। स्यामसुन्दर, मदनमोहन, बान असरन-सरन ५ २०२।
जिसे कहीं आश्रय न हो उसे शरण देने वाले, अनाथ के आश्रय दाता।
सो श्रीपति जुग-जुग सुमिरनब, बद विमल जस गावै। असरन-सरन सूर जाँचत है, को अब सुरति करावे---१-१७।
कहो नंद कहाँ छाँड़े कुमार। करुना कर जसोदा माता नैनन नीर बहै असरार-२६७१।
बटटा काटि कसूर भरम को, फरद तले लेै डारेै। निहवेै एक असल पै राखेै, टरै ईश्वर, ब्रह्म।
सूर मधुपुरी आइकै ये भए अविनासी।
व्यर्थ हो, निष्प्रयोजन ही, वृथा ही।
सूतत रही अविर्था सुरपति--१०३९।
उन्मत्त, मतवाले, आवेशयुक्त।
आयौ पर समझैँ नहीं हरि होरी है। राजा रंक अवेश अहो हरि होरी है-२४५३।
गरल अशन अहि भूषण धारी---८३७।
आषाढ़ नामक महीना जो ज्येष्ठ के पश्चात् और श्रावण के पूर्व आता है।
वल्लभकुल में मान्य आठ कृष्ण-श्रीनाथ, नवनीतप्रिय मथुरानाथ, विट्ठलनाथ,द्वारकानाथ, गोकुलनाथ, गोकुल चन्द्र, नदनमोहन।
अष्टम मास सँपूरने होइ-३-१३।
[सं. अष्टम = आठवाँ ( + ग्रह) सूर्य से आठवाँ ग्रह ‘राहु', फिर ‘राहु' शब्द से राह या रास्ता अर्थ हुआ)]
आवत थी बृषभानु नँदिनी आजु सषी के संग। ग्रह अष्टम मिली नंदसुत अंग अनंग उमंग-सा० ८२।
अँधियारै घर स्याम रहे दुरि--१०.२७८।
जब तैं हौं हरि रूप निहारौ। तब तैं कहा कहाँ री सजनी लागत जग अँधियारौ--सा. ४०।
स.- कहौ सँदेस सूर के प्रभु को यह निर्गून अँधियारो-३२९४।
अंधकारपूर्ण, अज्ञानतायुक्त।
तुम्हारी कृपा बिनु सब जग अंधु-पृ० ३६१।
अंधेर करना, अंधकारमय करना।
[सं. अंधकार, प्रा. अंबयार, हिं. अधेर]
[सं. अंधकार, प्रा. अंबयार, हिं. अधेर]
अन्याय, अविचार, अत्याचार।
[सं. अष्ट ( = आठ = वसु, क्योंकि वसु आठ माने जाते हैं। + सुर ( = देव) (वसु + देव से बना वसुदेव )
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव।
[सं. (अष्ट == आठ, 'वसु' आठ होते हैं अतएव अष्ट = वसु) + सुर( = देव... दोनों को मिलाने से बना 'वसुदेव') + सुत (= (वसु देव के पुत्र)
ये है हेमपुर अष्ट सुरन सुन दिनपति ही को बास---सा० ९५।
योग-क्रिया के आठ भेद--यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि।
भक्तिपंथ कौं जो अनुसर। सो अष्टांग जोग कौं करैं-२-२१।
पुराणानुसार सर्पो के आठ कुल शेष, वासुकि कंबल, कार्बोटिक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। दूसरों के मत से आठ कुल ये हैं तक्षक, महापदभ, शंख, कुलिक, कंबल, अश्वतर, धृतराष्ट्र और बलाहक।
चिता मानि चितै अंतरगति, नाग-लोक कौं धाए। पारथ-सीस सोधि अष्टाकुल तब यदुनंदन ल्याए-१ २९।
वल्लभ-संप्रदाय में मान्य-श्रीकृष्णः शरणं मम।
भोजन सब लै धरे छहौं रस कान्ह संग अष्टौ सिधि-९२३।
असंभाव बोलन आई है, ढीठ ग्वालिनी प्रात-१०-२९०।
[सं. अ = नहीं + शंभु = कल्याण]
नसै धर्म मन बचन कार्य करि सभु असंभु करई। सिंधु अचं भौ करई)। अचला चल चलत पुनि थाकै, चिरंजीति सो मरई-९-७८।
(क) जौ हरि ब्रत निज उर न धरैगौ। तौ को अस त्राता जु अपुन करि, कर कुठावँ पकरैगौ---१-७५।
(ख) धन्य नंद, धनि धन्य जसोदा, जिन जायौ अस पूत--१०-३६।
ज्वाला-प्रीति, प्रगट सन्मुख हठि, ज्यौं पतंग तन जारयौ। बिषय-असक्त , अमित अध ब्याकुल, तबहूँ कछु न सँभारचौ-१.१०२।
साधु-सील सद्रूप पुरूष कौ, अप जस बहु उच्चरतौ। औधड़ असत कुचीलनि सौं मिलि, माया जल मेँ तरतो----१-२०३।
किसी से संबंध न रखने वाला, न्यारा, निर्लिप्त, माया रहित।
मृग.तन तजि, ब्राह्मन-तन पायौ। पूर्व-जन्म-सुमिरन तहँ आयौ। मन मैं यहै बात ठहराई। होय असंग भजौं जदुराई-५ ३।
भ्रम-भायौ मन भयो पखावज, चलत असंगत चाल--१-१५३।
यह पूरन हम निपट अधूरी, हम असंत यह संत-१३२४।
जिसकी सम्हाल या देख भाल न हो सके।
अंजन रंजित नैन, चितवनि चित चोरै, मुख-सोभा पर बरौँ अमित असमसर---१०-१५१।
[सं. अ = नहीं + हिं. सयाना]
[सं. अ = नहीं + हिं. सयाना]
जिसे कहीं शरण या आश्रय न हो, अनाथ।
प्रभु, तुम दीन के दुख-हरन। स्यामसुन्दर, मदनमोहन, बान असरन-सरन ५ २०२।
जिसे कहीं आश्रय न हो उसे शरण देने वाले, अनाथ के आश्रय दाता।
सो श्रीपति जुग-जुग सुमिरनब, बद विमल जस गावै। असरन-सरन सूर जाँचत है, को अब सुरति करावे---१-१७।
कहो नंद कहाँ छाँड़े कुमार। करुना कर जसोदा माता नैनन नीर बहै असरार-२६७१।
हुतौ आढय तब कियौ असदव्यय करी न ब्रजबन-जात्र। पोषे नहिं तुव दास प्रेम सौं पोष्यौ अपनौ गात्र---१-२१६।
असन, बसन बहु बिधि दए (रे) औसर-औसर आनि-१-३२५।
नृपति सुरसरी कैँ तट आइ। कियौ असनान मृत्तिका लाइ…...-१-३४१।
बटटा काटि कसूर भरम को, फरद तले लेै डारेै। निहवेै एक असल पै राखेै, टरै न कबहूँ टारै। करि अबारजा प्रेम प्रीति को, असल तहाँ खतियावै–१-१४२।
(क) नृपति रिषिन पर ह्वै असवार। चल्यौ तुरंत सची कैँ द्वार--६-७।
करि अँतरधान हरि मोहिनी-रूप कौँ, गरुड़ असवार ह्वै तहाँ आए-८-८
अमरन कह्यो, करौ असवारी मानस कौ लेहु हँकारी---१०६६।
निकसै सवै कुँबर असबारी उच्चैश्रवा के पोर--१० उ०-६।
दूसरे की बढ़ती न सहन करने वाला, ईष्र्यालु।
जिसका साधन न हो सके, कठिन, दुष्कर।
महादेव कौँ | भाषत साध। मैं तौ देखौं बड़ी असाधु-४-५।
यह जिय जानि, इहीँ छिन भजि, दिन बीते जात असार। सूर पाइ यह समौ लाहु लहि, दुर्लभ फिरि संसार-१ ६८।
जो सित (सफेद) न हो, काला।
(क) आसित-अरुन-सित आलस लोचन उभय पलक परि अवै-१०-६५।
(ख) उज्ज्वल अरुन असित दीसति है, दुहुँ नननि की कोर-३५९।
हमारे हिरदै कुलसै जै त्यौ।……….। हमहूँ समुझि परी नीकै करि यहै। असित तन रीत्यौ--२८८४।
[सं. अशीति, प्रा. असीति, हिं. अस्सी]
(क) तासौं सुत निन्यानबे भए। भरतादिक सब हरि-रँग रए। तिन मैं नव-नव खंड अधिकारी। नव जोगेस्वर ब्रह्म-बिचारी। असी-इक कर्म बिप्र को लियौ। रिषभ ज्ञान सबहीं कौं दियौ ५ २।
(ख) असी सहस किंकर-दल तेहिके, दौरे मोहिं निहारि-९-१०४।
इक बदन उघारि निहारि, देहिं असीस खरी १०.२४।
जोरि कर बिधि सौं मानवति असीसै ले नाम। | न्हात बार न खसै इन कौ कुसल पहुँचे धाम-२५६५
[सं. असुर + हिं. आई (प्रत्य.)]
चद्र भाग सँग गयौ सुआखर-रिपु सब सुख। बिसराई। एक अबल करि रही असूया सुर सुनत | कह चाई---सा० ४९।
[सं. अ = नहीं + शैली = रीति)
रीति विरुद्ध कर्म करने वाला, कुमार्गी।
[सं. अ = नहीं + शैली = रीति)
[सं. अ = नहीं + शोक +हिं.•ई (प्रत्य.)]
स्त्रियों की छाती जिनमें दूध रहता है।
अस्तन पान कराई :- दूध पिलाती है। उ.- बालक लियौ उछंग दुष्टमति, हरषित अस्तनपान कराई--१०-५०।
बहुरि हरि आवहिंगे किहिं काम।…….। सूर स्याम ता दिन ते बिछुरे अस्ति रही कै चाम---२८२३।
ह्वै गए सूर सूल सूरज बिरह अस्तुत फेर--सा ० ३ ३।
पुनि सिव ब्रह्म अस्तुति करी-४-५।
फेंककर शत्रु पर चलाये जाने वाले हथियार, जैसे वाण, शक्ति।
वह हथियार जिससे दूसरे अस्त्र फेंके जायँ जैसे धनुष, बंदूक।
शत्रु के हथियारों की रोक करने वाले हथियार, जैसे ढाल।
मंत्र द्वारा चलाये जाने वाले हथियार।
अस्वत्यामा बहुरि खिस्याइ। ब्रह्म-अस्त्र कौं दियौ चलाइ-१-२८९।
[सं. अंधकार, प्रा. अंबयार, हिं. अधेर]
उपद्रव, गड़बड़, धींगाधिंगी, अनर्थ।
स.- महामत, बुधिबल को होनौ, देखि करै अंधेरा--१-१८६।
[सं. अंधकार, प्रा. अंबयार, हिं. अधेर]
स.- निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरषै मेघ-१०-५।
कृष्ण कियौ मन ध्यान असुर इक बसत अँधेरै-१०-४३१।
माधौ जू, मन सबहीं बिधि पोच। अति उन्मत्त निरंकुश मंगल, चिता राहत असोच-१-१०२।
हौं असौच आंकत, अपराधी, मनमुख होत लजाऊँ-१.१२८।
[सं. अ = नहीं + हिं. सौंध = सुगंध]
गगन गर्जत बीजु तरपति | मधुर मेह असेस---२२९०।
अस्थल लीपि, पात्र सब धोए, काज देव के कीन्हे--१०-२६०।
पतितपावन जानि सरन आयौ। उदधि ससार सुभ नाम-नौका तरन, अटल अस्थान निजु निगम गायौ-१-११९।
भीषम द्रोन करन अस्थामा सकुनि सहित काहूँ न सरी-१-२४९।
भक्तनि हाट बैठि अस्थिर ह्वै हरि नग निर्मल लेहि। कामक्रोध मद-लोभ मोह तू, सकल दलाली देहि-१-३१०।
करि अस्नान नंद घर आए-१०.२६०।
जब गजेंद्र को पग तू गैहै। हरि जू ताको आनि छुटे हैं। भएँ अस्पर्स देव-तन धरिहैं। मेरौ कह्यौ नाहिं यह टरिहै--६-२।
(क) कौर-कौर कारन कुबुद्धि, जड़, किते सहत अपमान। जँह-जँह जात तहीं तिहिं त्रासत अस्म लकुट, पदत्रान--१-१०३।
(ख) आपुन तरि तरि औरन तारत। अस्म अचेत प्रकट पानी मैं, बनचर लै लै डारत-९-१२३।
विपत्ति का समय, बुरा समय।
अस्वत्थामा भय करि भग्यौ।.....। अस्वत्थामा म जब लगि मारीं। तब लगि अन्न न मुख मै डारोैं -१-२८९।
एक महान् यज्ञ जिसमें घोड़े के मस्तक पर जय पत्र बाँध कर भूमण्डल की दिग्विजय की जाती थी। पश्चात , घोड़े की चर्बी से हवन किया जाता था जो साल भर में समाप्त होता था।
त्वष्टा की पुत्री प्रभा नामक स्त्री से उत्पन्न सूर्य के दो पुत्र। एक बार सूर्य का तेज सहन करने में असमर्थ हो, यम-यमुना नामक पुत्र-पुत्री के पास अपनी छाया छोड़, प्रभा भाग गयी और घोड़ी बनकर तप करने लगी। इस छाया से भी सूर्य को शनि और तप्ती नामक दो संतति हुई। पश्चात, प्रभा की छाया ने अपनी संतान से प्रेम और प्रभा के पुत्र-पुत्री का तिरस्कार करना आरंभ किया। फलतः प्रभा के भाग जाने की बात खुल गयी। तब सूर्य अश्वरूप में अश्विनी रूपिणी प्रभा के पास गये। इस संयोग से दोनों अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई।
ज्योँ महाराज या जलधि तैँ पार कियौ, भव-जलधि पार त्यौँ करी स्वामी। अहं ममता हम सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी-८-१६।
मैं और मेरा का भाव, ममत्व।
अपने को सब कुछ समझने का भाव, अहंकार, अभिमान।
अहभाव तैँ तुम बिसराए, इतनहिँ छुटयौ साथ-१-२०८।
मही एक अह। अरु निसि दुखी--१० उ०-१३८।
तृष्णा-तड़ित चमकि छनहीँ-छन, अहनिसि यह तम जारौ--१.२०९।
[हिं. अहक + ना (प्रत्य.)]
अकबर के समय के ऐसे सिपाही जो विशेष आवश्यकता के अवसर पर काम में लगाये जाते थे, शेष समय बैठे खाते थे। मालगुजारी वसूलने जकर ये आकर बैठ जाते थे और बकाया लेकर ही लौटते थे।
घेरयो आय कुटम-लसकर मैँ, जम अहुदो हठयो। सूर नगर चौरसी भ्रमि भ्रमि घर घर कौ जु भयौ-१-६४।
रे मन जनम अकारथ खोइसि। हरि की भक्ति न कबहूँ कीन्हीं, उदर भरे परि सोइसि। निस दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि-१-३३३।
(क) ताको पुत्र भयौ प्रहलाद। भयौ असुर-मन अति अहलाद-७-२।
(ख) आनंदित गोपी-ग्वाल नाचें दै दै ताल, अति अहलाद भयौ जसुमति गाइ कै-१०-३१।
(ग) हंस साखा सिखर पर चढ़ि करत नाना नाद। मकरनि जु पद निकट बिहरत मिलन अति अहलाद-सा ० उ०-५।
[सं. अहिवल्ली, प्रा. अहिबेली]
उरग लियौ हरिकौ लपटाई। गर्व बचन कहिकहि मुख-भाखत, मोकौं नहिं जानत अहिराइ-५५५।
सूर के त्याम, प्रभु लोक अभिराम, बिनु जान अहिरराज बिषज्वाल बरसै-५५२।
अहिलता रंग मिटयौ अधरन लग्यौ दीपकजात--२१३०।
गौतम ऋषि की पत्नी, जिसका सतीत्व इन्द्र ने भ्रष्ट किया था और जो पति के शाप से पत्थर की हो गयी थी। श्री रामचन्द्र के चरण-स्पर्श से इसका उद्धार हुआ।
[सं. अभिवाद्य, प्रा. अहिवाद]
(जब) कान्ह काली लै चले, तब नारि बिनबै देव हो। चेरि कौ अहिवात दीजै, करै तुम्हारी सेव हो---५७७।
[सं. अहि + हिं. शायी (सं. शायिन्)]
शेषनाग की शैया पर सोने वाले विष्णु।
हरिहर संकर नमो नमो। अहिसायी, अहिअंग बिभूषन, अमित दान, बल-बिष-हारी--१०-१७१।
नैकहू न थकत पानि, निरदई अहीरी-३४८।
[सं. आहारिन्, हिं. आहारीन्]
अपद-दुपद-पसु भाषा बुझत अबिगत अल्प अहारी-८-१४।
यह कह्यौ नंद रूप बदि, अहि इंद्र पैं गयौ मेरौ नंद, तुव नाम लीन्हौ---५८४।
दुर बासा दुरजोधन पठयौ पांडव अहित बिचारी। साक पत्र ले सबै अघाए, न्हात भजे कुस डारी-१ १२२।
छहौं रस जो धरौं आगैं, तंउ न गंध सुहाइ। और अहित भच्छ अभच्छति कला बरनि न जाइ---१-५६।
[सं. (अहि = नाग) अहिपति = ) ऐरावत = वंशी कौरव्य नाग) + सुता (= कौरव्य नाग की कन्या उलूपी) + सुवन (उलूपी का पुत्र बभ्रुवाहन)]
वभ्रु वहान जो अर्जुन का पुत्र था और जिसने युद्ध में पिता को मूर्छित कर दिया था।
अहिपति-सुता-सुवन सन्मुख ह्वै बचन कह्यौ इक होनौ। पारथ बिमल ब्भ्रुबाहन को सीस खिलौना दीनौं-१-२९।
चदन खोरि ललाट स्याम के निरखत अति सुखदाई। मानहुँ अर्धचंद्र तट अहिनी सुधा चोरावन आई--१३५०।
हम अबला अति दीन हीन मति तुमही हो बिधि योग। सुर बदन देखत ही अहुटै या सरीर को रोग
[सं. अध्युष्ठ, अर्द्ध मा. अड्ढडुढ]
(क) गरि गिरि परत, जाति नहिं उलँघी, अति स्रम होत नघावत अहुँठ पैग बसुधा सब कीनीं, धाम अवधि बिरमावत--१०-१२५।
(ख) जब मोहन कर गही मथानी।…..। कबहुँक अहुठ परग करि बसुधा, कबहुँक देहरि उलँधि न जानी।
लयौ घेरि मनो मृग चहुँ दिसि तु अचूक अहेरी नहिं अजान--२८३८।
केतिक सख जुगै जुग बीते मानव असुर अहेरौ--९-१३२।
(क) राखन हार अहै कोउ औरै, स्याम धरे भुज चारि-७-३।
(ख) मुरली मैं बीच प्रान बसंत अहै मेरो-१०.२८४।
विस्मयादिबोधक अव्यय जिसका बोध करुणा, खेद, प्रशसा, हर्ष विस्मय आदि सूचित करने के लिए होता है। कभी कभी संबोधन की तरह ही यह प्रयुक्त होता है।
(क) जिन तन-धन मोहिं प्रान समरपे, सील, सुभाव, बड़ाई। ताको बिषम बिष अहो मुनि मोपै सह्यौ न जाई ९-७।
(ख) अहो महरि पालागन मेरौ, मैं तुमरौ सुत देखन आई--१०-५१।
ग) नंद कह्यौ घर जाहु कन्हाई ऐसे मैं तुम जैहो जिनि कहुँ अहो महरि सुत लेहु बुलाई ९१२।
सुधि न रही अति गलित गात भयौ जनु डसि गयौ अह्यौ--२६६७।
देवनागरी वर्णमाला का दूसरा अक्षर। यह ‘अ’ का दीर्घ रूप है।
कतर मिलो लोचन बरषत अति दुत मुख के छबि रोयो। राहु केतु मानो सुमीड़ि विधु आँक छुटावत धोयो-३४८२।
एकहूँ आँक न हरि भजे, (रे) रे सठ, सूर गँवार---१-३२५।
[सं. आकर = मान (गहरी), हिं. आँकर]
[सं. आकर = मान (गहरी), हिं. आँकर]
[म, अक्षि प्रा. अकिख, पं. अँक्ख]
[हिं. आँख + ड़ी (प्रत्य. )
हरि ग्वालनि मिलि खेलन लागे बन में आँखि मिचाइ--२३ : ८ |
आवत न आँखि तर :- आँख तले नहीं आता, तुच्छ मानता है, कुछ नहीं समझता। उ.- नख-सिख लौं मेरी बह दही है पाप की जहा ज। और पतित आवत न आँखि तर देखत अपनी साज१-९६।
आँख गड़ि लागत :- (1 )खटकता है, चुभता है, बुरा लगता हैं। (2) मन में बसता है। ध्यान पर चढ़ता है पसंद आता है। उ.- जाहु भले हो कान्ह दान अँग-अँग को माँगत। हमरौ यौवन रूप आँखि इनके गड़ि लागत--१०२५।
आँखि दिखावत :- सक्रोध देखता है, क्रोध से घूरता है, कोप जताता है। उ.- आँखि दिखावत हौ जु कहा तुम कहिौ कहा रिसाय। हम अपनो भयौ करि लै हैं। छुवरि कुँअरि के पाय-२४४७।
आँखि धूरि देनी :-धोखा दिया, भ्रम में डाला। उ.- हरि की माया कोउ न जानैं आंखि धूरि सी दीनी। लाल ढिगनि की सारी ताको पीत उढ़नियाँ कीनी-६९४।
धूरि दै आँखि :- आँख में धूल झोंककर, धोखा, देकर, भ्रम में डालकर। उ.- सोइ अमृत अब पीसति मुरली सवहिन के सिर नाखि। लिए छँड़ाइ निडर सुनि सूरज धेनू धरि दै आँखि।
आँखि लगी :- (1) प्रीति हुई। (2) टकटकी बँधी, दृष्टि जम गयी। (3) नींद आयी झपकी लगी। उ.- बहुरचौ भूलि न आँखि लगी। सुपेनेहू के सुख न सहि सकी नींद जगाइ भगी--२७९०।
देखौं भरि आँख :- आँख भरकर देखूँ, इच्छा भर देखूँ, देखकर अघा जाऊँ। उ.- अबकैं जौ परचो करि पावौं अरु देखों भरि आँखि। सूरदास सोने कैं पानी मढ़ौं चोंच अरु पाँखि-९-१६४।
आँखि नहिं मारत :- पलक नहीं झपकाते, जरा नहीं थकते, विश्राम नहीं करते, भयभीत नहीं होते। उ.- जिहि जल तृन, पसु दारु बूड़ि, अपनैं सँग औरन पारत। तिहि जल गाजत महाबीर सब तरत आँखि नहिं मारत---९-११२।
उदासी, उत्साहहीनता, निराशा,
पाछे चढ़ो विमान मनोहर बहुरौ जदुपति होत अँधेरै-२५३२।
एक अँधेरो हिये की फूटी दौरत पहिर खराऊँ-३४६६।
अंधा प्राणी, नेत्रहीन व्यक्ति।
जैसे अध अब कूप मैं गनत न खाल-पनार---१-८४।
भादौं की अधराति अँध्यारी१०.११।
अलक वारत अँध्यारी तिलक भाल सुदेस–१४१३।
कबहुँ अघासुर बदन सामाने, कबहुँ अँध्यारैं जात न धाम--४९७।
आवहु बेगि चलौ घर जैऐ, वनहीं होत अँध्यारो-५०५।
अंब सुफल छाँड़ि, कहा से मर को धाऊँ १-१६।
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
मेरे दधि को हरि स्वाद न पायो। धौरी धेनु दुहाइ छानि पय मधुर आँच मैं औटि सिरायौ।
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
बएँ कर बाजि-बाग दहिने हैं बैठे। हाँकत हरि हाँक देत, गरजत ज्यौं ऐंठ। छाता लौं छाँह किए सोभित हरि छाती। लागन नहिं देत कहूँ समर आँच ताती-१-२३
[सं. अर्वि = आग की लपट, पा. अच्चि]
स्रवन मूँदी , मुख आँचर ढांप्यौ, अरे निसाचर, चोर-९-८३।
स्त्रियों को धोती, साड़ी आदि का सामने का भाग जो छाती, पर रहता है।
[हिं. आँख + नि (प्रत्य.)]
आँखिनि धुरि दई :- आँखों में धूल झोंकी, सरासर धोखा दिया, भ्रम डाला। उ.- ज्यौं मधुमखी सँचति निरंतर, बन की ओट लई। ब्याकुल होइ हरे ज्यौं सरबस आँखिन धूरि दई--१-५०।
अंगिरा के पुत्र वृहस्पति, उतथ्य और संवर्त।
[सं. अंगिका, प्रा. अँगिआ]
कहाँ मेरे कान्ह की तनक सी आँगुरी, बड़े बड़े नखनि के चिन्ह तेरे---१०-३०७।
ब्रह्म रुद्र डर डरत काल कैँ, काल डरत भ्रू भँग की आँची-१-१८।
प्रीति के बचन बाचे बिरह अनल आँचे अपनी गरज को तुम एक पाइ नाचे–२००३।
(क) रबि ससि कोटि कला अवलोकत त्रिबिध ताप छय गाइ। सो अंजन कर लै सुतचिच्छुहिँ आँजति जसुमति माइ--८८७।
(ख) निमिष निमिष में धोवति आँजति सिखए आवत रंग-पृ० ३२५।
कान्हँ गरे सोहति मनि-माला, अग अभूषन अँगुरिनि गोल। सिर चौतनी डिठौना दीन्होै आँखि आँजि पहिराइ निचोल-१०-९४।
सूरदास सोभा क्यों पावत आँखि आँधरी आँजै-३२३०।
सूर, कूर, आँधरौ, मेँ द्वार परयो गऊँ-१-१६६।
(क) सालन सकल कपूर सुबासत। स्वाद लेत सुन्दर हरि ग्रासत। आँब आदि दै सबै सँधाने। सब चाखे गोबद्धँनराने--३९६।
(ख) नींब लगाइ आँब क्यों खावै--१०४२।
(ग) मनौ आँब दल मोर देखिकै कुहुकि कोकिला बानी हो-१५५६।
[सं. अमालक, प्रा. आमलओ, हिं. आँवला]
गड्ढा जिसमें रखकर | कुम्हार मिट्टी के बरतन पकाते हैं।
[सं. काश = क्षत, हिं. गाँस]
इष्ट-मित्रों के यहाँ | भेजी जाने वाली मिठाई, भाजी।
संकर कौं मन हरयौ कागिनी, सेज छाँड़ि भू सोयो। चारु मोहिनौ आइ आँध कियौ तब नख-सिख तै रोयौ १४३
(क) कच खुबि आँधरि काजरी कानी नकटी पहिरै बरारि--३०२५।
(ख) सूरदास सोभा क्योँ पावत आँखि आँधरी आँजै–३२३९।
[सं. अश्रु. पा. प्रा. अस्सु]
निजकर चरन पखारि प्रेम-रस आनंद-आँसु ढरे-९-१७१।
[सं. अश्रु, पा. प्रा. अस्सु हिं. आँसू]
आँसुवनि मुख धोवै :- बहुत रो रहा है, बड़ा विलाप कर रहा है। उ.- देखो माई कान्ह हिलकियनि रोवै। इतनक मुख मखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवन धोवै-३४७।
[सं. अश्रु पा. प्रा. अस्सु]
सीमा, व्याप्ति अदि सूचक अव्यय जैसे-अमरण आजीवन। उप यह प्राय: ‘गति' सुचक धातुओं के पूर्व जुड़कर अर्थ में विशेषता लाता है जैसे-आगमन।
(क) कहा बिदुर की जति बरन है, आइ साग लियौ मंगी-१-२१।
(ख) सुख में आइ सबै मिलि बैठत,अ रहन। चहुँदसि घेरे-१ ७९।
आइ परै :- आजा, उपस्थित हो, सहना पड़े। उ.- सुख दुख कराति भाग आपने आइ परै सो गहियै --१-६२।
(क) सतयुग लाख वरस की आइ। त्रेता दस सहस्र कहि गाइ----१-२३०।
(ख) पाँच बरस की भई जब आइ। संडा गकंहि लियौ बुलाइ-७-२।
(ग) बीतैं जाम बोलि तब आयौ, सुनहु कस तब अइ सरयौ--१०-५९।
( आदर सूचक सम्बोधन) आगमन कीजिए, पधारिये।
टेरत हैं बार-बार आइयै कन्ह ई-६ १९।
कंस कारन गेंद खेलत कमल कारन आइयां-५७७।
आवेंगे। यौ. - लै आइहैं - ले आवेंगे।
नाग नाथि लै आइहैं, तब कहियौं बलराम---५८९।
सर्प इक आइहैं बहुरि तुम्हरैं निकट-८-१६।
स्थल-विशेष पर एकत्र हुई या पहुँची।
आजु बधायौ नंदराइ कैं, गावहु मंगलाचार। आईं मंगल-कलस साजिकै, दधि फल नूतन डा र-१०-२७।
[पुं. हिं. आवाना, हिं. आना)
आना' क्रिया का भूतकालिक स्त्रीलिंग रूप
बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुण्ठ पठाई-१-३।
जो सुख आई सो आई :- बिना सोचे समझे जो बात ध्यान में आयी, कह दी। उ.- भवन गई आतुर ह्वै नगरि जे आई मुख सबै कहो-२१४२।
हरि की सरन महँ तू आउ--१-३१४।
बीना-झाँझ-पखाउज-आउज और राजसी भोग। पुहुप-प्रजंक परी नवजोवनि, सुख रिमल-सजोग---९-७५।
नौका हौं नाहीं लै आऊँ-१-४१।
स्याम बाम को सुख दै बोले रै न तुम्हारे आऊँगो---१९४४।
मैया बहुत बुरी बलदाऊ। कहन लग्यौ) बन बड़ौ तमासो, सब मौड़ा मिलि ओऊ--४८१।
[पु. हिं. आवना, हिं. आना]
‘आना' क्रिया का भूतकालिक बहुवचन अथवा आदरसूचक रूप।
संतत भक्तमीत-हितकारी, स्याम बिदुर कैं आए--१-१३।
पकरयौ चीर दुष्ट दुस्सास न, बिलख बदन भइ डौलै। जैसे राहु नीच ढिग आऐं, चन्द्र-किरन झक झौलै-१-२५६।
जिहि दुहि धेनु औटि पय चाख्यो ते मुख परसैं छाक। ज्यौं मधुकर मधुकमलकोश तजि रुचि मानत है आक-पृ० ३३३।
तिन माया आकरषन करी। तब वह दृष्टि नृपति कैं परी---९२।
[सं. आकर्षण, हिं. आकर्षना]
सुर-प्रभु आकरषि ताते संकर्षन है नाक-२५८२।
(ख) कालिन्दी को निकट बुलायो जल-क्रीड़ा के काज। लियौ आकरषि एक छन में हलिकति सम रथ यदुराज।
[सं. आकर्षण, हिं. आकर्षना]
(क) सजन कुटुँब परिजन बढ़े (रे) सुत-दारा-धन-धाम। महामूढ़ बिषयी भयौ, (रे) चित आकष्या काम---१-३२५।
(ख) चित आकष्याँ नंद-सुत मुरली मधुर बजाइ ११८२।
नृपति रजक अंबर नृप धोबत--२५७४।
करषत सभा द्रुपद-तनया को अंबर अछय कियौ-१-१२१।
रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन सरन कहि भाषी। बढ़े दुकूल-कोट अंबर लौं, सभा-माँझ पति राखी-१-२७।
अबरवानी | भईसजल बादल दल छाए---१० उ.-६।
[सं. आम्र + राजी = पंक्ति]
अति दरेर की झरेर टपकत सब अँबराई-१५६५।
[सं. आम्र + राजी = पंक्ति]
अयोध्या के एक सूर्यवंशी राजा। इन्हें कहीं प्रशुश्रक का पुत्र कहा गया है और कहीं नाभाग का। राजा इक्ष्वाकु से ये अट्ठाइसवीं पीढ़ी में हुए थे : ये विष्णु के बड़े भक्त थे और उनके चक्र ने परम क्रोधी दुर्वासा मुनि के शाप से इनकी रक्षा की थी।
(क) सागर पर गिरि, गिर पर अंबर, कपि घन केैं आकार--९ १४।
(ख) इत धरनि उत ब्योम कैं बिच गुहा कैं आकारा। पैठि बदन बिदारि डारयो अति भये बिस्तार---४२७।
सुन्दर कर आनन समीप अति राजत इहिं आकार। जलरुह मनौ बैर बिधु सौं तजि, मिलत लए उपहार---१०.२८३।
स्वरूप, आकृति, मूर्ति, रूप।
एक मास यह ह्वै है नारि। दूजे मास पुरुष आकारि-९-२।
शून्य स्थान जहाँ चंद्र, सूर्य आदि स्थित हैं।
लंका राज बिभीषन राजैं, ध्रव आकाश बिराजैं--१-३६।
बाँधति आकास :- अनहोनी या असंभव बात कहती हो। उ.- कहा कहति डरप. इ कछु मेरे घट जैहै। तुम बाँधति आकास बात झूठी को सेहै।
सूर आकासबानी भई तबै तहँ यहै बैदेहि है, करु जुह। रा---९-७६।
कबहुँक बिरह जरति अति ब्याकुल अकुलता मन मो अति--१९४९।
जानु सुजघन करभ कर आकृति, कटि प्रवेश किंकिनि राजै---१-६९।
[सं. आख्यान, प्रा. अक्खान प. आखना]
[सं. अक्षि, प्रा. अक्खि = आँख]
गौरि गनेस्वर बीनऊ (हो) देवी सारद तोहिं। गावौं हरि को सोहिलोै (हो), मन आखर दै मोहिं १०-४०।
और न सी मोहू को जानति मोते वहुरि रम वंगी। सूर स्याम तोहिं बहुरि मिलैहौं आखिर हौं प्रगटावैगी--२१७७।
[सं. अक्षय, प्रा. अक्खय, हिं. आखा]
कहिबे जीय न कछु सक राखो। लावा मेलि दए हैं तुमको बकत रहो दिन आखो-३०२१।
अतिथि, पाहुना, आने वाला व्यक्ति।
तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेती तुम कीनौ जाग-९-२
मिल्यो सुहायौ साथ स्याम कौ कहाँ हंस कहाँ काग। सूरदास प्रभु ऊख छाँड़ि कै चतुर चचोरत आग--३०९५।
आंया हुआ प्रांप्त, उपस्थित।
आये हर व्यक्ति का आंदर-सत्कार, आवभगत।
मेरी कही साँचि तुम जानी कोजै आगत स्वागत। सूर स्य म राधाबर ऐसे प्रीति हिये अनुरागत-१४८२
(क) श्री मथुरा ऐसी आजु बनी। देखहु हरि जैसे पति आगम सजति सिंगार धनी--२५६१।
(ख) अविनासीकौ आगम जान्यो सकल देव अनुरागी-१०४
(ग) गिरि गिरि परत बदन तैं उर पर हैं दधि-सुत के बिंदु। मानहु सुभग सुधाकन बरसत प्रियजन आगम इन्दु--१०-२८३।
(घ) स्याम कह्यौ सब सखन सौं लावहु गोधन फेरि। संध्या कौ आगम भयौ ब्रज तन हाँकौ हेरि।
(ङ) निसि आगम श्रीदामा के सँग नाचत प्रभुहिं देखावौ--३४१०।
सूर स्याम ऐसे गुन आगर नागरि बहुति रिझाई (हो)-७० ०।
सूर स्याम बिनु क्यौं मन राखौं तन जोबन को आगर---२९८०।
आगर एक लोहजरित लीन्हो बलबंड। दुहूँ करन असुर हयौ भयौ माँस पिंड--९.९६।
(क) सोचि बिचारि सकल स्रति सम्मति हरि तें और ने नागर-१-९१।
(ख) ठाढ़े हैं द्विजबावन। चारौ बेद पढ़त मुख आगर, अति सुकंठ सुर गावन ८.१३।
[स. आकर-खान, हिं. पुं. आगर]
(क) मोहन तेरे अधीन भये री। इति रिस कबते कीजत री गुन आगरी नागरी--२२५०।
[स. आकर-खान, हिं. पुं. आगर]
मोहन ते रसरूप आगरी करति न जानि निकाई-१२३५।
समृद्ध, संपन्न, पूर्ण, भरी-पूरी।
तेरे अनउत्तर सुनि सुनि स्याम हँस हँसि देत नैक चितै इत भाग आगरी -२२५०।
भजि मन नंद-नंदन चरन। परम पंकज अति मनोहर, सकल सुख के करन। सनक संकर ध्यान धारत, निगम-आगम बरन १-३०८।
प्रथम समागम आनँद आगम दुलह वर दुलहिनीं दुलारी–१० उ.-३९।
दर्शन दियौ कृपा करि मोहन बेगि दियौ बरदान। आगम कल्प रमन तुव ह्वै हैं श्रीमुख कहीं बखान।
[सं. आकर = खान, हिं. आगर]
(क) सूर एक ते एक आगरे वा मथुरा की खानि–३ ०५१।
(ख) मधुकर जानत हैं सब कोऊ। जैसे तुम अरु सखा तिहारे गुनन-आगरे दोऊ-३३५३।
इहि उर आनि रूप देखे की आगि उठै अगि आई-३३४३।
भविष्य का होने वाला, आगे आने वाला।
जौ तु राम नाम धन धरतौ। अबकौ जन्म, आगिलौ तेरो, दोऊ जनम सुधरतौ--१-२९७।
सुनत मेघवतं क सजि सैन लै आए। जलवर्त, वारिवर्त, पवनवर्त, बज्रवर्त, आगिदतं, जलद संग आए।
[सं. अग्र, प्रा. अ्ग्ग, हिं. आगे]
ग्वालिन संग तुरंत वै धाई। अपने मन मैं हर्ष बढ़ाई। काहू पुरुष निवारयौ अई। कहाँ जाति है री अतुराइ। दिन तौ कह्यौ न कीन्हौ कानी। तन तजि चली बिनह अकुलानी। धन्य धन्य वै परम सभागी मिलीं जाइ सबहिनि तैं आगी-८००।
जीते जी, जीवन में, भविष्य के लिए।
पछिले कर्म सम्हारत नहीं करत नहीं कछु आगे---१-६१।
(क) अमिष, रुधिर, अस्थि अँग जौलों तौलों कोमल चाम-१-७६।
(ख) प्रकृति जो जाके अंग परी। स्वान पूछ को कौटिक लागे सूधी कहूँ न करी ... ३०१०
( क ) गर्भबास अति त्रास मैं ( रे ) जहाँ न एको अंग-१-३२५।
( ख ) अंग-अंग-प्रति-छबि-तरंग.गति सूरदास क्यौं कहि आवे-१-६९।
(ग) सकल भूषन मनिनि के बने सकल अँग, बसन बर अरुन सुन्दर सुहायौ---८.८।
दधिसुत-धर-रिपु सहे सिली मुख सुष सबै अंग नसायो-सा० ४६।
अंग छुअत हौं :- शपथ खाता हूँ। उ.- सुर हृदय तें टरत न गोकुल अग छुवत हौं तेरौ-१०. उ०-१२४।
अंग करै :- अपना ले, अंगीकार कर ले। उ.- जाकों मनमोहन अंग करै। ताकों केस खसै नहिं सिरतैं जौं जग बैर परै.-१-३७।
अंग भरै :- गोद में लेती है। उ.- मुख के रेनु झारि अंचल सौं जसुमति अंग भरे-२८०३।
[सं. आपाक = प्रवाँ, हिं. आँवा अँवा]
वह गढ़ा जिसमें कुम्हार मिट्टी के बरतन पकाते हैं।
विधि कुलाल कीने काचे घट ते तुम आनि पकाए।…...ब्रजकरि अँबा जोग ई धन सम सुरति अगि सुलगाए-३१९१।
इलावृत खंड का एक स्थान जहाँ जाने से पुरुप स्त्री हो जाता था।
पुति सुद्युम्न बसिष्ठ सौं कहयौ। अबाबन मैं तिय ह्वै गयौ ९.२।
गए सरस्वती तट इक दिन सिव-अंबिका पूजन हेत-२२९१।
काशी के राजा इंद्रद्युम्न की मझली कन्या जिसे हर कर भीष्म ने विचित्रवीर को ब्याह दिया था। विचित्रवीर को मृत्यु के बाद इससे व्यास जी ने नियोग किया जिससे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ।
(क) श्रीदामा चले रोइ जाइ कहिहौं नँद आगे-५८९।
(ख) माँगि लेहु एही बिधि मोसे मो आगे तुम खाहू-१००४।
(ग) अब न देहिं उराहनो जसुमतिहिं आगे जाइ-२७५६।
आगे हूँ के लोग भले हो पर हित लागे डोलत-३३६३।
पूजत सुरपति तिनके आगे-१०१६।
आगे कियौ :- आगे बढ़ाया, चलाया। उ.- चक्र-सुदर्सन आगे कियौ। कोटिक सूर्य प्रकासित भयौ।
आगे लेन सिधायौ :- स्वागत किया, अभ्यर्थना की। उ.- हरि आगमन जानि कै भीषम आगे लेन सिधायौ।
आगे ह्वै लयौ :- आगे बढ़कर स्वागत किया। उ.- तब ब्रजराज सहित सब गोपिन आगे ह्वै लयौ--३४४४।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग, हिं. आगे)
माधौ जू, यह मेरी इक गाइ।…...। अब आज तैं आप आगैं दई, लै आइए चराइ-१-५१।
(ख) माधौ, नैंकु हटको गाइ। …...छहौं रस जौ धरौं आगैं, तऊ न गंध सुहाइ---१-५६।
(ग) दोउ भुज धरि गाढ़ैं करि लीन्हे गई महिर के आगे-१०-३१७।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग, हिं. आगे)
(क) कहत हे आगैं जपिहैं राम। बीचहिं भई और की औरे, परयौ काल सौं काम----।
(ख) पाछै भयो न आगे ह्वै है, सब पतितनि सिरताज-१९६।
(ग) यह तौ कथा चलैगी अगै सब पतितनि मैं हाँसी-१-१९२।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग, हिं. आगे)
अग्नि से उत्पन्न, अग्नि-जनित।
[सं. अग्र, प्रा, अग्ग, हिं. आगे]
तौ तुम कोऊ तारयौ नाहिंन जोै मोसा पतित न दाग्यौ। स्रवननि सुनि कहत न एकोै, सूर सुधारौ आग्यौ-१-७३।
[सं. अर्ध, प्रा. अग्घ = मूल्य]
(क) चढ़ि गिरि-सिखर सब्द उचरयौ, गगन उठ्यौ आघात-९७४।
(ख) सागर पर गिरि, गिरि पर अंबर, कोप घन कैं आकार। गरज किलक आघात उठत, मनु दामिनि पावक झार ९.१२४।
(ग)महाप्रलय के मेघ उठि करि जहाँ तहाँ आघात-१०.६४।
मार, प्रहार, चोट, आक्रमण।
सुनत घहरानि ब्रज लोग चक्रित भये, कहा आघात धुनि करत आवेै--१०-६२।
शुद्धि के लिए मुँह में जल डालना।
यमुना तट आइ अक्रूर अन्हाए। स्याम बलराम कौ रूप ज़ल में निरखि बहुरि रथ देखि आचरज पाए-२५७०।
मुख मृदु बचन जानि मति जानहु, सुद्ध पंथ पग धरतौ। कर्म बासना छाँड़ि कबहुँ नहिं साप पाप आचरतौ-१-२०३।
व्यवहार में लाओ। आचरण करो।
(क) मृग तृष्ना आचार-जगत जल, तो सँग मन ललचावै। कहत जु सूरदास संत नि मिलि हरिजस काहे न गावै-२-१३।
(ख) जो चहै मोहिं मैं ताहि नाहीं चहौं, असुर को राज थिर नाहिं देखौं। तपसियन देखि कह्यौ, क्रोध इनमें बहुत, ज्ञानियनि मै न आचार पेखौं-८-८।
चरित्रवान, शुद्ध आचरण का।
परमेश्वर, जो चिंतन में नहीं आ सकता।
निसि सम गगन भयो आच्छादित बरषि बरषि भर इन्दु---९६७।
आछौ दिन सुनि महरि जसोदा सखिनि बोलि सुभ गान करयौ-१०-८८।
एक सखी हलधर वपु काछ्यौ। चढ़ी नीलपट ओढ़े आछयौ--२४१७।
वर्तमान दिन, जो दिन बीत रहा है, वह।
माधौ जू, यह मेरी इक गाइ। अब आज तेैं आप आगेैं दई लै आइयेै चराइ-१-५१।
जिसके हाथ घुटने तक लंबे हों।
[अ. क्रि. 'आछना' का कृदंत रूप]
होते हुए, विद्यमानता में सामने।
(क) लै पौढ़ी आँगन हीं सुत कौं. छिटकि रही अछाउजियरिया-१०-२४६।
(ख) सूर लखि भई मुदित सुंदर करत आछी उक्ति सा१४।
अच्छे, भले, उत्तम, श्रेष्ठ।
(क)आछे मेरे लाल (हो), ऐसो आरि न कीजै १०.१९०।
(ख) जैहैं बिगरि दाँत ये आछै, तातैं कहि समुझावति-१०-२२२।
(ग) मोर-मुकुट मकराकृति कुंडल, नैन बिसाल कमल हैं आछे ……. पहुँचे आई स्याम ब्रजपुर मैं, घरहिं चले मोहन-बल आछे--५०७।
बाँसुरी बजाइ आछे रंथ सौं मुरारी। सुनिकै धुनि छूट गई शंकर की तारी-६४९।
आधैं औटचौ मेलि मिठ ई, रुचि करि अँचवत क्यौं न नन्हैया-१०-२२९।
(क) आछौ गात अकारथ गारयौ। करी न प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम-जुवा ज्यौं हारचौ-१-१०१।
(ख) तुरत मथ्यौ दधि लागत अति प्यारो, और न भावै मोहिं-४९४
वृत्त, रोजी, जीवन का सहारा।
बहुरि सब प्रजा मिलि आइ नृप सौं कह्यौ, बिना-आजीविका मरत सारी-४-११।
आजु हौं एक-एक करि टरिहोै-११३४।
(क) सती सदा मम आज्ञाकारी-४-५।
(ख) पतिव्रता अति आज्ञाकारी--१० उ.-५९।
[सं. अष्टम, पा, अट्ठ, + हिं. एक]
[सं. अष्टम, प्रा. अट्ठत्र]
[सं. अष्ट, प्रा. अट्ठ, हिं. आठ]
सूर स्याम सहाइ हैं तौ आठहूं। सिधि लेहि-१-३१४।
माथे पर लगाने की लंबी टिकली।
स्त्रियों के माथे का आड़ा तिलक।
माथे पर पहनने का एक गहना।
(क) आठैं कृष्न पच्छ भादोैं, महर कैं दधिकादौं, मोतिन बँधायौ बार महल मैं जाइकै---१०-३१।
(ख) संबत सरस बिभावन, भादौं, आठैं तिथि, बुधवार। कृष्न पच्छ, रोहिनी, अर्द्ध निसि, हर्षन जोग उदार-१०.८६।
(ग) आठैं सुनि सब सानि भए हरि होरी है---१४१०।
हुतौ | आठ्य तब कियौ असदब्यय, करी न ब्रज-वन-जात्र। होषे नहिं तुव दास प्रेम सौं, पोष्यौ अपनी गात्र---१-२१६।
तड़क-भड़क टीमटाम, झूठा आयोजन।
पहिरि पटंबर, करि आडंबर, यह तन झूठ सिंगार्यो। काम-क्रोध मद-लोभ, तिया-रति, बहु बिधि काज बिगार्यो-१-३३६।
पुराणों के अनुसार इलावृत खंड का एक स्थान जहाँ जाने से पुरुष स्त्री हो जाते थे।
एक दिवस सो अखेटक गयौ। जाइ अंबिकाबन तिय भयौ--९-२।
सारंग मुख ते परत अंबु ढरि मनु सिव पूजति तपति बिनास-सा० उ० २८।
जंबुवृक्ष कहौ क्यों लंपट फलबर अंबु फरै ३३ १ १।
[सं. आम्र, प्रा. अंब, हिं. आम]
द्वादस बन रतनारे देखियत चहूँ दिसि टेमू 'फूले। भौंरे अँबुआ अरु द्रुम बेली मधुकर परिमल भुले--२३९१।
[सं. अंबु = जल + जा (स्त्री. [जल से उत्पन्न वस्तु)]
मनुदिन काम बिलास बिलासिनि वै अलि तू अंबू---२२७५।
आढ़ आढ़ कियौ :- टाल-मटोल किया, आजकल किया। उ.- जारि मोहिनी आढ़ आढ़ कियौ (चारु मोहिनी आइ आँधु कियौ) तब नखसिख तैं रोयौ-१-४३।
माथे पर पहनने का | स्त्रियों के लिये एक आभूषण।
(क) जब गज गह्यौ ग्राह जलफीतर, तब हरि कैं उर ध्याए (हो)। गरुड़ छाँड़ि, आतुर ह्वै धाए, सो ततकाल छुड़ाए (हो)-१-७।
(ख) नवसत साजि सिंगार बनी सुन्दरि आतुर पंथ निहारति-२५६२।
आतुर रथ हाँको। मधुबन को ब्रज जन भए अनाथ-२५३४।
ब्याकुलता, ब्यग्रता, अधीरता।
(क) सैननि नगरी समुझाइ। खरकि वहु दोहनी लै, यहै मिल छल लाइ। गाइ-गनती करन जैहैं, मोहि लै नैदराई। बोलि बचन प्रमान कीन्हौ, दुहुनि आतुरता इ-६७६।
(ख) स्याम काम तनु आतुरताइ-६७६।
(ख) स्याम काम तनु आतुरताई ऐसे बामा बस्य भए री-पृ.३५३ (९८)।
घबड़ाहट, व्याकुलता,व्यग्रता।
(क) स्याम कुंज बैठारि गई। चतुर दूतिका सखियन लीन्हें आतुरताई जानि लई–१८७६।
(ख) ज्यौं ज्यौं मौन भई तुम, उनके बाढ़ी आतुरताई २२७५।
आत पत्र मयूर चन्द्रिका लसति है रवि ऐनु--२७८५।
मोह-निसा को लेस रह्यौ नहिं. भयो विवेक बिहान। अतिम-रूप सकल घट दरस्यौ, उदय कियौ रवि-ज्ञान-२-३३।
( क) आत्म अजन्म सदा अविनासी। ताकौं देह-मोह बड़ फाँसी-५-४।
(ख) एकइ आतम ह-मतुम माँही-११-६।
नारि गई फिरि भवन आतुरी-३९१।
सूर स्याम भए काम आतुरे भुजा गहन पिय लागे-१८६६।
अपना ही मतलब साधने वाला, स्वार्थी।
सम्मान, सत्कार, प्रतिष्ठा।
अपने कौं कोन आदर देइ-१-२००।
ऊधो, चलौ बिदुर केैं जइयेै। दुर जोधन के कौन काज जँह आदर-भाव न पइयै---१-२३९
तेहिं आदरयौ त्रिभुवन के नायक अब क्यौं जात भिरयौ---१० उ-६८।
वह जिसका अनुकरण किया जाय।
[सं. अस् = होनी, सं. अस्ति, प्रा. अस्थि)
[सं. आत्मा = निज +ज्ञ = जानने वाला]
जीव और परमात्मा के सम्बन्ध की जानकारी।
सिंह-सावक ज्यौं तजैं गृह, इंद्र आदि डरात---१-१०६।
गाउँ. गाउँ के बत्सला मेरे आदि सहाई। इनकी लज्जा नहिं हमैं, तुम राज बड़ाई-१-२३८।
आदि दै :- आदि से लेकर, इत्यादि। उ.- इहिं राजस को, को न बिगोयौ ? हिरनकसिपु, हिरनाच्छ आदि दै, रावन, कुम्भकरन कुल खोयौ--१-५४।
कौसल्या आदिक महतारी आरति करहिं बनाइ-९-२९।
हरि दर्सन सत्राजित यायौ। लोगन जान्यौं आबत आदित इरिसौं जाइ सुनायौ---१० उ०-२६।
चतुर चेट की मधुरानाथ सौं कहियो जाइ आदेश-३१३३।
[सूर ने इसको प्रायः स्त्रीलिंग रूप में लिखा है।]
(क) आधा पैंड बसुधा दै राजा, ना तरु चलि सतहारी-८-१४।
(ख) हैं प्रभु कृपा करन रघुनन्दन, रिरा न गहैं पल आघ---९-११५।
[सं. अर्द्ध, १. अद्धो, प्रा. अद्ध]
किसी वस्तु के दो बराबर भागों में से एक,अर्द्ध।
(क) यहै निज सार, आधार मेरौ यहै, पतित-पावन बिरद बेद गावै-१-११०।
(ख) बेद, पुरान, सुमृति, संतनि कों, यह आधार मीन कौं ज्यौं जल-१-२०४।
आश्रयदाता। सहारा देने वाला व्यक्ति।
ससि चदन लरु अंभ छाँड़ि गुन बपु जु दहत मिलि तीन २८६६।
चढ़ि चढ़ि अमर विमान परम सुख कौतुक अमर छाए २६२२।
[सं. आपाक = आवाँ, हिं. आवाँ,अँवा ]
पेमघट उच्छवलित ह्वै है अंश नैन बहाइ-२४८६।
द्वारपाल इहै कही जौधा कोउ बचे नाहि, कांधे गजदत धरे सूर ब्रह्माअंशी--२६१०।
किसी वस्तु के दो बराबर भागों में से एक।
(क) ज्यौं कपि सीत-हतन-हित गुंजा सिमिटि होत लौलीन। त्यौं सठ वृथा तजत नहिं कबहूँ, रहत विषय-आधीन--१-१०२।
(ख) भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी-आधीन-१-३२१।
(ग) सूरदास प्रभु बिन देखियत है सकल बिरह आधीन--२५३९।
अति आधीन होन मति ब्याकुल कहाँ लौं कहौं बनाइ--२८११।
(क) पंच प्रजा अति प्रबल बली मिलि, मनबिधान जौ कीनौ। अधिकारी जम लेखा माँगे, तातै हौं आधीनौ--१-१८५।
(ख) मैं निज भक्तनि कैं आधीनौ-९-५।
समर मारहु कीट की रट सहत त्रिय आधीर-३१८०।
(क) कुटिल अलक मुख, चंचल लोचन, निरखत अति आनंदन--४७६।
(ख) कुँवरि सुनि पायौ अति अनिंदन-१० उ०-१६।
काशी, सप्त पुरियों में चौथी, बनारस।
(क) ब्रज भयौ महर कैं पूत, जब यह बात सुनी। सुनि आनंदे लोग सब, गोकुल-गनक-गुनी---१०-२४।
(ख) सूरदास प्रभु के गुन सुनि-सुनि अनन्दे ब्रजबासी-१०-८४।
आनंदै आनंद बढ्यौ अति। देवनि दिवि दुन्दुभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादव पति--१०-६।
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
(क) केतिक जीव कृपिन मम बपुरौ, तजै कालहू प्रान। सूर एकहीं बान बिदारैं, श्री गोपाल की आन-१-२७५।
(ख) मेरे जिय अब यहै लालसा लीला श्री भगवान। स्रवन करौं निसि-बासर हित सौं, सूर तुम्हारी आन-२-३३।
(ग) मोंहि. बृषभान बबा की मैया मंत्र न लैहै--स० १०।
[सं. अर्द्ध, पा. अद्धो, प्रा. अद्ध, हिं. अ धा]
आधे-मैं जल वायु समावै---३-२३|
हलधर निरखत लोचन आधे--२६०६।
[सं. अर्द्ध, पा. अद्धो, प्रा. अद्ध, हिं. आधा]
लालहिँ जगाइ बलि गई माता। निरखि मुख-चंद-छबि, मुदित भई मनहिँ मन, कहत आधै बचने भयो प्राता--४४०।
[सं. अद्धं, पा. अद्धो, प्रा. अद्ध, हिं. आधा]
(क) हौँ तौ पतित सिरोमनि माधौ। अजामील बातनि हीँ तारयो, हुतौ जु मोतौं आधौ--१.१३९।
(ख) बारंबार निरखि सुख मानत तजत नहीं पल आधो-२५०८।
[सं. अद्धं, पा. अद्धो, प्रा. अद्ध, हिं. आधा]
तुम अलि सब स्वारथ के गाहक नेह न जानत आधो---३२४४।
हर्ष, प्रसन्नता, सुख, मोद, आह्लाद।
आनंद मनाते हुए, प्रसन्न, हर्षित।
दसरथ चले अवध आनंदत----९.२७।
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
(क) मेरे जान जनकपुर फिरि है रामचन्द्र की आन।
(ख) रीछ लंगूर किलकारि लागे करन, आन , रघुनाथ की जाइ फेरी–९.१३८।
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
हम दधि बेचन जाति हैं। मथुरा मारग रोकि रहत गहि अंचल कंस की आन न मानै-१०४३।
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
[सं. आणि = मर्यादा, सीमा]
(क) आन देव की भक्ति भाइ करि कोटिक कसब करैगौ---१-७५।
(ख) सूर सु भुजा समेत सुदरसन देखि बिरंचि भ्रम्यौ। मानौ आन सृष्टि करिबे कौं अंबुज नाभि जभ्यौ-१.२७३।
(ग) जै दिवि भूतल सोभा समान। जै जै जै सूर, न सब्द आन-९-१६६।
कृष्ण के पिता वसुदेव जी जिनके जन्म पर देवताओं ने नगाड़े बजाये थे।
अत्यंत झुका हुआ, अति नम्र।
(क) माया मंत्र पढ़त मन निसि दिन, मोह मूरछा आनत-१-४९।
(ख) इनकैं गृह रहि तुम सुख मानत। अति निलज्ज कछु लाज न आनत १-२८४।
इते मान यह सूर महासठ हरि-नग बदलि बिषय बिष आतत--१-१४४।
तात कठिन प्रन जानि जानकी, आनति नहिडर धीर-९-२६।
कुटिल भृकुटि, सुख की निधि अनत, कलकपोल की छबि न उपनियाँ--१०-१०६।
आजु बन कोउ वै जनि जाइ। सब गाइनि बछरनि समेत, लै आनहु चित्र बनाइ---१०-२०।
किसी वस्तु का सोलहवाँ भाग
किसी स्थान की ओर चलना, पहुँचना।
रिषभदेव तबहीं यह जानी। कहयौ, इन्द्र यह कहा मन आनी-५-२।
गृह आने बसुदेव-देवकी, कंस महा खल मारयौ---१-१७।
अब मैं जानी, देह बुढ़ानी। सीस, पाउँ, कर कहयौ न मानत, तन की दसा सिरानी। आन कहत आनै केहि आवत, नैन-नाक बहै पानी---१-३०५।
कालीदह के फूल कहौ धौं, को आनै, पछितात-५२७।
जब रथ साजि चढ़ौं रने सन्मुख जय न आनौं तंक। राघव सैन समेत सँहारौं, करौं रुधिरमय पंक-९-१३४।
(कोई भाव या विशेषता) उत्पन्न करो।
(क) जड़ स्वरूप सब माया जानौ। ऐसौ ज्ञान हृदै मैं आनौ-३-१३।
(ख) सो अब तुम सौं सकल बखानौं। प्रेम-सहित सुनि हिरदै आनौं--१०.२।
(ख) कान्ह कयौ हौं मातु अघानौ। अब मो कौं सीतल जल आनौ--३९७।
(ख) गेंद खेलत बहुत बनिहै आनौ ६ देऊ जाइ-५३२।
[पुं. हिं. आवना, हिं. आना]
(कोई भाव) उत्पन्न हुआ या किया।
"(क) ब्रह्मा क्रोध बहुत मन आन्यौ-३.७।
(ख) नेक मोहिं मुसकात जानि मनमोहन मन मुख आन्यौ-२२७५।"
[सं. आत्मन्, प्रा. अत्तणो, अप्पण, पु. हिं. आपन]
पारथ के सारथि हरि आप भए हैं-१-२३।
सुनी अनसुनी करना, ध्यान न देना।
(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रोपदि आनि धरी–१-१६।
(ख) गुरु-सुत आनि दिए जमपुर तैं-१-१८।
हरि सौँ मीत न देख्यौं कोई। बिपति-काल सुमिरत तिहिँ ओसर आनि तिरीछौ होई-१-१६।
ख) सूर स्याम अबकै इहिँ औसर आनि राखि ब्रज लीजै-२८१९।
सगुन मूरति नंदनंदन हमहि आनिय देहुँ-३२८९।
लायी गयी, उपस्थित की गयी।
जब गहि राजसभा मैं आनी। द्रुपद-सुता पट-हीन करन कौं दुस्साहन अभिमनी---१-२५०।
[सं. आत्मन्, प्रा. अत्तणो, अप्पण, पु. हिं. आपन]
तुम' और 'वे' के स्थान में आदरार्थक प्रयोग।
[सं. आत्मन्, प्रा. अत्तणो, अप्पण, पु. हिं. आपन]
अस्तुति करी बहुत धुब सब बिधि सुनि प्रसन्न भे आप।
आप आप सौं :- स्वयं से, अपने मन में से। उ.- पूरब जनम ताहि सुधि रही। आप आप सौं तब यौं कही-५-३।
सुनि कृतघन, निसि दिन को सखा आपन, अब जो बिसारयौ करि बिनु पहचानि---१-७७।
[हिं. अपना + पौयापा (प्रत्य.)]
[हिं. अपना + पौयापा (प्रत्य.)]
गनिका तरी आपनी करनी, नाम भयौ प्रभु तोरौ १-१३२।
दुख, सुख, कीरति भाग आपनै आइ परै सो गहियै-१-६२।
दुख आवन कछ अटक न मानतः सूनो देखि अगार। अंशु उसाँस जात अंतर ते करत न कछू विचार--२८८८।
अयोध्या के सूर्यवंशी राजा जो सगर के पौत्र और असमंजस के पुत्र थे। सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म हो जाने पर अश्वमेध का घोड़ा खोजने ये ही निकले थे और इन्हें ही सफलता मिली थी।
(क) विष्नु-अंस सौं दत्तऽउतरे। रुद्र-अंस दुर्बासा धरे। ब्रह्म-अंस चंद्रमा भयौ---४-३।
(ख) राजा मंत्री सौं हित मानै। ताकैं दुख दुख, सुख-सुख जानै। नरपति ब्रह्म, अरु सुख-रूप। मन मिलि परयौ दुख कै कूप-.--.४.१२।
हरि उर मोहनि बेलि लसी। ता पर उरग ग्रसित तब सोभित पूरन अंस ससी-स. उ.-२५।
आत्मीयता, अपनत्व, अधिकार, संबंध।
इनके कुल ऐसी चलि आई सदा उजागर बंस। अब इन कृपा करी ब्रज आए जानि आपनो अंस३०४९।
बाम भुजहिं सखा अँस | दीन्हें, दच्छिन कर द्रुम-डरिया-४७०।
अंश रखनेवाला, अंशी, अंशधारी।
अपना, स्वयं का, निजी, अपना ही।
रह्यौ मन सुमिरन को पछितायौ। यह तन राँचि राँचि करि बिरच्यौ, कियौ आपनो भयौ-१-६७।
उग्रसेन की अपदा सुनि सुनि बिलखावै। कंस मारि, राज करै, आपहु सिरनावै--१-४।
अपनी सत्ता, अपना अस्तित्व।
आप सँभारचौ :- होशियार हुआ, सजग हुआ, सँभल गया। उ.- जाइहौ अब कहाँ सिसु पाँव लैही इहाँ छाँड़ि तीजार आपा सँभारयौ-१० उ० ५६।
सुत कुबेर के मत्त गगन भए, बिषै रस नैननि छाए (हो)। मुनि सहाय तैं भए जमल तरु, तिन्ह हित आपु बँधाए (हो)-१-७।
दुखित गयंदहिं जानि कै आपुन उठि धावै-१-४।
[हिं. अपन +पौ या पा (प्रत्य.)]
धन-सुत-दारा काम न आवै, जिनहिं लागि आपुनपौ हारौ---१-८०।
भक्ति अनन्य आपुनी दीजै-३-१३।
आपुनो कल्यान करिलै मानुषी तन पाइ-१-३१५।
एक दूसरे का साथ या संबंध। इसका प्रयोग कभी-कभी विशेशण की तरह भी होता है।
(क) दम्पति होड़ करत आपुस मैं स्याम खिलौना कीन्है री--१०-९८।
(ख) आपुस मैं सब करत कुलाहल, धौरी धूमरि धेनु बुलाए-४४०।
(ग) आपुम मैं सब कहत हँसत, येई अबिनासी---४९२।
(घ) इर्ज बिजै दोऊ आपुस मे निरये बिधना आनि-१५७२।
[हिं. आप + हिं. (प्रत्य.)]
अपने को, अपने को ही, स्वयं को।
सूरदास आपुहिं समुझावै, लोग बुरौ जिनि मानौ--१०६३।
(क) पहिरि सब आभरन, राज्य लागे करन, आनि सब प्रजा दडवत कीन्हौ--४-११।
(ख) मनि आभरन डार-डारन प्रतिं, देखत छबि मनहीं अँटकाए--७८४।
मुख-छबि देखि हो नँदघरनि। सरस निसि को अंसु अगनित इन्दु आभा हरनि-३५१।
भरा हुआ, पूणं है, घिरा है।
कहा कहैं छबि आजु की मुख मंडित खुर धूरि। मावौं पूरन चन्द्रमा, कुहर रह्योै आपूरि-४-३७।
हर्त्ता कर्त्ता आपै सोइ। घट-घट व्यापि रह्यौ है जोइ---७-२।
चमक, तड़क-भड़क, छटा, आभा।
(क) हरि बंसी हरि दासी जहाँ। हरि करुना करि राखहु तहाँ। नित बिहार आभार दै-१८५६ (३०)।
(ख) योग मिटि पति आहुब्योहारु। मधुबन बसि मधुरिपु सुनु मधुकर छाँड़े ब्रज आभार-३३७१।
उलटि अंग आभूषन साजति रही न देह सँभार----२५७२।
क्रुद्ध होना, क्रोध करना।
छोटा आम, अँबिया। जो बहुत खट्टी होती है।
आई प्रीति उघटि कलई सी जैसी खाटी आमी-३०८०।
सूर सहित आमोद चरन-जल लैकरि सीस धरे ९-१७१।
प्रसन्न रहने वाला, हँसमुख।
‘आसना' याँ आहना क्रिया का वर्तमानकालिक रूप। 'आहि शुद्ध रूप है।
आयत दृग अरुन लोल कुण्डल मंडित कपोल अधर दसन दीपति की छबि क्यों हूँ न जात लखी री-२३६२।
शत। संबत आयुः कुल होइ-१२३।
नृप ऐसे आयुर्दा पाई। पृथ्वी हित नित करैं उपाई---१२-३।
किसी कार्य में लगना,। नियुक्ति।
आना' क्रिया के भूतकालिक रूप 'आया का ब्रज भाषा रूप, आया।
तिहिं घर देव-पितर काहे को जा घर कान्हर आयौ-३४६।
बाँधि क्यौं आयौ-किस प्रकार बाँधा गया, बाँधते समय इतनी कठोर कैसे रह सकी।
जसुदा तोहि बाँधि क्यों आयौ। कसक्यो नाहिं नैंकु मन तेरौ, यहै कोखि कौ जायौ----३७४।
किसी काम की प्रथम अवस्था, उत्थान, शुरू।
(क) अँखियाँ करति हैं अति आर। सुँदर स्याम पाहुने के मिस मिलि न जाहु दिन गार----२७६९।
(ख) कबहुँक आर करत माखन की कबहुँक मेघ दिखाइ बिनानी।
इहाँ नाहिंन नन्दकुमार। इहै। जानि अजान मधवा करी गोकुल आर-२०३४।
(क) बिनु देखैं अब स्याम मनोहर, जुग भरि जात घरी। सूरदास सुनि आरज-पथ तेैं, कछु न चाइ सरी------६५ १।
(ख) जब हरि मुरली अवर धरी। गृह ब्यौहार तजे आरज-पथ, चलत न सक करी-६५९।
(ग) आरज पंथ चले कहासरिहै स्यामहि संग फिरौं री---१६७२।
(घ) इतने मान ब्याकुल भइ सजनी आरज पंथहुँ ते बिडरी------२५४४।
( ङ ) आरज पथ छिड़ाय गौपिन अपने स्वारथ भोरी-२८६३।
( क ) हा जदुनाथ, द्वारिका–वासी, जुग-जुग भक्त--आपदा फेरी। बसन-प्रबाह बढ़यौ सुनि सूरज, आरत बचन कहे जब टेरी-१-२५१।
( ख ) नंद पुकारत आरत, ब्याकुल टेरत फिरत कन्हाई –६०४।
(क) मुख-छबि देखि हो नंद घरनि। सरद-निसि कौ अंसु अगनित इंदु आभा हरनि--३५१।
(ख) जागिये गोपाल लाल, प्रगट भई अंसु-माल, मिट्यौ अंधकाल, उठौ जननी-सुखदाई-६१९।
सखा अंसु पर भुज दीन्हें, लीन्हे मुरलि, अधर मधुर, बिस्व भरन--६२४।
इहिं बिधि सोच करत अति ही नृप, जानकि ओर निरखि बिलखात। इतनी सुनत सिमिटि सब आए, प्रेम-सहित धारे अँसुपात ९-३८।
[अंशुमान] अयोध्या के एक राजा जो सूर्यवंशी राजा सगर के पौत्र और असमंजस के पुत्र थे। राजा सगर के अश्वमेध का घोड़ा कपिल मुनि के यहाँ से ये ही लाए थे।
[सं. अश्रु, पा. प्रा. अस्सु, हिं. आँसू]
हृदय ते नहि टरत उनके स्याम नाम सुहेत। अँसुव सलिल प्रवाह डर मनौं अरघ नैनन देत--३४८३।
[सं. अश्रु, पा. प्रा. अस्सु, हिं. आँसू]
(ख) देखि भाई हरि जू की लोट नि। यह छबि निरखि रही नंदरानी, अँसुवा ढरि-ढरि परत करोटनि-१०-१८७।
(ख) चपल दृग, पल भरे अँसुवा, कछुक ढरि-ढरि जात-३६०।
चरन धोइ चरनोदक लीन्हों, तिया कहै। प्रभु अइयै---१-२३९।
[सं. अपुत्र, प्रा. अउत्त]
उपस्थित हुआ, प्रस्तुत हुआ।
जन्म लिया, पैदा हुआ, जन्मा।
हरि कह्यों अब न ब्यापिहैं माया। तब वह गर्भ छाँड़ि जग आया-१-२२६।
आयु गई सिराइ :- आयु का अंत हो गया। उ.- काल अगिनि सबही जग जारत। तुम कैसे कैं जिअन बिचारत ? आयु तुम्हारी गई सिराइ। बन चलि भजौ द्वारिकाराइ--१-२८४।
आयु खुटानी :- आयु कम हो गई।
आयु तुलानी :- उम्र समाप्त हो गई। अन्त काल आ गया। उ.- रे दसकंध, अंधमति तेरी आयु तुलानी आनि-९-७९।
उरग इन्द्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजैं-१-६९
जिहिं मुख कौ समाधि सिव. साधी आराधन ठहराने (हो)। सो मुख चूमति महरि जसोदा, दूध लार लपटाने (हो)-१०-१२८।
संतुष्ट करना, प्रसन्न करना।
जिसकी उपासना हुई हो, पूजित।
सूर भजन महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन आराधे-९-५८।
(क) जती, सती, तापस आराधैँ, चारौं बेद रटै। सूरदास भगवंत-भजन-बिनु करम-फाँस न कटै-१-२६३।
(ख) कहियोै जाई जोग आराधैं अबिगत अथक अमाप--२९७९। ]
कोघाधिक उग्र भावों की चेष्टा।
झूठौ मन, झूठी सब काया, झूठी आरभटी। अरू झूठति के बदन निहारत मारत फिरत लटी---१-९८।
एक गहना जिसमें शीशा जड़ा रहता है और जिसे स्त्रियाँ दाहिने अंगूठे में पहनती हैं।
[सं. अ + राजन्, हिं. अराज]
होइ तिन क्रोध तब साप ताकौं दियौ, मारिकै ताहि जग-दु:ख टारौ। भयौ आराज जब, रिषिन तब मंत्र करि, बेनु की जाँघ को मथन कीन्हौ-४-११।
दुखी व्यक्ति, दीन मनुष्य।
सूर दाम सठ तातैं हरि भजि आरत के दुख-दाइक---१-१९।
[सं. आरात्रिक, हिं. आरती]
( क) राम, लखन अरु भरत सत्रुहन, सोभित चारों भाई। .........। कौसिल्य आदित महतारी, अरति करहिं बनाइ--९-२९।
(ख) अति सुख कौसिल्या उठि धाई। उदित बदन मन मुदित सदन तेैं, आरति साजि सुमित्रा ल्याई---९. १६९।
साँझ हि तेैं अति हीं बिरू झानौं, चंदहिं देखि करी अति आरति-१०-२००।
नंद घरनि ब्रजनारि बिचारति ब्रजहि बसत सब जनम सिरानौ, ऐसी करी न आरति----५२९।
दुखी पर दया करनेवाला व्यक्ति।
सब-हित-कारन देव अभय पद, नाम प्रताप बढायौ। आरतिवंत सुनत गज कुंदन फंदन काटि छुड़ायौ-१-१८८
वह पात्र जिसमें कपूर आदि रखकर आरती की जाती है।
हरि जु की आरती बनी। अति बिचित्र रचना रचि राखी परति न गिरा गनी---२-२८।
(क) लै चरनोदक निज ब्रत साध्यौ। ऐसी बिधि हरि कौं आराध्यौ ९.५
(ख)ब्रह्मबान कानि करी, बल, करि नहिँ बाँध्यौ। कैसेँ परताप घठै, रघुपति आराध्यौ-९-९७।
( क ) आरि करत कर चपल चलावत, नंद-नारि-आनन छुवै मदहिं। मनौ भुजंग अमीरस-लालच, फिरि-फिरि चाहत सुभग सुचंदहिँ-१०-१०७।
(ख) कलबल कै हरि-आरि परे। नव रँग बिमल नवीन जलधि पर, मानहु द्वै ससि-आनि अरे-१०-१४१।
(ग) जब दधि-मथनी टेकि अरै। आरि करत मटुकी गहि मोहन, बासुकि संभु डरै-१०-१४२।
(क) आजु अति कोपे हैं रन राम। ब्रह्मादिक आरूढ़ बिमाननि. देखत हैँ संग्राम--९-१५८।
(ख) रथ आरूढ़ होत बलि गई होइ आयौ परभात--२५३१।
दै मैया भौँरा चक डोरी। जाइ लेहु आरे पर राख्यो, काल्हि मोल लेै राख्यौ कोरी--६६९।
[सं. आ + रोगना == हिं. आरोगना]
(क) उज्ज्वल पान, कपूर, कस्तुरी, आरोगत मुख की छबि रूरी-३९६।
(ख) आरोगत हैँ श्रीगोपाल। षटरस सौंज बनाइ। जसोदा, रचिकै कंचन-थाल–३९७।
[सं. आ + रोगना (रूज् = हिं.सा)]
सबरी परम भक्त रघुबर की बहुत दिनन की दासी। ताके फल आरोगे रघुपति पूरन भक्ति प्रकासी।
रोकने या छेंकने की क्रिया।
मौनाऽपवाद पवन आरो धन हित काम निकंदन---३०१४।
अति आतुर आरोधि अधिक दुख तेहि कह डरति न यम औ कालहिं।
एक वस्तु के गुण को दूसरी में मानना
संगौस के स्वरों का चढ़ाव।
आसन बैसन ध्यान धारण मन अरोहण कीजै---३२६१।
संगीत में वह स्वर जो उत्तरोत्तर चढ़ता जाम।
[सं. आत्तं= दुखी + नाद = शब्द]
आर्द्रा नक्षत्र के उदय का समय।
श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न पुरुष।
एक प्राचीन सभ्य जाति। ये कैस्पियन सागर से गंगा-यमुना तक बसे थे। वर्तमान हिंन्दू जाति अपने को इन्हीं का वंशज मानती है।
उत्तरीय भारत जहाँ आर्य | बसे थे।
बृषभानु की घरनि जसोमति पुकारयौ। पठै सुत-काज कोँ कहति हौँ लाज तजि, पाइ परिकै महरि करति आरयौ-७५१।
[सं. = अच्छी तरह + शुलन प्रा. सूलन, हिं. हूलना]
[सं. अंगीकरण, प्रा. अंगिअरण, हिं. अंगरना]
निर्विघ्न, बाधारहित, बिना खटके का।
जो कहा न जा सके, वर्णन के बाहर, अकथनीय, अवर्णनीय,।
(क) अकथ कथा याकी कछू, कहत नहीं कहि आई (हो)१-४४।
(ख) य अब कहति देखावहु हरि कौ देख हु री यह अकथ कहानी-१-१२७६।
(ग) सिंह रहै जंबुक सरनागत, देखी-सुनी न अकथ कहानी-.-पृ० ३४३।
(घ) कमल जैन जगजीवन के सखी गवत अकथ कहानी-२७९६। किनहूँ के सँग धेनु चरावत हरि की अकथ कहानी-३४११।
जो वर्णन न किया जा सके, अवर्णनीय, अकथनीय।
मन, बच करि कर्म रहित बेदहु की बानी। कहये जो नि बहिबे अकथन कहुँ सोही। सूरस्याम मुख सुचंद्र लीनि जुवति मोही-३२८९।
[सं. धू = धड़कना, काँपना]
[सं. आकर्णन = सुनना, हिं. अकनना]
ध्यान से, कान लगाकर, आहट लेकर।
नगर सोर अकनत सुनत अति रुचि उपजावत---२५६१।
कान लगाकर सुनना, आहट लेना।
अलंकार-संबंधी। अलंकार-युक्त।
वह अवलंब जिससे रस की उत्पत्ति होती है।
[सं• आर्द्र] गीलापन, तरी।
एक पौधा जिसका उपयोग रंग बनाने के लिए होता है।
आल मजीठ ल.ख सैदुर कहुँ ऐसेहि बुधि अबरेखत---११०८।
जानोँ हौँ बल तेरौ रावन। पठवोँ कुटुँब सहित जम-आलय, नैँकु देहि धौँ मोकाँ आबन-९-१३१।
मनिमय भूमि नंद कैं आलय, बलि बलि जाउँ तोतरे बोलनि--१०-१२१।
रजत, रूचिर कपोल महावर रद मुद्रावलि नाइ दई री मनहुँ पीक दल सींचि स्वेद जल आलबल रीति बेलि बई री--२११५।
(क) सुनि सतसंग होत िअय आलस-बिष यिनि सँग विसरानी-१.१४८।
( ख ) उनके अछत अपने आलस काहे कंत रहन कृसगात----१० उ-५९।
आलली , सुस्त, जो शीघ्रता से काम न करे।
आलस्ययुक्त। डगमगात डग धरत परत पग आलसवंत जम्हात। मानहु मदन दंत दै छाँड़े चुटकी द्वै द्वै गात-२१६५।
कामी, बिबस कामिनी कैँ रस, लोभ-लालसा थापी। मन-क्रम-बचन दुसह सबहिन सौ, कटुक बचन आलापी-१-१४०।
गले से या छाती से लगाने की क्रिया, परिरंभण।
हृदय से लगाना, गले लगाना।
हृदय से लगाया हुआ, परिरंभित।
स्याम सुभग कैं ऊपर वारौं, आली कोटि अनंग-६४०।
जो पै प्रभु करुना के आलै। तौ कत कठिन कठोर होत मन मोहिं बहुत दुख सालै--३४९१।
आलोचना करने यो जाँचने वाला।
सोचना-विचारना, ऊहापोह करना।
मन प्रतीति नहिं आवई, उड़िबौ ही जाने-९-४२।
(मथनि नहिं) आवई :- मथने का ज्ञान या जानकारी नहीं है। उ.- मथन नहिं मोहिं आवई तुम सौंह दिवायो-७१६।
[हिं. आवन = आना +हार(प्रत्य.) = वाला]
माधव जी आवनहार भए। अंचल उड़त मन होत गहगहो फरकत नैन खए-१० उ.-१०७।
सुनि स्यामा नवसत सँग सखी लै बरसाने तेहि आवनो--२२८०।
वह बादल जिससे पानी न बरसे।
एक बाजा जो ताशे के ढंग का होता है और जिसे चमार बजाते हैं।
एक पटह एक गोमुख एक आवझ एक झालरी एक अमृतकुण्डली एक डफ एक कर धारे--२४२५।
(क) सूर स्याम् बिनु अंतकाल मैं कोउ न आवत नेरे---१-८५।
(ख) देखे स्याम राम दोउ आवत गर्व सहित तिन जोवत-२५७४।
कह्यौ, सुतनि-सुधि आवति व बहीं-१-२८४।
[पु. हिं. आवना, हिं. आना]
इहिं बिरिया बन ते ब्रज आवत-२७३५।
[सं. आगमन, पु. हिं. आगवन]
आगमन, आनाँ, आने की क्रिया।
(क) अपने आवन को कहौ कारन-४-३।
(ख) बाणी सुनि बलि पूजन लागे, इहाँ बिप्र करो आवन-८.१३।
(ग) मृदु मुसुकानि आनि राखो पिय चलत कह्यौ है आवन-२७५२।
(घ) धनि हरि लियो अवतार, सु धनि दिन आवन रे--१०अ.२८।
(ङ) सुन्दर पथ सुन्दर गति-आवन, सुन्दर मुरली सब्द रसाल-४७४।
किसी भाव का उत्पन्न होना।
संतोषादि न आवन पावैं। बिषय भोग हिरदै हरषावै–४.१२।
काल्हि कमल नहिं आवहीं, तोै तुमको नहिं चैन-५८९।
[हिं. आवा = आना +सं. गमन]
( १ ) कहौ कपि जनक-सुताकुसलात। आवागमन सुनावहु अपनो, देहु हमेैं सुख गात---९-१०४।
(२) जन्म और मरण।
[सं. अ कर्णन = सुनना, हिं. अकनना]
अकनि रहत-कान लगा कर या चुपचाप सुनते रहते (हैं) ध्यान में मग्न।
आलस गात जात मनमोहन, सोच करत, तनु नाहिंन चंनु। अकनि रहत कहुं , सुनत नहीं कछु, नहिँ गो-रंभन बालक-बैनु-५०१।
[सं. अकर्णन = सुनना, हिं. अकनन]
क ह्यो तुम्हारो सबै कही मैं और कछु अपनी। स्रवनन बचन सुनत हूं उनके जो घट मॅह अकनी-३४६५।
[सं. अवाक्, हिं. अकब का ना]
चकित होते हैं, भौचक्के रह जाते हैं, घबड़ाते हैं।
सकसकात तन, धकधकात उर अकब कात सब ठाढ़। सूर उपंगमुत बोलत नाहीं अति हिरदै ह्वै गाढ़े---२९६९।
चकित होना; भौचक्का रह जाना।
दशरथ नृपति अयोध्या-राव। नाकैं गृह कियौ आविर्भाव---९-१५।
नयी वस्तु का आविष्कार करने वाला।
सर्वथा नयी वस्तु प्रस्तुत करना।
मंत्र द्वारा किसी देवता को बुलाना।
चित्त की प्रबल वृत्ति, जोश।
चित्त की प्रेरणा, आतुरता।
आते हैं। यौ-कहत न आवै---वणंन नही किये जा सकते।
सूर विचित्र चरित स्याम के रसना कहत न आवै--१०-९७।
[सं. आगमन, पुं. हिं. आवना, हिं. आना)
जहाँ तहाँ तै तब आवैगे, सुनि-सुनि सस्तो नाम-१-१९१।
आवै-जावै :- आना-जाना, आवागमन।
जबै आवौं साधु संगीत, कछक मन ठहराइ-१ ४५।
किसी इच्छित बस्तु के पाने का थोड़ा-बहुत निश्चय।
एक अलंकार जिसमें ऐसी वस्तु के लिए प्रार्थना होती है जो अप्राप्त हो।
सूर प्रभु चरित पुर नारि देखत खरी महल पर आशिषा देत लोभा---२५९१।
शीघ्र सन्तुष्ट या प्रसन्न होने वाला।
हिंदुओं के जीवन की चार अवस्थाएँ-ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास।
देवताओं पर चढ़ाने का बिना टूटा चावल, अक्षत।
सूर समूह पय धार परम हित आषत अमल चढ़ावो-सा ० ९।
आषाढ़ का महीना जो जेष्ठ के बाद आता है।
तो हम को होती कत यह गति निसि दिन बरषत आषी--२-७३९।
इतनेहि धीरज दियो सबन को अवसि गए दै आस--२५३४।
आस लगाये :- भरोसे पर रहना, सहारे पर रहना। उ.- पद-नौका की आस लगाये बूड़त हौं बिनु छाँह-१-१७५।
आस पुजविहु :- इच्छा या आशा पूरी करो। उ.- तुम का हूँ धन दैलै, आवहु, मेरे मन की आस पुजाबहु---५-३।
सूर तुरत तुम जाय कहौ यह ब्रह्म बिना नहिं आसति----२९१९।
एक ऋषि जो जरत्कारु ऋषि और वासुकि नाग की कन्या के पुत्र थे। इन्होंने जनमेजय के सर्पसत्र में तक्षक का प्राण बचाया था।
बैठने के लिए मूँज, कुश आदि को चौखूँटो बिछावन।
कुस-आसन दै तिन्हहिं बिठायौ---१-३४१।
समीप आया या पहुँचा हुआ, प्राप्त।
[अनु. आरा + सां. पाश्र्व]
चारों ओर, निकट, इर्द-गिदे, अगल-बगल।
कटि ठट पीत, मेखला मुखरित, पाइनि नूपुर सोहै। आसपास बर ग्वाल-मंडली, देखत त्रिभुबन मोहै---४५१।
आसा लागी :-( काम पूरा होने या कुछ प्राप्त होने की) आशा बँधी है। उ.- बहुत दिननि की आसा लागी, झगरिनि झगरौ कीनौ १०-१५।
लागि आसा रही :- प्राप्ति होने या काम पूरा होने की सम्भावना थी। उ.- जन्म तेैं एक टक लागि आसा रही, बिषय-बिष खात नहिं तृप्ति मानी----१-११०।
(दूसरे का ) मुँह जोहने वाला, (किसी की) सहायता चाहनेवाला।
[सं. आशावरी अथवा अशावरी, हिं. असावरी]
एक प्रधान रागिनी जो भैरव राग की स्त्री मानी गयी है। इसके गाने का समय प्रातःकाल सात से नौ बजे तक है।
माल्वाई राग गौरी अरु आसाबरी राग। कन्हरो हिंडोल कौतुक तान बहु बिधि लाग---२२७९।
मथि मथि सिंधु-सुधा सुर पोषे संभु भए बिष आसी-३३०६।
पुनि कह्यौ, देहु आसीस मम प्रजा कौं, सबैं हरिभक्ति निज चित्त धारैं---४.११।
[हिं. आ = अच्छी तरह + कड्ड = कड़ा पन, हिं. अकड़ना]
अभिमान दिखाता, घमंड करता, अकड़ जाता।
कबहुंक राम-मान मद पूरन, कालहु तैं नहिं डरतौ। मिथ्या बाद आप-जस
सुनि-सुनि, मूछहिं पकरि अकरतौ –१-२०३।
[सं. अ = नहीं + करण, अकरणीय]
दयानिधि तेरी गति लखि न परै। धर्म अधर्म, अधर्म धर्म करि, अकरन करन करै १-१०४।
[सं. अ = नहीं + करण, अकरणीय]
न करने योग्य कार्य, बुरा काम, दुष्कर्म।
अकरम, अबिधि, अज्ञान, अवज्ञा, अनमारग, अनरीति। जाकौ नाम लेत अध उपजै, सोइ करत अनीति-१-१२९।
[सं. अकायर्थ, प्रा. अकारियल्थ]
[सं. अक्रय्य, हिं. अकरा (पुं.)]
ऊधौ तुम बज मैं पैठ करी। लै आए हो नफा जानि कै सबै बस्तु अकरी--३१०४।
[सं. अक्रय्य, हिं. अकरा (पुं.)]
खरी, श्रेष्ठ, उत्तम, अमूल्य।
जब उनको आसरो कियो जिय तबही छोड़ि गए-पृ० ३२०।
फलों के खमीर से तैयार किया हुआ मद्य।
आशा, अप्राप्त के पाने की इच्छा।
हिंसा-मद-ममता-रस भूल्यौ, आसाहीं लपटानौ-१-४७।
इच्छित वस्तु के पाने के कुछ निश्चय का सन्तोष।
असुर सम्बन्धी, असुरों का।
[सं. अस्मिन, प्रा. अस्सि = इस + सं. साल = वर्ष]
कहाँ धनुष कहाँ हम बालक कहि आस्चर्य सुनाए--२५८६।
वेद, ईश्वर आदि पर जिसका विश्वास हो।
ईश्वर के अस्तित्व परजिसे विश्वास हो।
कराहना, उसाँस, ठंडी साँस।
मारै मार करत भट दादुर पहिरे बहु बरन सनाह। अरै कवच उघरे देखियत मनो बिरहिनि घाली आह-२८२६।
[हिं. आ= आना + हट (प्रत्य.)]
चलने का शब्द, पाँव को चाप, खड़का।
[हिं. आ= आना + हट (प्रत्य.)]
आवाज जिससे किसी स्थान पर किसी के रहने का अनुमान हो।
आहट सुनि जुवती घर आई देख्यौ नन्द कुमार। सूर स्याम मन्दिर अँधियारैं, निरखति बारंबार-१०-२७७।
रिषि समीक केैं आस्रम आयौ। रिषि हरि-पद सौ ध्यान लगायौ---१-२९०।
सहारे पर टिका याठ्हरा हुआ।
भरोसे पर रहने वाला, अधीन।
(क) तिन कह्यौ--मेरो पति सिव आह-४-७।
(ख) नृपति कह्यौ, मारग सम आह---५-४।
ताके देखन की मोहिं चाह। कह्यौ, पुरुष वह ठाढ़ौ आह-९-२
पीड़ा, शोक, खेद सूचक अव्यय।
आश्चर्य और हर्षसूचक अव्यय।
जेतक सस्त्र स्रो किए प्रहार सो करि लिए असुर आहार-६-५।
रहन-सहन, शारीरिक व्यवहार।
[‘आसना' का वर्तमानकालिक रूप]
गीध ब्याध, गनिकाऽरुअजामिल, ये को आहिं बिचारे। ये सब पतित न पूजत मो सम जिते पतित तुम तारे-१-१७९।
एक [’आसना' का वर्तमानकालिक रूप] है।
(क) उमा आहि यह सो मुँडमाल। जब जब जनम तुम्हा्रौ भयौ तब तब मुण्डमाल मैं लयौ-१-२२६।
(ख) तृनावर्त प्रभु आहि हमारो इनहीं मारचौ ताहि-२५७४।
मंत्र पढ़कर देवता के लिए द्रव्य अग्नि में डालना, होम, हवन।
सिव आहुति-बेरा जब आई। बिप्रनि दच्छहिं पूछयौ जाई---४.५।
होम-द्रव्य की वह मात्रा जो एक बार कुंड में डाली जाय।
आहुति जज्ञ कुण्ड मैं डारी। चह्यौ, पुरुष उपजै बल भारी-४-५।
हवन में डालने की सामग्री।
[सं. इष्ट + हर (प्रत्य.)]
उर्द और चने की दाल को पीठी का बना हुअ सालन।
अमृत इँडहर है रससागर। बेसर सालन अधिकी नागर।
[सं. इन्द्रा अयवा इंदिरा]
इंद्रा बिदा राधिका स्यामी कामा नारि---पृ० २५२ (२)।
[सं. इन्दीवर = कमल + सुत पुत्र]
ईंदीवर-सुत कर कपोल में है सिंगार रस राधे-सा० ६।
बाई ओर की एक नाड़ी जो बाएँ नथने से श्वास निकालती है।
इंगला (इड़ा) पिंगला सुखमना नारी। सून्य सहज में बसहिं मुरारी-३४४२ (८)।
[सं. हिं.गूल, प्रा. इंगुल, हिं. ईगुर]
[हिं. ईगुर + औटा प्रत्य. )]
[आसना' का वर्त. बहु. रूप]
महरि स्याम कौं बरजति काहैं न। जैमे हाल किए हरि हमकौं, भए कहूँ जग आहैं न-७७२।
['आसना' का वर्तमान कालिक रूप]
प्रबल सत्रु आहैं यह मार यातैं संतौ, चलौं सँभार-१-२२९।
देवनागरी वर्णमाला का तीसरा स्वर। तालु इसका स्थान है।
एक वैदिक देवता जो पानी बरसाता है। यह देवराज कहाँ गया है। ऐरावत इसका वाहन; वज्र, अस्त्र; शची, स्त्री जयंत पुत्र ; अमरावती नगरी; नन्द, वन; उच्चैश्रवा, घोड़ा; और मातलि , सारथी है। इसकी सुधर्मा नामक सभा में देव, गंधर्व और अप्सरायों रहती हैं। वृत्र, वलि और विरोचन इसके प्रधान शत्रु हैं। यह ज्येष्ठ नक्षत्र और पूवं दिशा का स्वामी है।
इन्द्रियों को जीतने वाला।
देखिकै उमा कौं रुद्र लज्जित भए कह्यौ मैं कौन यह काम कीनौ। इन्द्रजित हाैं कहावत हुतौ, आपु. कौं समुझि मन माँहिं ह्वै रह्यौ खीनौ-८-१०।
रावण का पुत्र मेघनाद जिसने देवराज को जीता था।
लंकापति इन्द्रजित कौं बुलायौ-९-१३५।
रावण का पुत्र मेघनाद जिसने इन्द्र को जीता था।
एक राजा जो अगस्त्य ऋषि के शाप से गज हो गया था और ग्रह से युद्ध होने पर जिसका उद्धार नारायण ने किया।
वर्षाकाल में आकाश में दिखायी देने वाला सतरंगी अर्द्ध वृत्त। यह सूर्य की विपरीत दिशा में जल से पार उसकी किरणों की प्रतिच्छया से बनता।
इन्द्रनील-मनि तैं तन सुन्दर, कहा कहै बल चेरौ--१०-२१६।
नृप कह्यौ, इंन्द्र पुर की न इच्छा हमैं---४-११।
कर्म न करने वाला, कर्म से निलिप्त।
न करने योग्य कार्य, बुरा काम।
काम न करने वाला, काम के लिए अनुपयुक्त।
[सं. आकर्षण, हिं. आकर्षना]
जेहि माया बिरंचि सिव मोहे, वहै बानि करि चीन्हौ। देवकि गर्भ अकर्षि रोहिनी, आप बास करि लीन्हौ-१०-४।
निष्कलंक, निर्दोष, शुद्ध, निर्मल।
अलक तिलक राजत अकलंकित मृगमद अंग बनी----पृ. ३१६।
[प्रेम पिये बर बारुनी बलकल बल न सँभार। पग डगड जिउ तित धरति मुकुलित अकल लिलार-११८२।
(क) पहिले हौं ही हो तब एक। अमल, अकल, अज, भेदबिवर्जित , सुनि बिधि विमल बिबेक-२-३८।
(ख) फिरत बन बन बिकल सहस सोरह सकल ब्रह्मपुरन अकल नहीं पावै-। १८०६।
इंद्र ढोठ बलि खाइ हमारी देखौ अकल गमाई-९८५।
एक प्राचीन नगर जो आधुनिक दिल्ली के निकट था और जिसे पांडवों ने खांडव बन जलाकर बसाया था।
[इन्द्र + वाहन = सवारी (इन्द्र की सवारी = ऐरावत]
चाहत गंध बैरी बीर। आपनो हित चहत अनहित होत छोड़त तीर। नृत भेद बिचार वा बिनु इन्द्रबाहन पास--सा. २८।
एक फल जो देखने में बड़ा सुन्दर पर स्वाद में कडुवा होता है।
वह शक्ति जिससे वाह्य वस्तुओं के गुणों और रूपों का ज्ञान प्राप्त होता है।
शरीर के अवयव जिनके द्वारा वाह्य वस्तुओं के रूप-गुण का अनुभव होता है। इनके दो वर्ग हैं- ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय। ज्ञानेंद्रियाँ पाँच हैं जो केवल गुणों को अनुभव कराती है---चक्षु (रूप-ज्ञान) श्रोत्र (शब्द-ज्ञान), नासिका (गंध ज्ञान), रसना (स्वादज्ञांन) और त्वचा (स्पर्श द्वार ज्ञान) कर्मेंद्रियाँ भी पाँच हैं जिनके द्वारा विविध कर्म किये जाते हैं- वाणी हाथ, पैर गुदा और उपस्थ। इन दसों इन्द्रियों के अतिरिक्त एक उभयात्मक अंतरंद्रिय है ‘मन' जिसके चार विभाग हैं--मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त।
अपनी रुचि जित ही जित एचति इंद्रिय कर्मगटी। हौं तितहीं उठि चलत कपट लगि, बाँधे नैनपटी-१९८।
जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया हो, जो विषय में लीन न हो।
रावण का पुत्र मेघनाद जिसने इंद्र को पराजित किया था।
रूप, रस, गंध,शब्द आदि विषय जिनका अनुभव या ज्ञान इन्द्रियों द्वारा होता है।
पाँच ज्ञानेंद्रिय और पाँच कर्मेंद्रिय जिनसे क्रमशः विषय-ज्ञान और कर्म होते हैं।
(क) मीन इंद्री तनहिं काटत मोट अघ सिर भार।
(ख) त्रिगुन प्रकृति तेैं महत्तत्व, महत्तत्व तैं अहँकार मन-इन्द्री-सब्दादि पँच, तातैं कियौ बिस्तार-२०३५।
स्त्री-पुरुष सूचक अवयव लिंग।
पंचम मास हाड़ बल पावै। छठैं मास इन्द्री प्रगटावै--३:१३।
(क) (कुंति) धरति न इक छिन धीर-१-२९।
(ख) सखी री स्याम सबै इक सार-२६८७।
[सं. इक == एक + अंक = निश्वय]
[सं. एकविंशत्, प्रा. एक्कबीस, हिं. इक्कीस]
[सं. एक + हिं. जोर = जोड़ना]
देखि सखि चारि चन्द्र इकजोर। निरखति बैठि नितंबिनि पिय सँग सारसुता की ओर।
टकटकी लगाकर देखने की क्रिया, स्तब्ध, दृष्टि।
(क) बलिहारी छबि पर भई, इकटक चख लावै। फरकत बदन उठाइ कै, मनहीं मन भावै-१०-७२।
(ख) इकटक रूप निहारि, रहीं मेटति चित-आरति---४३७।
[सं. एक + स्थ = एकस्थ, प्रा. इकट्ठो]
[सं. एक + हिं. ठाई = स्थान]
एक स्थान पर इकट्ठा, एकत्र।
[सं. एक + हिं. ठाँव = स्थान]
[सं. एक + हिं. ठाँव = स्थान]
एक स्थान पर, एक ठौर, इकट्ठा।
सुनति हीं सब हाँकि ल्याए, गाइ करि इकठैन--४२७।
एक ठौर या एक स्थान पर, इकटठा।
अपनी अपनी गाइ ग्वाल सब, आनि करौ इकठौरी-४४५।
एक स्थान पर एकत्र, एक साथ, एक पास है।
(क) जब पाँड़े इत-उत कहुँ गए। बालक सब इकठौरे भए... ७.२।
(ख) जेवत कान्हु नंद इकठौरे----१०-२२४।
इकतन ग्वाल एकतन नारी। खेल मच्यौ ब्रज के बिच भारी--२४०८।
अकेले रहने की चाहया प्रकृति।
[सं.एक+हिं. तानना =खिंचाय]
एक प्रकार का तानपूरा या तँबूरा।
[सं. एकत्रिंशत्, पा. इकतीस]
[सं. एक + हिं. लाई या लोई = पर्व]
एक पाट की महीन सारी या चादर।
[सं. एक + हिं. लाई या लोई = पर्व]
[सं. एक + हिं. सार (प्रत्य.)]
[सं. एक + हिं. सार = समान]
नीच-ऊँच हरि कैं इकसार--७-८।
अति निसंक, निरलज्ज अभागिन, घर घर फिरत न हारी। मैँ तो बृद्ध भयौं वह तरूनौ, सदौ बयस इकसारी। याकैँ बस मेँ बहु दुख पायौ, सोभा सबै बिगारी--१-१७३
[सं. एक + हिं. हाई (प्रत्य.)]
[सं. एक + हिं. हाई (प्रत्य.)]
[सं. एकविंशत्, प्रा. इक्कबीस, हिं. इक्कीस]
वह योद्धा जो लड़ाई में अकेला लड़े।
सूर्यवंश का एक प्रतापी राजा जो वैवस्वत मनु का पुत्र कहा गया हैं। राम इसी के वंशज थे।
सूर्यवंश को एक प्रधान शासक जो वैवस्वत मनु का पुत्र माना गया है।
दस सुत मनु के उपजे और भयो इच्छवाकु सबनि सिरमौर-९-२।
कामना, लालसा, अभिलाषा, मनोरथ, चाह, आकांक्षा।
[हिं. ऐंठ + लाना = इठलाना]
कहाँ मेरे कुँवर पाँच ही बरष के, रोइ अजहूँ सुरवै पान माँगैँ। तू कहाँ ढीठ, जोबन-प्रमत्तं सदरी, फिरति इठलाति गोपाल आगैँ-१०.३०७।
गर्व या ठसक दिखाना, इतराना।
दूसरे को छकाने के लिए जानकर अनजान बनना।
इठल ने को क्रिया या भाव, ठसक, ऐंठ।
[सं. इष्ट. पा. इट्ट + आई (प्रत्य.)]
[सं. इष्ट. पा. इट्ट + आई (प्रत्य.)]
एक प्रधान नाड़ी जो पीठ की रीढ से बाएँ नथने तक है। चन्द्रमा इसका प्रधान देवता माना गया है।
इड़ा पिंगला सुषमन नारी। सहज सुता में बस मुरारी ३४४२ (८)।
इत की भई न उतकी सजनी भ्रमत भ्रमत मैं भई अनाथ पृ. ३२९।
इत उत :- इधर उधर। उ.- (क) पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह-सिवार-१-९९। (ख) जब साँड़े इतउत कहुँ गए। बालक सब इकठौरे भष---७-१।
इतना छोटी-सा, बिलकुल जरा सा, नाममात्र का।
(क) कबहिं करन गयौ माखन चोरी। जानेै कहा कटाच्छ तिहारेै, कमलनैन मेरौ इतनक सौ री-१०--३०५।
(ख) (कान्ह कौं) ग्वालिनि दोष लगावति चोर। इतनक दधि माखन कैं कारन कबहिं गयौ तेरी ओर-१०३१०।
(ग) देखौ माई कान्ह हिलकियानि रोवेै। इतनक मुख माखन लपटायो, डरनि आँसुवनि धोवै--१०-३०७।
इतनी, इस मात्रा की, इतनी जरा सी, थोड़ी।
इतनिक दुरि | जाहु चलि कासी जहाँ बिकत है प्यारी-३३१६।
इस मात्रा की, इस कदर, यह, ऐसी।
इतनी सुनत कुंति उठि धाई बरषत लोचन-नीर-१-२९।
बौरे मन समुझि-समुझि कछु चेत इतनौ जन्म अकारथ खोयौ, स्याम चिकुर भए सेत १-३२२।
ऐंठ जाना, घमंड या ठसक दिखाकर।
दिन दिन इनकी करौं बड़ाई अहिर गए इतराइ–२५७८।
इतराते हो, घमंड करते हो, फूले नहीं समाते हो,
(क) जम कै फंद परयो नहिं जब लगि, चरननि किन लपटात। कहत सूर बिरथा यह देही, एतौ कत इतरात-१-३१३।
(ख) तातै कहत सँभारहि रे नर, काहैं को इतरात-२-२२।
रूप-यौवन का घमंड़ दिखाते हो, ऐंठते हो, ठसक दिखाते हो, इठलाते हो।
तुम कत गाय चरावन जात ? अब काहू के जाउ कहीं जनि, आवति हैं युवती इतरात। सूर स्याम मेरे नैनन आगे रहो काहे कहूँ। जात हो तात-५०९।
रूप-यौवन का गर्व या ठसक दिखाती है, इठलाती या ऐंठती है।
(क) देहीं लाइ तिलक के सरि कौं, जोबन मद इतराति। सुरज दोष देति गोबिंद को, गुरू लोगनि म लजाति--१०-२९४।
(ख) देखि हरि मथति ग्वालि दधि ठाढ़ी। जोबन मदमाती इतराती, बेनि ढ़ुरति कटिलोैं, छबि बाढ़ी--१०-३००
(ग) धन माती इतराती डोलेै, सकुच नहीं करै सोर-१०-३२०।
(घ) जननि बुलाइ बहिँ गहि लीन्हो, देख हु री मदमाती। इनकी कौं अपराध लगावति, कहा फिरति मदमाती--७७५।
[सं. उत्तरण, हिं. उतारना]
सफलता पर गर्व या ठसक दिखाना मदांध होना।
[सं. उत्तरण, हिं. उतारना]
रूप, गुण, यौवन आदि पर घमंड़ करना, इठलाना।
घमंड करने लगी, मदांध हो गयी।
सुर इतर ऊसर के बरसे थोरेहि जल इतरानी--२०२४।
[हिं. हतराना + औहाँ ( प्रत्य.]
जिससे ठसक या इतराना प्रकट हो।
समप्ति या अंत सूचक अव्यय।
[सं. अ = नहीं + हि कल = चैन]
बिना कला या चतुराई का, निर्गुणी।
[सं.अ = नहीं + हिं.कल = चैन]
[सं.अ = नहीं + हिं.कल = चैन]
लंगर, ढीठ, गुमानी, टूँडक, महा मसखरा, रूखा। मचला, अकले-मूल, पातर, खाऊ खाऊँ करि भूखा--१-१८६।
बैर, द्वेष, डाह, ईर्ष्या, विरोध, होड़।
बैर या शत्रुता करना, रार ठानना।
अकेले, बिना किसी को साथ लिए।
जो कही न जा सके, अकथनीय, अवर्णनीय।
गत प्रसिद्ध घटनाओं और तत्संबंधी व्यक्तियों का काल-क्रमानुसार वर्णन।
सर्व सास्त्र को सार इतिहास सर्व जो। सर्व पुरान को सार युत सुतनि को-१८६१।
पुस्तक जिसमें प्रसिद्ध घटना और पुरुषों का वर्णन हो।
(क) आजु जौ हरिहिं म सस्त्र गहाऊँ। …..। स्यंदन खंडि, महारथि खंडौं, कपिध्वज सहित गिराऊँ। पांव-दल सन्मुख ह्वै धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ। इती न करौं, सपथ तो हरिकी, छत्रिय-गतिहिं न पाऊँ-१-२७०।
(ख) कैसे करि आवत स्याम इती। मन क्रम बघन और नहिं मेरे पदरज त्यागि हिती-११-३।
(ग) इती दूर सम कियो राज द्विज भये दुखारे-१० उ०--८।
इतने, यहाँ, इन या इतने स्थानों में।
(क) (गाइ) ब्योम, धर, नद, सैल, कानन इते चरि न अघाइ-१-५६।
(ख) इते मान इहि जोग सँ देस नि सुनि अकुलानी दुखी----३०३९।
(क) हौं बलहारी नद नदन की नैंकु इतै हँसि हेरौ-१०-२१६।
(ख) आवहू आवहु इतै, कान्ह जू पाई हैं सब धेनु-५०२।
[सं. इयत = इतना, हिं. इतो + ई (प्रत्य.)]
है हरि नाम को आधर। और इहिं कलिकाल नाहीं, रह्यौ विधि-ध्यौहार।…...। सकल स्रुति-दधि मथत पायौ, इसोई घृत सार----२-४।
(क) सूर एक पल गहरु न कीन्हयौ, किहिं जुग इतौ सहयौ--१-४९।
(ख) तब अंगद यह बचन कह्योै। को तरि सिंधु सिया-सुधि ल्यावै, किहिं बल इतोै लह्योै ….९-७४।
(ग) रंक रावन, कहा इतकतेरी इतौ, दोउ कर जोरि बिनती उचारौं-९-१२९
(घ) तनक दधि कारन जसोदा इतौ कहा रिसाई--३५०।
इसी प्रकार के अन्य या और।
अवधि गनत इकटक मग जोबत तब ए इत्यों नहिं झूखी-३०२९।
जलाने की लकड़ी यो कंडा, जलाशन।
घरवर मूढ़ा उठि खेलत बालक सुठि आनित इधन दौरि दौरि संचारयौ। ऐसे इहू नृप नर सकल सकेलि घर के साककरत हृद रस बकुल जारचौ–१० उ०-५२।
इन पतितनि कौं देखि-देखि कै पाछैं सोच न कीन्हौ--१.१७५।
भीषम, द्रोन, करन, सब निरखत, इनतैं कछु न सरी-१-२५४।
अर्जुव भीम महाबल जोधा, इनहूँ मौन धरी १-२५४।
इति तव राज बहुत दुख पाए। इनकैं गृह रहि तुम , सुख मानत। अति निलज्ज, कछु लाज न आनत--१--२८४।
बड़ो गिरिरज गोबर्धन इनै रहौ तुम माने---९३३।
राथे तेरे रूप की अधि. न काइ………। इभ तुटत अरु अरुन पंक भए बिधिना आन बनाई---२२२४।
[अम्ल + हिं. ई (प्रत्य.)]
एक बड़ा पेड़ जिसमें लंबी खट्टे गूदेदार फलियाँ लगती हैं।
(क) ज्यौं जल मसक जीव-घट-अंतर, मम माया इमि जानि-३८१।
(ख) सूर भजन-महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन अराधे-१०-५८।
इंद्र देखि इरषा मन लायौ। करकेै क्रोध न जल बरसायौ---५-२।
प्रबल इच्छा, कामना, वासना।
वैवस्वत मनु की कन्या जो बुध को ब्याही थी और जिससे पुरुरवा उत्पन्न हुआ था।
[सं. एला + ची (फा. + प्रत्य. 'च') + सं. पाक]
एक प्रकार की मिठाई जो इलाइची के दानों को चीनी में पागकर बनायी जाती है।
जंबू द्वीप के एक खंड का नाम।
प्रबल इच्छा, कामना, वासना।
वह देवता जिसकी पूजा से कामना की सिद्धि होती है, इष्टदेव, कुलदेव।
ये बसिष्ट कुल-इष्ट हमारे, पालागन कहि सखनि सिखावत-९-१६३।
आराध्यदेव, कुलदेव, इष्टदेव।
इष्टसुरनि बोलत नर तिहिं सुनि, दानव-सुर बड़ सुर-०९-२६।
इच्छा, अभिलाषा, यज्ञ विशेष।
’यह' का विभक्ति के पूर्व अदिष्ट रुप।
यह’ का कर्मकारक और संप्रदानरूप।’
स्त्री. पुरुष नहीं कुछ नाम-१० ०५।
देव-दानव-महाराज-रावन सभा, कहन कौं मंत्र इहँ कपि पठाऔ–९.१२८।
(क) इहँई रहौ तौ बदौं कन्हाई। आपु गई जसुमतिहि सुनावन देै गई स्यामहि नंद दुहाई-८५७।
(ख) की इहँई पिय को न बुलावै की ताँई चलि जाहीं--२१४५।
इस जगह, इस लोक में, यहाँ।
तासों भिरहु तुमहिं मों लायक इह हेरनि मुसकानि-२४२०।
(क) इहई बात मधुपुरी जहँ तहँ दासी कहत डरत जिय भरी-२६४०।
(ख) रसना इहई नेम लियौ है और नहीं भाखौं मुख बैन-२७६८।
सांसारिक, इस लोक से सम्बन्ध रखने वाला।
इस लोक में सुख देने वाला।
नाहक मैं लाजनि मरियत है, इहाँ आइ सब नासी-१-१९२।
तहँ भिल्लनि सौं भई लराई। लूटे सब बिन स्याम-सहाई। अर्जुन बहुत दुखित तब भए। इहाँ अपसगुन होत नित नए१-२८६।
ते दिन बिसारि गए इहाँ आए। अति उन्मत्त मोह-मढ छाक्यौ, फिरत केस बगराए--१-३२०।
प्रगट पाप-संताप सूर अव कायर हठै गहौं। और इहाँउ बिवेक-अगिनि के बिरह-बिपाक दहौं-३-२।
(क) इहिं लाजनि मरिऐ सदा, सब कोउ कहंत तुम्हारी (हो)-१.४४।
(ख) सुंदर कर आनन समीप अति राजत इहिं आकार। जलरूह मनौ बैर बिधु सौं तजि, मिलत लए उपकार-१०-२८३।
(क) सूर स्याम इहिं बरजि कै मेटौ अब कुल-गारी ( हो )१-४४।
( ख ) इहिं बिधि इहिं डहके सबै जल-थल-नभ-जिय जेते (हो)-१-४४।
इहि आँगन गोपाललाल को कबहूँ कनियाँ लैहैं-२५५०।
बिरद छुड़ाइ लेहु बलि अपनौ, अब इहि तैं हद पारौ-१-१९२।
मह जिय जानि इहीं छिन भजि, दिन बीते जात असार---१-६८।
(क) तीनौ पन ओर निबहि, इतै स्वाँग कों काछे-१-१३६।
(ख) यही गोत्र, यह ग्वाल इहै सुख, यह लीला कहूँ तजत न साथ।
(ग) मानो भाई सबन इहै है भावत-२८३५
देवनागरी वर्णमाला का चौथा स्वर। यह 'ह' का दीर्घ रूप है। तालु इसका उच्चारण स्थान है। यह प्रत्यय की भाँति शब्दों में जुड़कर विभिन्न शब्द रूप बनाता है।
[सं. हिं.गुल, प्रा. इंगुल]
चमकीले लालरंग का एक खनिंज पदार्थ जिसकी बिंदी सौभाग्यबती हिंदू स्त्रियाँ माथे पर लगाती हैं।
[सं. अंजन = जाना, ले जाना, खीचना]
वह कुँडल' कार मढदी जो सर पर घडा या बोक्ष उठाते समय रखी जाती है।
प्रयोग या शब्द पर जोर देने का अव्यय, ही।
किष्किंधा के राजा बालि का पुत्र जो श्रीराम की सेना में था।
बाहु में पहनने का एक गहना, बाजूबन्द।
उर पर पदिक कुसुम बनमाला, अगदे खरे बिराजैं। चित्रित बाँह पहुँचिया पहुँचै; हाथ मुरलिया छाजै - ४५१।
युद्ध से भागना, पीठ दिखाना।
अंगदान बल को दै बैठी। मंदिर आजु अपने राधा अंतर प्रेम उमेठी---सा० १००।
(क) विरह भयौ घर अगन कोने। दिन दिन बाढ़त जात सखी री ज्यौं कुरखेत के डारे सोने--२८९६।
(ख) एक कहत अंगन दधि माड्यौ-१०५१।
जब ब्रजचद चंद-मुख लषि हैं। तब यह बान मान को तेरी अंगन आपु न रषिहैं-सा ०९७।
ललिता बिसाषा अँगना लिपः वो चौक पुरावो तुम रोरी-२३९५।
अच्छे अंगवाली स्त्री, कामिनी।
[सं. अ = नहीं + हिं. काज]
कार्य हानि, विघ्न, बिगाड़।
[सं. अ = नहीं + हिं. काज]
अबलौं नान्हे-नून्हे तारे, ते सब बुथा-अकाज। साँचे बिरद सूर के तारत लोकनि-लोक अवाज-१-९६।
कार्य को हानि करनेवाला, बाधक, विघ्नकारी।
अकारथ, व्यर्थ, निष्फल, निरर्थक।
(क) कर्म, धर्म, तीरथ बिनु राधन, ह्वै गए सकल अकाथ। अभय दान दे अपनो कर धरि सूरदास कै माथ--१ २०८।
(ख) रह्यौ न परै से प्रेम आतुर अति जानी रजनी जात अकाथ--२७३६।
गई नंद घर को जसुमति जहँ भीतर। देखि महर को कहि उठीं सुत कीन्हो ईतर।
नान्हे लोग तमक धन ईतर----१०४२।
निम्न श्रेणी का, साधारण, नीच।
खेती को हानि पहुँचानेवाले छह प्रकार के उपद्रव--अति वृष्टि, अनावृष्टि , टिड्डी पड़ना,चूहे लगना, पक्षियों की बढ़ती शत्रु का अकमण।
अब राध ना हिनें ब्रजनीति।....। पोच पिसुन लस दसत समासद प्रमु अनंग मंत्री बिनु भीति। राखि बिनु मिलौ तो ना बनि ऐहै कठिन कुराजाराज की ईति-२२२३।
तुम हो संत सदा उपकारी जानत हौ सब रीति। सूरदास ब्रजनाथ बचै हौ ज्यों नहिं आवै ईति----३४२०।
जो गाहक साधन के ऊधो ते सब बसत ईशपुर का शी ३३१५।
आठ सिद्धियों में से एक जिससे साधक सब पर शासन कर सकता है।
(क) ईषद हास दंत-दुति बिगसति, मानिक मोती धरे जनु पोइ-१० २१०।
(ख) असन अधरकपोल नासा सुभग ईषद हास-१३५९।
कर्म भवन के ईस सनीचर स्याम बरन तन ह्वै है-१०-८६।
पूरब और उत्तर के बीच का कोना।
ईशता, स्वामित्व, प्रभुत्व।
कै कहूँ खान-पान रमनादिक, कै कहुँ बाद अनैसे। कै कहुँ रंक, कहूँ ईश्वरता, नट-बाजी गर जैसैं -१-२९३।
अब वै बातैं ईह्याँ रहीं। मोहन मुख मुसकाइ चलत कछु काहू नहीं कही-२५४२।
देवनागरी वर्णमाला का पाँचवाँ स्वर। ओष्ठ इसका ऊच्चारण स्थान है।
सुनौं किन कनकपुरी के राइ। हौं बुधि-बलछल करि पवि हारी, लख्यौ न सीस उँचाइ---९-७८।
बलि कहयौ बिलब अब नेकु नहिं कीजिए मंद. राचत अचल चलौ धाई। दोउ एक मन्त्र करि जाइ पहूँचे तहाँ कहयौ अब लीजिए यहि उँचाई।
घृणा अथवा अस्वीकृति सूचक शब्द।
[सं. उद्गुरण, पा. उग्गुरन == हथियार तानना]
मारने के लिए शस्त्र उठना।
जानौं नहीं कहाँते आवति वह मूरति मन माँह उई-१४३३।
जिसका ऋण से उद्धार हो गया हो, ऋण-मुक्त।
कैसेहु करि उऋण कीजै बधुन ते मोहिं-२९२४।
[सं. उत्कर्ष, पा. उककस = उखाड़ना]
[सं. उत्कर्ष, पा. उककस = उखाड़ना]
मधु बन तुम क्यों रहत हरी……..। कौन काज ठाढ़ी रही बन में काहे न उकठ परी-२७४१।
अंकुरित तरु-पात, उकठि रहे जे गात, बन बेलि प्रफुलित कलिनि कहर के--१०-३०।
[सं. आकुल, पु. हिं. अकुताना]
[सं. आकुल, पु. हिं. अकुताना]
आकुल होना,उतावली करना, जल्दी मचाना।
उभाङ, अंकुरित होने की क्रिया।
न कहने योग्य, अकथनीय, अनिर्वचनीय
[सं.अ = नहीं + काम = इच्छा]
कामनारहित,निस्पृह, इच्छारहित।
स्वरूप, आकृति, मूर्ति, रूप।
कुच युग कुंभ सुंडि रोमावलि नाभि सुहृदय अकार। जनु जल सोखि लयौ से सविता जोबन गज मतवार--२०६२।
नैन जलद निमेष दामिनि आँसु बरषत धार। दरस रबि ससि दुत्यौ धीरज स्वास पवन अकार---२८३४।
[सं. आकार्य्यया , प्रा. अकारिपत्थ]
निष्फल, निष्प्रयोजन, व्यर्थ, वृथा।
(क) आछौ गात अकारथ गार्यौ। करी न प्रीति कमल लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हारयो-१-१०१।
(ख) रे मन, जनम अकारथ खोइसि। हरि की भक्ति न कबहूँ कीन्हीं, उदर भरे परि सोइसि--१.३३२।
(ग) पाँच बान मोहिं संकर दीन्हे, तेऊ गए अकारथ-१-२८७।
कहा भयौ जो घर केै लरिका, चोरी माखन खायौ। इतनी कहि उकसारत बाहैं, रोष सहित बल धायौ---६७४।
[हिं. उकसना + औंहाँ (प्रत्य.)]
उभाड़ते हैं, ऊपर को खींचते हैं।
गैवाँ बिडरि चलीं जित तितको सखा जहाँ तहँ धेरै। बृषभ सृंग सों धरनि उकासत बल मोहन तन हेरेैं।
अनोखा, विशेषार्थपूर्ण कथन।
सूरदास तज ब्याज उक्त सब मोसो कौन चेतावे-सा० ८४।
[सं. उक्ति + गूढ़ = गूढ़ोक्ति]
एक अलंकार जिसमें विशेषर्थिक गूढ़ बात करने वाले के अतिरिक्त किसी तीसरे व्यक्ति के प्रति कही जाय।
[सं. उक्ति + गूढ़ = गूढ़ोक्ति]
गूढ़ वचन, विशेषार्थक कथन।
उक्तगढ तें भाव उदे सब सूरज स्याम सुनावै-सा०
[हिं. उखाड़न (’उखड़ना' का स. रूप)]
माधौ जू यह मेरी गाइ।….। फिरति बेद-बन ऊख उखारति, सब दिन अरु सब राति--१०५१।
कहौ तौ लंक उखारि डारि दउँ जहाँ पिता संपति को--९.८४।
उखेड़ना, अलग करना, छुड़ाना।
मन तो गए नैन हैं मेरे…...। क्रम क्रम गए कह्यौ नहिं काहू स्याम संग अरुझे रे।….। सूर लटकि लागे अँग छबि पर निठुर न जात उखेरे पृं० ३२०।
उखाड़ लो, अलग करो, पृथक करो।
कियो उपाइ निरिक्षर धरिबे को महि ते पकरि उखेरो-९५९।
सूरज प्रभु मिलाप हितस्यासी अनमिल उक्ति गनावै--सा०.१५।
माड़े माड़ि दुनेरो चुपरे। वह घृत पाइ आपुहि उखरे-२३२१।
[सं. उद्गमन, पा. उग्गवन, हिं. उगना)
उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरन-हीन दीप सु मलीन, छीन-दुति समूह तारे-१०-२०५।
कहौ तौ सुरज उगन देहुँ नहिं. दिसि दिसि बाढ़ै ताम-९-१४८।
मुँह से बाहर निकलता या गिरता है।
स्रवत जलकुच परत धारा नहीं उपमा पार। मनौ उगलत राहु अमृत कनक गिरि पर धार-१८४९।
दूसरे का लिया हुआ माल वापस करना।
अंकुरित करना, उत्पन्न करना।
[सं. उद्गार, पा, उग्गाल, हिं. उगाल]
(के) स्यामल गौर कपोल सुचारु। रात्रि परस्पर लेत उगारु-१८२७।
(ख) गौर स्याम कपोल सुललित अधर अमृत सार। परस्पर दोउ पियरु प्यारी रीझि लेत उगार---पृं. ३५१ (७५)।
हाट बाट सब हमहिं उगाहत अपनो दान जगात--१०६७।
[सं. उद्ग्रहण, प्रा. उग्गहन]
वसूल करने का कार्य या भाव।
सद माखन तुम्हरेहि मुख लायक लीजै दान उगाहु----११७४।
मारति हौं तोहिं बेगि कन्हैया, बेगि न उगिलै माटी |१०-२५५।
[स, उद्गिलन, पा. उग्गिलन, हिं. उगलना]
मोहन कान्हेैं न उगिलोै माटी--१०.२५४।
उगाने वाले, उत्पन्न करने वाले, प्रकटाने
जिहिं सरूप मोहे ब्रह्मादिक, रवि-ससि कोटि उगैया। सूरदास तिन प्रभु चरननि की , बालि-बलि मैं बलि जैया-१०.१३१
[सं. उद्गमन; पा. उग्गवन, हिं. उगना]
सूर दास रसरशसि रस बरस केै चली, जानौं हरतिलक कुहू उग्यौ री-६९१।
मथुरा के राजा जो कंस के पिता थे। कंस ने इन्हें बन्दीगृह में डाल रखा था। श्री कृष्ण ने कंस को मार कर इनका उद्धार किया और पुनः इन्हें सिहासन पर बैठाया।
बेनी लसति कहौं छबि ऐसी महलनि चित्रे उर्ग-२५६२।
[सं. उत्कथन, पा. उक्कथन, अथवासं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन, हिं. उघटना]
ताल देकर, सम पर तान तोड़कर।
कोउ गावत, कोउ मुरलि बजावत, कोउ बिषान, कोउ बेनु। कोउ निरतत कोउ उघटि तार दै, जुरी ब्रज-बालक सेनु-४४८।
ताल देकर, सम पर तान तोड़कर।
(क) कोउ गावत, कोउ नृत्य करत कोइ उघडत, कोउ करताल बजावत--४८०।
(ख) कालि नाग के फन पर निरतत, संकषन कौ बीर। लाग मान थेइ-थेइ करि उघटत, ताल मृदंग गँभीर----५७५।
(ग) उधटत स्याम नृत्यत नारि पृं० ३४६ (४५)।
ताल देती हैं, सम पर तान तोडती हैं।
कबहुँक गावति, कबहुँ नृत्यत, कबहुँ उघटति रंग-पृं. ३४६ (४५ )।
किसी को बुरा-भला कहते कहते बाप-दादे तक पहुँचना।
उघटति हौ तुम माता-पिता लौं नहिं जानौ तुम हमको---१०८९।
[सं. उत्कथन, पा. उक्कथन अथवा स उद्घाटन, पा. उग्घाटन]
ताल देना, सस पर तान तोड़ना।
[सं. उत्कथन, पा. उक्कथन अथवा स उद्घाटन, पा. उग्घाटन]
[सं. उत्कथन, पा. उक्कथन अथवा स उद्घाटन, पा. उग्घाटन]
हेरत हरष नन्दकुमार। बिनु दिये बिपरीत कवजा पग छपाईन भार'। रंच उघरत द्वेष नीकन मान उरवर भेद--सा ० ३६।
[सं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन हिं. उघड़ना]
[सं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन हिं. उघड़ना]
[सं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन हिं. उघड़ना]
[सं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन हिं. उघड़ना]
[सं. उद्घाटन, पा. उदघाटन, हिं.उघरना]
(क) छोरे निगड़, सो आए, पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरचौ १०-८।
(ख) डोलत तनु सिर अंचर उघरचौ बेनी पीठ डुलति इहिं भाइ---१०२९८।
[सं. अकार्याथं , प्रा. अकारियत्थ, हिं. अकारथ]
साधु-संग भक्ति बिना तन अकार्थ जाई---१-३३०।
यह बिनती हौं करौं कृपानिधि, बार-बार अकुलाइ। सूरजदास अकाल प्रलय प्रभु, मेटौ दरस दिखाइ-९-११०।
जदुपति जोग जानि जिय सांचो नयन अकस चढ़ायो-२९२२।
गहौ अकास :- अनहोनी या असंभव बात करते हो। उ.- बातनि गहौ अकास सुनहि न अवै साँस बोलि तौ कछु न आवै ताते मौन गहियै--१२७३।
गुन अकास को सिद्ध साधना सास्त्र करत बिस्तार--सा० १०४।
[सं. उत्कथन, पा. उक्कथन अथवा स उद्घाटन, पा. उग्घाटन]
किसी को गाली देते-देते बाप-दादे तक पहुँचना।
[सं. उद्घाटन, पा. उग्घाटन, हिं. उधटना]
मन मेरैं नट के नागर ज्यौं तिनहीं नाच नचायौ। उघट्यौ सकल सँगीत-रीति भव अंगनि अंग बनायौ। कामक्रोध-मद-लोभ-मोह की तान तरंगनि गायौ-१-२०५१
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घाटन]
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घाटन]
प्रकट होना, प्रकाशित होना।
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घाटन]
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घाटन]
उधर आयौ परदेसी को नेह-१० उ.-९०।
खुलता हैं, आवरण या परदा हटता है।
(क) राखौ पति गिरिवर गिरिधारी। अब तौ नाथ रह्यौ कछु नहिंन उघरत माथ अनाथ पुकारी-१-२४८।
(ख) जैसे सपनो सोइ देखियत तैसोै यह संसार। जात बिलय ह्वै छिनक मात्र मैं उघरत नैन-किवार।
असली रूप में प्रकटती है, असलियत खुलती है, भंडो फूटता है।
सेमर फूल सुरंग अति निरखत, मुदित होत खग-भूप। परसत चोंच तूल उघरत मुख, परत दु:ख कै कूप--१.१०२।
स्यामा स्याम सो होरी खेलत आज नई।….सूरदास जसुमति के आगे उघरि गई कलई।
सहज कपाट उघरि गए ताला कूँजी टूँटि----२६२५।
उधर नच्यौ चाहत हौं :- लोकलाज की परवाह न करके मनमानी करता चाहता हूँ। उ.- हौं तौ पतित सात पीढ़िन कौ पतितै ह्वै निस्तरिहौं। अब हौं उघरि नच्यौ चाहत हौं तुम्हैं बिरद बिन करिहौं-१-१३४।
"(क) थोरे ही में उघरि परेंगे अतिहि चले इतराइ--पृं० ३२२।
(ख) हम जातहिं वह उघरि परैगी दूध दूध पानी सो पानी---१२६२।"
ह्याँ ऊधो काहे को आए कौन सी अटक परी। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु सब पाती उघरी-३३४६।
[सं. उद्घाटन, पा, उग्घाटन, हिं. उघरना]
बदन उघारि दिखायौ अपनौ, नाटक की परिपाटी। बड़ी बार भई लोचन उघरे, भरम-जवनिका फाटी-१०-२५४।
[सं. उदघाटन, प्रा. उघाड़न, हिं. उघाड़न]
खोल कर, अवरणहीन की, नंगी की।
(क) याकै बस मैं बहु दुख पायौ, सोभा सबै बिगारी। करिये कहा, लाज मरियै जब अपनी जाँघ उघारी १०.१७३।
(ख) बिदुर सस्त्र सब तहीं उतारी। चल्यौ तीरथनि मुंड उघारी-१-१४४।
[सं. उदघाटन, प्रा. उघाड़न, हिं. उघाड़न]
सिव की लागी हरिपद तारी। तातैं नहिं उन आँखि उघारी---४-५।
अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंदमुरारी। सूरदास अवसर के चूकैं, फिरि पछितैहौ देखि उघारी----१-२४८।
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घा ड़न, हिं. उघारना]
दुरलभ भयौ दरस दसरथ कौ, सो अपराध हमारे। सुरदारा स्वामी करुनामय, नैन जात उघारे-९-५२।
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घा ड़न, हिं. उघारना]
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घा ड़न, हिं. उघारना]
[सं. उद्घाटन, प्रा. उग्घाड़न, हिं. उघाड़ना]
खोलत (है) , आबरणहीन या नंगा (करता है)।
द्रुपद-सुता कौ मिट्यौ महादुख, जबहीं सो हरि हेरि पुकारौ। हौं अनाथ, नाहिंन कोउ मेरौ, दुस्सासन तन करत उधारो-१-१७२।
प्राप्त समय उठि सोवत सुत को बदन उधारयौ नंद-१०-२०३।
[सं. उच्च = ऊँचा +करण = करना]
(क) पलक नेक उघार देखत काय सुन्दर गात-सा. ६६।
(ख) मनिन बार बस उघार ६ संभु-कोग दुआर आयौ आद को तनु मार--सा, ८९।
खोलते है, ढकना हटाते हैं।
सूनै भवन कहूँ कोउ नाहीं मनु याही को राज। भाँड़े धरत, उघारत, मूँदत दधि माखन कैं काज----१०-२७७।
[सं. उदघाटन, प्रा. उग्धाड़न] हिं. उघारन]
लाल उठौ मुख धोइए, लागी बदन उघारन-४३९।
[सं. उद्घाटन, प्रा. उघाड़न, हिं. उघाड़ना]
[सं. उद्घाटन, प्रा. उघाड़न, हिं. उघाड़ना]
प्रकट करना, प्रकाशित करना।
खोलकर, आवरण रहित करके, नग्न करके।
(क) जीरन पट कुपीन तन धारि। चल्यौ सुरसरी, सीस उघारि-१३४१।
(ख) बिदुर सस्त्र सब तबहिं उतारि। चल्यौ,तीरथनि मुंड उघारि-१-२८४।
खोलकर, प्रकट करके, बताकर।
नीके जाति उघारि आपनी जुवतिन भले हँसायौ---१०९८।
अनलायक हम हैं को तुम हो कहौ न बात उघारि---२४२०।
प्रकट करके, प्रकाशित रूप से।
चलीं गावति कृष्न के गुन हृदय ध्यान बिचारि। सबके मन जो मिलै हरि कोउ न कहत उघारि १०८०
केतिक लंक, उपारि बाम कर, लै आवेै उचकाइ-९-७४।
(क) सत बचन गिरिदेव कहत है कान्ह लेई मोहिं कर उचकाई।
(ख) गोबर्धन लीन्हो उचकाई-१०५६।
उचकाकर, ऊपर उठाकंर, ऊँचा करके।
मिलि दस पाँच अली बलि कृष्नहिं गहि लावत उच काय। भरि अरगजा अबीर कनक घट देति सीस ते नाय--२४९९।
पैर के पंजों के बल ऊपर उठकर तथा सिर ऊँचा करके।
अति ऊँचो बिस्तार अतिहि बहु लीन्हो उचकि करज भुज बाम--९९७।
बट मारी, ठग, चोर उचक्का, गाँठकटा, लठ बाँसी--१-१८६।
[स. उच्च = ऊँचा + करण = करना, हिं. उचकना]
ऊपर उठा, उठकर ऊपर आया, उतरया।
हम सँग खेलत स्याम जाइ जल माँझ धँसायौ। बूड़ि गयौ, उचक्यौ नहीं तो बातहि भई अबेर ५८९।
[सं. उच्चाटन, हिं. उचटना]
अलग होती हैं, छूटती है, छिटकती है।
(क) लटकि जात जरि-जरि दुम-बेली, पटकत बाँस, काँस कुस ताल। उचटत भरि अंगार गगन लौं, सूर निरखि ब्रजजन-बेहाल-५९४।
(ख) पटकत बाँस, काँस कुस चटकत, लटकत ताल तमाल। उचटत अति अंगार, फुदत फर, झपटत लपट कराल---६१५
उखाड़ना, अलग होना, छूटना।
जमी वस्तु का पृथ्वी से अलग होना।
खिल करके, उदासीन करके, विरक्त करना।
अब न पियहिं उचटाइ हौं मोकों सरमात है त्रास करत मेरी जिती आवत सकुचात----२१७४।
खिन्न किया, विरक्त कर दिये।
नैननि हरिकौ निठुर कराए। चुगली करी जाइ उन आगे हमतें वे उचटाए--पृ० ३३०।
वा देखत हमको तुम मिलिहौं काहे को ताको अनखावत। जैहै कहूँ निकसि हरिदै ते जानि-बूझि ते हि क्यौं उचटावत-१८७०।
खिन्न करते हो, उदासीन करते हो विक्त करते हो।
जल बिनु मीन रहत कहुँ न्यारे यह सो रीति चलावत। जब ब्रज की बातैं यह कहियत तबहिं तबहिं उचटावत-२९१२
[सं. उच्चाटन, हिं. उचटना]
अति अगिनझार, भँभार धुंधार करि, उचटि अंगार झंझार छायौ.५९६।
[सं. उच्चाटन, हिं. उचटना]
जागहु जागहु नंद कुमार। रवि बहु | चढ्यौ, रैनि सब बिधटी, उचटे सकल किवार----४०८।
उखड़ती है, भूमि से अलग होती हैं।
[सं. उच्चाटन, प्रा. उच्चाड़न]
[सं. उच्चाटन, प्रा. उच्चाड़न]
(क) परी दृष्टि कुच उचनि पिया की वह सुख कह्यौ न जाइ।
(ख) चिबुक तर कंठ श्री माल मोतीन छबि कुच उचनि हेमगिरि अतिहि लाजै।
बोलना, मुँह से शब्द निकालना।
[सं. उच्चारण, हिं. उच्चरना]
उच्चारण की, मुँह से कही।
निज पुर आइ, राइ भीषम सौं, कही जो बातैं हरि उचरी---१-२६८।
[सं. उच्चारण, हिं. उचरना]
लियौ तँबोल माथ धरि हनुमत, कियौ, चतुरगुन गात। चढ़ि गिरिसिखर सब्द इक उचरयौ, गगन उठयौ। आघात...९-७४।
[सं. उच्च + करण, हिं. उजाला]
ऊँचा करके, उठाकर, ऊपर करके।
(क) सुनौ। किन कनकपुरी के राइ। हौं बुधि-बल-छल करि हारी लख्यौ न सीस उचाइ-९-७५।
(ख) बाँह उचाइ काल्हि की नाइ धौनी धेन बुलावहु--१०-१७९।
[सं. उच्च + करण, हिं. उजाला]
दरकि कंचुक, तरकि माला, रही धरणी जाइ। सूर प्रभु करि निरखि करुना, तुरत लई उचाई।
बलि कहचौ, बिलँब अब नैंकु नहिं कीजिए, मंदराचल अचल चले धाई। दोउ इक मंत्र ह्वै जाइ पहुँचे तहाँ, कहयौ, अब लीजिये इहिं उचाई--८८।
उठाया, उठाकर खड़ा किया, गिरे से उठाया।
तब परे मुरछाइ धरनी काम करे अकाजु। सखिन तब भुज गहि उचाए कहा बावरे होत-२२६०।
चितै मंद मुसुकाय कै री जिय करि लेय उचाट---२४१३।
मन का न लगना, विरक्ति, उदासीनता।
चित्त को किसी ओर से हटाना।
अनमनापल विरक्ति, उदासीनता।
चित्त को किसी ओर से हटाना।
अनमना, विरक्ति, उदासीनता।
उचाट, उदासीन, अनमनी, विरक्त।
सखी संग की निरखति यह छबि भई व्याकुल मन्मथ की डाढ़ी। सूरदास प्रभु के रस-बस सब, भवन-काज तैं भई उचाढ़ी---७१६।
[सं. उच्च + करण, हिं. उचाना]
इंद्र हाथ ऊपर रहि गयौ। तिन कह्यौ, दई कहा यह भणौ। कह्यौ सुरनि तुम रिषहिं सतायौ। तातै कर रहि गयौ उचायौ-९.३।
दो हकार उचार थाको रहे काढ़त प्रान–सा ० ५७।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
उच्चारण करते हैं, कहते हैं।
तात-तात कहि बैन उचारत,हवै गए भूप अचेत-९-३९।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
(क) नृपति कछु नहिं बचन उचारा-९-४।
(ख) छीरसमुद्र-मध्य तैं यौं हरि दीरघ बचन उचारा-१०.४।
आकाश से कहे हुए शब्द, देववाणी।
भई अकासबानी तिहि बार। तु ये चारि श्लोक बिचार---२-३७।
यह कहिके सो चलो पर ई। जैसै तड़ित अकासै जाई-९.२।
काहे को पिय सकुचत हौ। अब ऐसौ जिनि काम करौ कहुँ जो अति ही जिये अकुवत हौ-२१८३।
घबड़ा कर, व्याकुल होकर, दुखी होकर।
(क) रोवत देखि कह्यो अकुलाई, कहा करयो तै बिप्र अन्याई१०-५७।
(क) बिरहा-बिया तन गई लाज छुटि, बरंवार उठै अकुलाई-९.५६।
(ग) मैं अज्ञान अकुलाइ अधिक लै, जरत माँझ घृत ने।यौ--१-१४५।
(ग) निसि दिन पथ जोहत जाइ। दधि को सुन-सुत तासु आसन बिकल हो अकुलाई सा ० २२।
उतावले हुए, ऊब गए, उकता गए।
(क) लिखि मम अपराध जनम के चित्रगुप्त अकुलाए-१-१२५।
(ख) रथ हैं उतरि अवनि आतुर हूँ, चले चरन अति धाए। भू संचित भू-सार उतारन, चपल भए अकुलाए-१-२७३
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
बिप्र लगे धुनि बेद, जुवतिन मगल गाए--९.२४।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
उच्चारण करके, मुँह से शब्द निकालकर, बोलकर।
तब अर्जुन नैननि जल डारि। राजा सौं कह्यौ बचन उचारि-१-२८६।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
उच्चारण की, कही, मुँह से निकाली।
(क) अधिक कष्ट मोहिं परयौ लोक मै, जब यह बात उचारी। सूरदास-प्रभ हँसत कहा है, मेटौ बिपति हमारी---१-१७३।
(ख) पकरि लियो छन माँझ असुर बल डारयौ नखन बिदारी। रुधिर पान करि माल आँत धरि जय जय शब्द उचारी।
(ग) सूर प्रभु निरखि दण्डवत सबहिनि कियौ, सुर रिषिन सबनि अस्तुति उचारी---४ ६।
[सं. उच्चाटन, हिं. उचारना]
रिषी क्रोध करि जटा उचारी। सो कृत्या भइ ज्वाला भारी।
[सं. उच्चाटन, हिं. उचारना]
सूर प्रभु अगम-महिमा न कछु कहि परत, सिद्ध गंधर्ब जैजै उचारे-९-१६३।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
हाँसी मैं कोउ नाम उचारैं। हरि जू ताकौ सत्य बिचारैं।…..। जो-जो मुख हरि नाम उचारैं-६-४।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
रंक रावन, व हाऽतंक तेरौ इतौ, दोउ कर जोरि बिनती उचारौं---९.१२९।
[सं. उच्चारण, हिं. उचारना]
जैसे कर्म, लहौ फल तैसे, तिनका तोरि उचारचौ---१-३३६।
[हिं. ऊँचा + औंहाँ (प्रत्य. )]
[हिं. ऊँचा + औंहों (प्रत्य.)]
उच्चारण करता, बोलता, कहता।
साधु सील सद्रूप पुरुष को, अपजस बहु उच्च रतौ--१-२०३।
जज्ञ पुरुष बानी उच्चरी----४-५।
ज्यौं-त्यों कोउ हरि-नाम उच्चरै। निस्चय करि सो तरै परै-६-४।
अब मैं यहै बिनै उच्चरौं। जो कछु आज्ञा होइ कराँ–४-१२।
रामहिं राम सदा उच्चारौ-७-२।
पुनि सो सुरूचि कैं चरननि मस्यौ। तासौं बचन मधुर उच्चरचौ---४-९।
बोलना, कहना, उच्चारण करके, मुँह से बोलकर।
अत ओसर अरध-नाम-उच्चार करि सुस्रत गज ग्राह तेैं तुम छुड़ायौ--१-११९।
[सं. उत्साह, प्रा. उच्छाह]
[सं. उत्साह, प्रा. उच्छाह]
उच्चारण की, मुँह से बोली, कही।
नब कुंती बिनती उच्चारी–१२८१।
उच्चारण किये, बोले, वर्णित किये, बखाने।
दोउ जन्म ज्यौं हरि उद्धारे। सो तौं मैं तुमसौं उच्चारे---१०-२।
हरि-हरि नाम सदा उच्चारैं-७-२।
बिप्रनि जज्ञ बहुरि बिस्ता रयौ। बेद भली बिधि सौं उच्चारचौ---४.५।
एक सुन्दर धोड़ा जो समुद्र के चौदह रत्नों में था। इसके कान खड़े और यह सात थे। इन्द्र इसका अधिकारी है।
निकसे सबै कुँवर असवारी उच्चैःश्रवा के पोर-१० उ०---३-६।
कुसल अंग, पुलकित वचन, गद्गद् महि मन सुख पाइ। प्रेमघट उच्छलित ह्वै है नैन अंस बहाइ---२४८६।
[हिं. उचकना, उझकना = चौंकना]
उछलता है, ऊपर उठता और गिरता है।
उछरत सिन्धु, धराधर काँपत, कमठ पीठ अकुलाइ--१०-६४।
स्रोनित छिछ उछरि आकासहि, गज-बाजिन सिर लागि---९-१५७।
उभड़ते है, चिह्न पड़ते है, उछलते हैं।
किसी की परवाह न करनेवाला, उद्दंड।
[सं.उत्सं.ग, प्रा. उच्छंग]
(क) लै उछंग उपसग हुतासन, ‘निहकलक रघुराई। ' लई बिमान चढ़ाई जानकी, कोटि मदन छबि छाई-९-१६२।
(ख) बंधन छोरि नंद बालक को लेैं उछंग करि लीन्हो। (ग) बालक लियौ उछंग दुष्टमति हरषित अस्तन पान कराई १०-५०।
[सं.उत्सं.ग, प्रा. उच्छंग]
उछंग लई :- छाती से लगा लिया, अलिंगन किया। उ.- सुर स्याम ज्यौ उछग लई मोहिं. त्यौं मैं हूँ हँसि भेटौंगी।
धूसर घूरि दुहुँ तन मंडित, मातु जसोदा लेति उछंगना १०-११३।
उछंगि लेई :- छाती से लगाया। उ.- स्याम सकुच प्यारी उर जानी। उछंगि लेई बाम भुज भरिकै बार-बार कहि बानी-१६०१।
मनमाना काम करनेवला, निरंकुश।
ऊँचाई जहाँ तक उछला या उछाला जाय।
[सं. उत्साह. प्रा. उच्छाह]
गोति लषन के बैरी आन के अकुलाय। पक्षिराज सुनाथ पति नी भोगिबो चित चाय-स. उ. ४५।
ब्याकुल या दुखी हैं, घबड़ाते हैं।
(क) दसरथ-सुत कोसलपुरवासी, क्रिया हरी तातै अकुलात---९-६९।
(घ) बिधि लिखी नहिं टरत कैसेहु, यह कहत अकुलात-२९१७।
(ग) सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कौं अति आतुर अकुलात-सा० उ० ३।
जल्दी करता है, उतावला है।
कल्प:समान एक छिन राघव, क्रम-क्रम करि हैं चित वत। तातै हौं अकुलात, कृपानिधि ह्वै हैं पैड़ो चितवत--९-८७।
पूछौ जोइ तात सौं बात। मैं बलि जाउँ मुखारबिंद की तुमहीं काज कंस अकुलात-५३०।
घबड़ाया, व्याकुल हुआ, बेचैन हुआ।
डोलत महि अधीर भयौ फनिपति कृर म अति अकुलान-९:२६।
व्याकुल हुई, दुखी या बेचैन हुई।
(क) परै बज्र या नृपति-सभा पै, कहति प्रजा अकुलानी--१-२५०।
(ब) जब जानी जननी अकुलानी। आप बँधायौ सारंगपानी-३९१।
कर तै साँटि गिरत नहि जानी, भुज छाँड़ि अकुलानी। सूर क है जसुमति मुख मूँदौ, बलि गई सारंगपानी--१०-२५५।
घबड़ाए, व्याकुल हुए, बेचैन हुए।
(१)....हरि पीवत जब पाई। बढ़यो बृच्छ बट, सुर अकुलाने, गगन भयौ उतपात। महा प्रलय के मेघ उठे करि जहाँ तहाँ आघात---१०-३४।
अति रि सही तैं तनु छीजै, सूठि कोमल अंग पसीजै। ब रजत बरजत बिरुझाने। करि क्रोध मनहि अकुलाने-१०-१८३।
उछलकर वेग से ऊपर उठ और गिरकर।
आनन्द-मगन धेनु स्रवैं थनु पय-फेनु, उमग्यौ जमुन-जल उछलि लहर के-१०-३०।
स्याम रस घट पूरि उछलित बहुरि धरयौ सँभारि--१२१७।
उमंगि आनंद-सिंधु उछल्यौ स्याम के अभिलाष-पृ०३४३ (२२)
लैं बसुदेव धँसे दह सूधे, सकल देव अनुरागे। जानु, जंघ, कटि, ग्रीव, नासिका, तब लियौ स्याम उछाँगे। चरन पसारि परसी कालिंदी, तरवा नीर तियागे-१०-४।
[सं. उच्चाटन, हिं. उचाटना]
[सं. उत्साह. प्रा. उच्छाह]
[सं. उत्साह. प्रा. उच्छाह]
उरनि उरनि वै परत आनि कै जोधा परम उछाहु--२८२६।
स्वच्छ करना, उज्ज्वल करना।
स्वच्छ करके, निर्मल कराकर।
[सं. उज्ज्वल, प्रा. उज्ज्वल]
[सं. उज्ज्वल, प्रा. उज्ज्वल]
[सं.उद् = ऊपर, अच्छी तरह + जागर = जागना, जलना, प्रकाशित होना]
कोर्तियुक्त, प्रकाशित, दीप्तिमान, जगमगाता हुआ।
(क) क्रिया-कर्म करत हु निसि-बासर भक्ति कौ पंथ उजागर--१-९१।
[सं.उद् = ऊपर, अच्छी तरह + जागर = जागना, जलना, प्रकाशित होना]
वंश को गौरवान्वित करनेवाला।
(क) सूर धन्य जदुबंस उजागर धन्य ध्वनि घुमरि रह्यो-२६१६।
(ख) इनके कुल ऐसी चलि आई सदा उजागर बंस--३०४९।
[सं.उद् = ऊपर, अच्छी तरह + जागर = जागना, जलना, प्रकाशित होना]
(क) जांबवान जो बली उजागर सिंह मारि मनि लीन्ही।
(ख) दिन द्वै घाट रोकि जमुना को जुवतिन में तुम भए उजागर---११२३।
[सं.उद् = ऊपर, अच्छी तरह + जागर = जागना, जलना, प्रकाशित होना]
(क) झूमत नैन जम्हात बारही रीति-संग्राम उजागर हो--२१४०।
(ख) कहियौ मधुर सँदेस सुचित दै मधुबन स्याम उजागर----२९८०।
उपयोग में लाया हुआ, प्रयुक्त।
जय अरु विजय कर्म कह कीन्हौ, ब्रह्म सराप दिवायौ। असुर-जोनि ता ऊपर दीन्ही। धर्म-उछेद करायौ।---१-१०४।
[सं. उद = बहुत + जड़ = मूर्ख अथवा सं. उद्दड]
जंगली, गँवार, वज्र मूर्ख।
[सं. उद = बहुत + जड़ = मूर्ख अथवा सं. उद्दड]
निर्जन होजाना, बसा न रहना।
आय क्रूरलै चले स्याम को हित नाही कोउ हरि कै।….। सूरदास प्रभु सुख के दाता गोकुल चले उजर कै-२५२९।
धारा से उलटी अर्थात चढ़ाव की ओर।
सूरदास-प्रभु सबहिनि प्यारो। ताहि डसन जाको हिय उजारो---७६२।
उजाड़ डाला, ध्वस्त कर दिया।
तुरतहिं गमन कियौ सागर तैं, बीच हि बाग उजार यौ--९-१०३।
प्रकट हुआ, प्रकाशित किया।
(क) दाऊ जू, कहि स्याम पुकारयौ। नीलांबर कर ऐंचि लियौ हरि, मनु बादर तेैं चंद उजारयौ----४०७।
(ख) तब हँसि चितए स्याम से ज तैं बदन उघारयौ। मानहुँ पयनिधि मथत, फेन फटि चंद उजारयौ-४३१।
हरि के गर्भ बस जननी को बदन उजारयौ (उजारौ) लाग्यौ। मानहुँ सरद-चंद्रमा प्रगटयौ, सोचतिमिर तन भाग्यौ-१०-४।
भली कही यह बात कन्हाई अतिहिं सघन अरन्य उजारि---४७२।
जो मोकौं नहिं फूल पठावहु तौ ब्रज देहू उजारि---५३६।
नष्ट की, खोद डाली, उजाड़ दी।
हरि कैं गर्भ बास जननी को बदन उजारौ लाग्यौ। म नहु सरदचंद्रमा प्रगटयौ, सोच-तिमिर तन भाग्यौं-१०४।
पाप उशीर कह्यौ सोई मान्यौ, धर्म-सुधन लुटयौ-१-६४।
उजेला फैला रही है, प्रकाशित है, चमक रही हैं।
पुनि कहि उठी जसोदा मैया, उठहु कान्ह रवि-किरनि उजेरत ४०५।
प्रकाशित करना, प्रकाश फैलाना।
के हरि-नख उर पर रुरै, सुठि सोभाकारी। मनौ स्याम घन मध्य मैं नव ससि उजियारी-१०-१३४।
बदन देखि बिधु-बुधि सकात मन, नैन कंज कुंडल उजियारी-१०-१९६।
वंश को उज्ज्वल करने वाली, सती-साध्वी स्त्री।
बलिहारी वा बाँस बंस की बंसी-सी सुकुमारी।…...। बलिहारी वा कुंज-जात की उपजी जगत उजियारो-३४१२।
(क) कबहुँक रतनमहल चित्र सारी सरदनिसा उजियारी। बैठे। जनकसुता सँग बिलसत मधुर केलि मनुहारी।
(ख) भूपन सार ‘सूर' भ्रम सीकर सोभा उड़त अमल उजियारी---सा ० ५१।
उज्ज्वल या गौरवान्वित करने वाला पुरुष।
माखन-रोटी तातीताती लेहु कन्हैया बारे। मन मैं रुचि उपजावै, भावै त्रिभुवन के उजियारे-४१९।
अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ। सब्दहिं सब्द भयौ उजियारौ सतगुरु भेद बतायौ-४-१३।
[सं. उद्योत, प्रा. उज्जोत]
पालभाव अनुसरति भरत दृग, अम्र अंसुकन आनै। जनु खंजरीट जुगल जठरातुर लेत सुभष अकुलाने--२०५३।
यह सुनि दूत गयौ लंका मैं, सुनत नगर अकुलानौ-९-१२१।
घबड़ाया, दुखी या बेचैन हुआ।
यह सुनि नंद डराइ, अतिहि मन-मन अकुलान्यौ-५८९।
गोति लषन के बैरी आन के अकुलाय। पक्षिराज सुनाथ पतिनि नी भोगिबो चित चाय-सा . उ. ४५।
कपिल कुलाहल सुनि अकुलायौ---९-९।
दुखी होती हैं, घबड़ाती हैं।
माघ-तुषार जुवति अकुलाहीं। हयाँ कहूँ नंद-सुवन तौ नहीं--७९९।
पुरुष अरु नारि को भेद भेदा नहीं कुलनि | अकुलीन अबित हौ काके-२६३५।
जिसका अनुमान न लगाया जा सके, जो कूता न जा सके, असीम, अपरिमित।
(क) धन्य नंद, धनि धन्य जसोदा, जिन जायौ अस पूत। धन्य भूमि, ब्रजबासी धनि धनि, अनंद करत अकूत--१०-३६।
(ख) निसि सपने को तृषित भए अति सुन्यौ कंस को दूत। सूर नारि नर देखन धाए घर घर सोर अकूत--२४९२।
खेलत हँसत करें कौतूहल। जुरे लोग जहँ तहाँ अकूहल---१०२२।
[हिं. उजाला + स (प्रत्य.)]
[सं. उज्ज्वल, हिं. उजियारी]
लै पौढ़ी आँगन हीं सुत | कौ° छिटकि रही आछी उजियरिया--१०-२४६।
वश को गौरवान्वित करने वाला पुरुष।
उचकतेकूदते हुए, जाते-जाते।
बरज्यौ नहिं मानत उझकत फिरत हौ कान्ह घर घर--१६४३।
देखने के लिए | ऊँची होती है, उचककर।
द्रुम-बेली पूँछति सब उझकति देखति ताल तमाल-१८२७।
झाँकने के लिए सिर बाहर निकालना।
(क)जैसे के हरि उझकि कूप-जल देखत अपनी प्रति-१-३००।
(ख) अलंबित जु पृष्ट बल सुन्दर, परसपरहिं चितवत हरिराम। झाँकि-उझकि बिहँसत दोऊ सुत, प्रेम-मगन भइ इकटक जान-१०-१५७।
(ग) जैसे केहरि उझकि कूप जल देखे आप मरत।
शुभ्र, विशद, स्वच्छ, निर्मल।
हँस उज्जल, पंख निर्मल, अंग मलिमलि न्हहिं-१-३३८।
[सं. उद् = ऊपर + जल = पानी]
उज्ज्वल या गौरवान्वित करने वाली।
मध्य ब्रजनागरी रूपरस आगरी घोष उज्जागरी स्याम प्यारी---१२९०।
[सं. उद् = बहुत+जड़ = मूर्ख]
प्रकाश, कांति, दीप्ति, प्रभा।
गरजत मेघ, महा डर लागत, बीच बढ़ी जमुना जल-कारी। तातैं यहै सोच जिय मोरैं, क्यौं दुरिहै ससि-बदन उज्यारी-१०-११।
[सं. उज्ज्वल, हिं. उजियारा]
प्रात भयो उठ दे खऐ, रवि किरनि उज्यारे-४३९।
[सं. उज्ज्वल, हिं. उजाला]
देखत आनि सँच्यौ उर अंतर, दै पलकनि कौ तारौ री। मोहिं भ्रम भयौ सखी, उर अपनैं, चहुँ दिसि भयौ उज्यारौ री--१०.१३५।
खारिक, दाख चिरोैंजी, किसमिस, उज्वल गरी बदाम---१०-२१२
[सं.अट् = घूमना. बार-बार + कलन = गिनना या उत्कलन]
ऊँची या ऊपर उठी हुई वस्तु को सहारा लेना, टेक लगाना।
उठती है, ऊपर की ओर जाती है।
[सं. उत्थान, प्रा. उट्ठान, हिं. उठना]
बैठत-उठत सेज-सोवत मैं कंस-डरनि अकुलात-१०-१२।
[सं. उत्थान, प्रा. उट्ठान, हिं. उठना]
बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।
[सं. उत्थान, प्रा. उट्ठान, हिं. उठना]
उत्पन्न होता है, (सुप्त भाव जैसे दुख) जागता है।
भानुसुत-हित-सत्रु-पित लागत उठत दुख फेर-सा. ३ ३।
उठत (गाइ) - उठती है, (गाने) लगती है।
एक परस्पर देत बधाई, एक उठत हँसि गाई-१०-२०।
नंद कौ लाल उठत जब सोई। निरखि मुखारबिंद की सोभा. कहि, काकैं मन धीरज होइ-१०-२१०।
देखने के लिए सिर उठाकर, झाँकने के लिए सिर बाहर निकालकर।
(क) जहँ तहँ उझ कि झरोखा झाँकति जनक-नगर को नार। चितवनि कृपाराम अवलोकत , दीन्हौ सुख जो अपार।
(ख) सूखे भवन अकेली मेैहों नीकै उझकि निहारयौ। मोते चूक परी मैं जानी, तातैं मौहिं बिसारयौ।
(ग) फिरि फिरि उझकि झाँकत बाल-सा. ३४।
(द्रव पदार्थ को) ऊपर से गिराना या बहाना।
ऊपर करना, ऊपर उठाना, ऊपर खिसकाना।
छोटा कपड़ा जो पहनने पर ऊँचा-ऊँचा लगे
अनुमान करता है, अटकल लगता है।
[सं.ज्ञाउत्थान, प्रा. उटठान, हिं. उठना]
ऊँची होती है, ऊँचाई तक जाती हैं।
या संसार-समुद्र, मोह-जल, तृष्ना-तरंग उठति अतिभारी-१-२१२।
[सं. उत्थान, प्रा. उट्ठान, हिं. उठाना]
[सं. उत्थान, प्रा. उट्ठान, हिं. उठाना]
अनि मथानी दह्यौ बिलोबौं जौ लागि लालन उठन न पावै। जागत ही उठि रारि करत है, नहिं मानै जौ ईद मनावै---१०-२३१।
करै उपाय सो बिरथ जाई। नृप की आज्ञा लियो उठ ई।,
[हिं. उठाना ('उठना' का स. रूप)]
अमृत-गिरा बहु बरषिं सूर प्रभु, भुज गहि पार्थ उठाए--१-२९।
गिरी हुई वस्तु को खड़ा करना।
कुछ काल तक अपने ऊपर धारण करना।
तब हरि धरि बाराह-बपु, ल्याए पृथी उठाइ–३-११।
खड़ग उठाइ :- मारने को तलवार उठाई, मारने को प्रस्तुत हुए। उ.- ताहि परिच्छित खड्ग उठाइ--१-२९०।
कोपि अंगद कह्यौ, धरौं धर चरन मैं ताहि जो सकै कोऊ उठाई।-९-१३५।
किसी गिरी हई वस्तुको ऊपर उठाना।
लकुट लिए कर टेरत जाई। कहत परस्पर लेहु। उठाई-१०५८।
को जानै केहि कारन प्यारी सो लष तुरत उठाने। चपला और बराह रस आखर आद देख झपटाने---सा० ७२।
( बोझ आदि) ले जाने के लिए उठाया, धारण किया।
(क) दौना गिरि हनुमान उठायौ। संजीवनि कौ भेद न पायौ, तब सब सैल उठायौ–९.१५०।
(ख) मंदराचल उपारत भयौ स्रम बहुत बहुरि लै चलन को जब उठायौ---८-८।
गहे अँगुरिया ललन की नँद चलन सिखावत। अरबराइ गिरि परत हैं, कर टेकि उठावत----१०-१२२।
आलस सौं कर कौर उठावत, नैननि नींद झपकि रही भारी-१०-२२८।
ताहिन मेरै और कोउ, बलि चरन-कमल बिनु ठाउँ। हौं असौच, अकृत (अक्रित) अपराधी; सन्मुख होत लजाउँ = १-१२८।
ताटक तिलक सुदेस झलकत खचित चूनी लाल। अकृत बिकुल बदन प्रहसित कमल नैन बिसाल---२२९०।
बदन प्रसन्न-कमल सन मुख ह्न देखत हौं हरि जैसैं। बिमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौं तौ तैसैं।
[सं. एक + हिं. ल (प्रत्य.) = अकेला]
बिना संगी-साथी का, अकेला, एकाकी।
(क) भारत, जुद्ध बितत जब भयौ। दुर जोधन अ के ल रहि गयौ१-२८९।
(ख) बैठी आजु रही अकेल। आइगो तब लौं बिहारी रसिक रुच बरबेल-सा. १०१।
[सं. एक + हिं. ली (प्रत्य.)]
जिसके साथ कोई न हो, एकाकी।
(क) अहो बंधु, काहूँ अवलोकी इहिं मग बधू अकेली-९-६४।
(ख) आजु अकेली कुंज भवन में बैठी बाल बिसूरतसा. ३।
(ग) कुं न भवन ते आज राधिका अलस अकेली आवत-सा. १३।
[सं. एक + हिं. ली (प्रत्य.)]
दूध अकेली धौरी को यह तन कौं अति हितकारि-४९६।
[सं. एक + हिं. ला (प्रत्य.) = अकेला]
जिसके साथ कोई न हो, बिना साथी का।
संग लगाइ बीचहीं छाड्यौ, निपट अनाथ अकेलौ-११७५।
उठीं गाइ गाने लगीं, गाना शुरू किया।
उठी सखी सब मंगल गाइ-१०-१४।
उठी रोहिनी परम अनंदित हार-रतन लैं आई---१०.१८।
सुनत यह उठे जोधा रिसाई-९.१३५।
उरज अनूप उठे चारों दिससिवसुत बाहन साद--सा ० ३७।
ऊँचा होता है, ऊँचाई तक जाता है।
सूर सरद-ससि-बदन दिखाऐं, उठै | लहर जननिधि की-१-२ १३।
बाम भुजा गिरि लिए उठैया-१०५९।
उठौ नंदलाल भयौ भिनसार जगावत नंद की रानी-१०-२०८।
हरि नाम हरिनाकुस बिसारयौ,उठ्यौ बरि बरि बरि। प्रहलाद-हित जिहि असुर म रयौ, ताहि डरि डरि डरि-१-३०६।
[सं. उड्ड + गण (प्रत्य.)]
उड़त उड़त सुक पहुँच्यौ तहाँ-१-२२६।
कछुक अंग तैं उड़त पीतपट, उन्नत बाहु बिसाल-२७३।
उठाती है, हाथ में लेती है।
जल-ब सन कर लेै जु उठावति, याही मैं तू तन धरि आवै-१०-१९१।
सहसा आरंभ करती है, अचानक उभाड़ती या छेड़ती है।
अब समुझी मैं बात सबन की झूठे ही। यह बात उठावति–११५०।
ऐसैं नहिं रीझौं मैं तुम सौं तटहीं बाहँ उठावहु----७९१।
उठाकर बैठाती है, खड़ा करती है।
ह्याँ नागिनि | सौं कहत कान्ह, अहि कयौं न जगावै। बालक बालक करति कहा, पति कयौं न उठावै – ५८९।
उठि धावै :- दौड़ पड़ता है। उ.- लच्छागृह तैं काढ़ि कैं पांडव गृह ल्यावै। जैसेैं मैया बच्छ कैं सुमिरत उठि धावै---१-४।
उठिऐ स्याम, कलेऊ कीजे-१०-२११।
धनुष देखि खंजन बिवि-डरपत उड़ि न सकत उठिबे अकुलावत-२३४६।
सूर पतित तबहीं उठिहै, प्रभु, जब हँसि दैहौ बीरा-१-१३४।
हवा में गर्द आदि उड़ती है।
(क) नितप्रति अलि जिमि गुंज मनोहर उड़त जु प्रेम-पराग-२-१२।
(ल) हरि जू की आरती बनी।….। उड़त फूल उड़ग न नभ अन्तर, अंजन घटा धनी---२-२८।
बाल-अबस्था मैं तुम धाइ। उड़ति भँमारी पकरी जाइ-३-५।
जनु रवि गत सकुचित कमल जुग, निसि अलि उड़न न पावै–१०-६५।
पक्षियों का आकाश में इधर-उधर जाना।
हवा में तितर-बितर हो जाना।
प्रगटयौ | भानु मंद भयौ उड़पति फूले तरुन तमाल-१०-२०६।
हवा में निराधार उड़ती है।
(क) सरवर नीर भरे, भरि उमड़ेै,सूखे खेह उड़ाइ-१ २६५।
(ख) हरि हरि कहत पाप पुनि ज इ। पवन लागि ज्यों रूह उड़ाइ--१२. ३।
जाता रहना, दूर होना, नष्ट होना।
ऊधो हरि बिनु ब्रजरिपु बहुरि जिये। उर ऊँचे उसाँस तृनादर्त तिहिं सुख सकल उड़ाइ दिए–३ ०७३।
तुरत गए नन्द-सदन कन्हाई। अंकम दै राधा नहिं मा्नै। मन प्रतीति नहिं आवई, उड़िबो ही जानैं ९-४२।
चलि सखि, तिहिं सरोवर जाहिं।......। देखि नीर जु छिलछिलो जग समुझि क छु मन माहिं। सूर क्यौं नहिं चलै उड़ि तहँ, बहुरि उड़िबौ नाहिं—१-३३८।
उढ़कर, उड़ी उड़ी,उड़ती हुई।
उड़िये उड़ी फिरति नैनन सँग फर फूटै ज्यौं आक रूई-१४३३।
(सं. उद्धारण = निकालना अथवा उदीरण = फैंकन]
एक पात्र का तरल पदार्थ दूसरे में डालना।
(सं. उद्धारण = निकालना अथवा उदीरण = फैंकन]
या देही को गरब न करिये, स्यार-काग गिध खैहैं। तीननि में तन कृमि, के बिष्टा, कै ह्वै खाक उड़ैहैं--१-८६।
[हिं. उड़ना + औहाँ (प्रत्य.)]
पौढ़ स्याम अकेले आँगन, लेत उड़यौ अकाश चढ़ायौ-१०-७७।
ओढ़ने की वस्तु ओढ़नी, उपरेनी, फरिया।
पीत उढ़नियाँ कहां बिमारी। यह तो लाल ढिगनि की औरै, है काहू की सारी-६९३।
विवाहिता स्त्री का अन्य पुरुष के साथ निकल जाना।
कपड़ा ढकूँ, आच्छादित करूँ।
वे मारे सिर पटिया पारे कथा काहि उढ़ाऊँ-६४६६।
ढक दिया, कपड़े से ढक दिये गये।
उपमा एक अभूत भई तब-जब जननी पट पीत उढ़ाए-१०-१०१।
(क) अतिहिं उतंग बयारि न लागत, क्यौं टूटे तरू भारी-६८८।
(ख) लेहौं दान अंग अंगन को। गोरे भाल लाल सेंदु' छबि मुक्ता बर सिर सुभग मंग को। नक बेसरि खुटिला तरिवन को गरह मेल कुच युग उतंग को---१०४२।
[हिं. उतंग + नि (प्रत्य.)]
अति मंद गलित ताल फल ते गुरु इनि जुग उरज उतंगनि को----१०३२।
[स, उन्नत या उत्तत्त = ऊँचा]
सुनत द्वारवती मारु उतसों भयो सूर जन मगलाचार गए-१० उ. २१।
पचि हारे मैं मनायो न मानौं प्रापुन चरन छुए इरि हाथ। तव रिसि धरि सोई उत मुख करि झुकि झाँक्यौ उपरैना माथ-२७३६।
उत्सुक, उत्कंठायुक्त, चावयुक्त।
स्रवन सुनन उत्कंठ रहत है, जब बालत तुतरात री--१०-१३६।
[हिं. (१) उत + का (२) उत्स]
[हिं. (१) उत + का (२) उत्स]
( श्लेषसे दूसरा अर्थ उत्का = ) उत्कंठित नायिका के पास।
हौं कहत न जाउ उतका नद नंदन बेग,। सूर कर आछेप राषी आजु के दिन नेग-सा ३४।
[हिं. उस +तन (प्रत्य.े.सं. तावान' से )]
(क) तुम हीं करत त्रिगुन बिस्तार। उतपति, थिति, पुनि करत सँहार----७-२।
(ख) उतपति प्रलय करत है येई, शेष सहस-मुख सुजस बखाने---३८०।
(क) लालन कर उतपल के कारन साँझ समै चित लावै---सा ७९।
(ख) जोर उतपल आदि उर तें निकस आयो कान---सा, ७७।
दूम गहि उतपाटि लिए, दै दै किलकारी। दानव बिन प्रान भए, देखि चरित भारी-९-९५।
(क)लोक-लाज सब छुटि गई, उठि धाए संग लागे (हो)। सुनि याके उतपात कौं सुक सनकादिक भ गे (हो)-४४
(ख) नदुकुल में दोउ संत सबै कहैं तिनके ए उतपात-३३५ १।
(ग) तुम बिन इहाँ कुँवर वर मेरे होते जिते उतपात --२७०३
[सं. उत्पन्न, हिं. उतपानना]
ऊत्पन्न या पँदा किये, उपजाथे।
तासौं मिलि नृप बहु सुख माने। अष्ट पुत्र तासौं उतपाने-९-२।
(क) बुझ ग्वालि निज गृह मैं आयौ, नैंकु न सका मानि। सूर स्याम यह उतर बनायौ, चींटी काढ़त पानि--१०-२८०।
(ख) ठढ़ो थक्यो उतर नहिं आवै लोचन जल न समात-२६५७।
सूरदास-ब्रत यहै कृष्ण भजि, भव-जल नि ध उतरत---१-५५।
कोट के भीतर काकोट, अंतदुर्ग।
रही दे घूँघट पट की ओट। मनो कियौ फिरि मान मवासो मनमथ बिकटे कोट। नहसुत कील कपाट सुलच्छन दै दृग द्वार अकोट। भीतर भाग कृष्ण भूपति को राषि अधर मधु मोट-सा. उ.१६
[सं. अंकपालि या अंकमाल, हिं.अँकवार अँकोर]
(क) फूले फिरत दिखावत औरन निडर भए दै हँमनि अकोर-२१३१।
(ख) गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन दै गए हँसनि अकोर-३१५३
[सं. अंकपालि या अंकमाल, हिं.अँकवार अँकोर]
[स. अंकपा लि, अकमाल, हि, अँक वार]
यहि ते जो नेकु लुबुधियौरी। गहत सोइ जो समात अकोरी-३३४५।
निकम्मा, बेकाम, कर्महन, मंद।
हौं अमौव, अक्रिन, अपराधी, सन मुख होत लजाउँ। तुम कृपाल, करुनानिधि, के सव, अधम उधारन-नाउ-१-१२८।
एकः यादव जो श्रीकृष्ण का चाचा लगता था। यह श्वफल्क और गाँदिनी का पुत्र था। कंस की आज्ञा से श्रीकृष्ण बलराम को यही मथुरा बुला ले गया।
प्रयाग और गया में बरगद का एक वृक्ष जो प्रलय में भी नष्ट न होने के कारण ‘अक्षय' कहलाता है।
अक्षय बृक्ष बट बढ़नु निरंतर वहा ब्रज गोकुल गाइ-९४५।
अवनति करता हुआ, घटता हुआ।
मोतैं कछू न उबरी हरि जू, आयौं चढ़त-उतरतौं। अजहुँ सूर पतित-पद. तरतौ, जौं औरहु निस्तरतौ--१-२०३।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण]
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण]
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण]
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण]
मनो विकार की उग्रता शांत होना।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण]
नदी, पुल आदि को पार करना।
(क) दई न जात खेवट उतराई, चाहत चढ़यौ जहाज-१-१०८।
(ख) लै भैया केवट उतराई। महाराज रघुपति इत ठाढ़े तैं कत नाव दुराई--१०-४०।
ऊपर से नीचे आने की क्रिया।
हेरि मथानी धरी माट तैं, माखन हो उतारत। आपुन गई कमोरी माँगन, हरि पाई ह्यां घात-१०-२७०
करत फन-घात, बिष जात उतरत अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै-५५२।
पाने की सतह पर तैरने लगी, उतराने लगी।
या ब्रज कौ बसिबो हम छोड्यौ, सो अपने जिय जानी। सूरदास ऊसर की बरषा, थोरे जल उतरानी-१०.३३७।
बहका बहका या इधर-उधर मारा मारा फिरने वाल।
नदी आदि के पार हुआ तर गया, तारा गया।
ऐपौ को जु न सरन गहे तेैं कहत सूर उतरायौ---१-१५।
[सं. उत्तरण, हिं. उतराना]
साथ साथ घुमावे-फिरावे, चलावे।
ताको लिए नन्द की रानी, नाना खेल खिलावै। तब जसुमति कर टेकि स्याम को, क्रम क्रम करि उतरावै--१०-१२६।
[सं. उत्तर + हा (प्रत्य.)]
[सं. उत्तरण , हिं. उतरना]
(नदी आदि के) पार जाओ, पार कर लो।
(क)भव-उदधि जम-लोक दरसै, निपट ही अँधियार। सुर हरि कौ भजन करि करि उतरि पल्ले-पार--१-८८
(ख) सकल विषय-विकार तजि, तू उतरि सायर-सेत--१-३११।
[सं. अवतरण, प्रा. उतरण, हिं. उतरना]
उग्र प्रभाव या उद्वेग दूर हुआ।
उतरि गई तब गर्व खुमारी-१० ६६।
[सं. अवतरण, प्रा. उतरण, हिं. उतरना]
(क) रथतैं उतरि अवनि आतुर ह्वै चले चरन अति धाए---१-२७३।
(ख) नाभि-सोज प्रकट पदमासन उतरि नाल पछितावै-१०.६५।
[सं. अवतरण, प्रा. उतरण, हिं. उतरना]
(क) सबनि सनेहौं छांड़ि दयौ। हा जदुनाथ ! जरा तन ग्रस्यौ, प्रति भौ उतरि गयौ-१-२९८।
(ख) आवत देखे स्याम हरष कीन्हो ब्रजबसी। सोकसिंधु गयौ उतरि, सिंधु आनंद प्रकासी-५८९।
को कौरव-दल-सिंधु मंथन करि या दुख पार उतरिहै--१-२९।
( नदी, नाले अदिं के) पार गये।
कहोै कपि, कैसेैं उतरे पार-९-८९।
डेरा या पड़ाव डाला, टिके, ठहरे।
कटक-सोर अति घोर दसौं दिसि. दीसति बनचर भीर। सूर समुझि, रघुबंस-तिलक दोउ उतरे सागर-तीर-९-११५।
उतरा, (नदी आदि के)पार गया।
भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ।…...। अति गंभीर, तीर नहिं नियरैं, किंहिं बिधि उतरयौ जात। नहिं अधार नाम अवलोकत, जित तित गोता खात-१-१७५।
[सं. अवतरण, प्रा उत्तरण, हिं. उतरना]
अजहुँ सावधान किन होहि। माया विषम भुजगिनि को विष, उतरयौ नाहिंन तोहिं---२-३२।
तीव्र इच्छा, प्रबल अभिलाषा।
सरद सुहाई आई राति। दुहुँ दिस फूल रही बन जाति।…..। एक दुहावत तें उठि चली। एक सिराबत मन महँ मिली। उतसह कंठा हरि सौं बढ़ी-१८७३।
दधिसुत-अरि-भष-सुत सुभाव चल तहाँ उताइल आई---सा० ८७।
करत कहा पिय अति उताइली मैं कहुँ जात परानी-१६०१।
एक राजा जो स्वयंभुव मनु के पुत्र और ध्रुव के पिता थे।
[सं. उत् + त्वरा, हिं. उतावली)
प्रभुजू हौं तौ महा अधर्मी। अपत, उतार, अभागौ, कामी, विषयी, निपट कुकुर्मी-१-१८६।
हान लगीं सब बसन उतार---९-१७४।
(धारण की हुई वस्तु को ) अलग करते हैं, खोलते हैं।
उतारत है कंठनि तैं हार। हरि द्वित मिलन होत है अतर, यह मन कियौ बिचार---६८७।
उतार रहा है, स्वयं अपना रहा हैं। दूसरे को घटाना चाहता है।
मानिन अजहूँ छाँड़ो मान। तीन बिवि दधि सुत उतारत राम दल जुत सान-सा २१।
ग्रह मुनि दुत हित के हित कर ते मुकर उतारत नाघे----सा. ६।
उतारती है, शरीर के चारों ओर घुमाती है।
खेलत मैं कोउ दीठि लगाई-लै-लै राई लौन उतारति .. १०-२००।
धरण की हुई वस्तु को खोलती या अलग करती है।
अरु बनमाल उतारति गर तै सुर स्याम की मातु--५११।
( किती उग्र प्रभाव को ) दूर करने के लिए,(किसी भार को हल्का करने के उद्देश्य से।
(क) रथ तैं उतरि अवनि आतुर ह्वै चले चरन अति धाए। मनुसंचित भू-भार उतारन, चपल भए अकुलाए = १-२७२।
(ख) आजु दशरथ कैं आँगन भीर। ये भू-भर उतारन कारन प्रकटे स्याम सरीर-९-१६।
धारण की हुई वस्तु को खोलना।
वस्तु या पदार्थ तैयार करना।
ठहरने या डेरा ड'लने की क्रिया।
क्लेश या ग्रह-शांति के लिए कुछ सामग्री व्यक्ति विशेष के चारो ओर घुमा कर चौराहे पर रखना।
[स. उत्तारण, हिं. उतारना]
(नदी आदि के) पार करके, पार पहुँचाकर, पार करो।
लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज। नई न करन कहत प्रमु, तुम हौ सदा गरीब-निवाज---१-१०८।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण, हिं. उतारना]
धारण की या पहनी हुई वस्तु को खोलकर।
( क) बिदुर सस्त्र तब सबहिं उतारि। चल्यौ तीरथनि मुंड उघारि--१-२८४।
(ख) इक अभरन ले हि उतारि देत न संक करैं-१०-२४।
(ग) ईस जनु रजनीस राख्यौ. भाल तैं जु उतारि १०---१६९।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण, हिं. उतारना]
जुडी या लगी हुई वस्तु को काट कर, अलग करके।
अस्वत्थामा निसि तहँ आए। द्रोपदी-सुत तहँ सोवत पाए। उनके सिर ले गयौ उतारि। कह्यो, पांड नि आयौ मारि--१-२८९।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण, हिं. उतारना]
उठायीं हई वस्तु को पृथ्वी पर रखना।
सूर प्रभु कर ते गुबर्धन धरयौ धरनि उतारि-९९४।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण, हिं. उतारना]
कबहुँ अँग भूषन बनावति, राइ-लोन उतारि-१०-११८।
[सं. अवतरण, प्रा. उत्तरण, हिं. उतारना]
ऊपर रखी वस्तु को नीचे रखना।
(क) उफनत दूध न धरयौ उतारि-१८०३।
(ख) एक उफनत ही चलीं उठि धन्यौ नाहिं उतारि-पृ.३३९ (४)।
(पहने हुए वस्त्र आदि ) खोलकर।
(क) बसन धरे जल-नीर उतारी। आपुन जल पैंठी सुकुमारी----१०-७९९।
(ख) उरते सखी दूर कर हारहिं ककन धरहु उतारी--२७८२।
आरोही को किसी यान से नोचे पृथ्वी पर उतार कर, व्हरा कर डेर। देकर।
निर खति ऊधो सुख पायौ। सुन्दर सुजल सुबंस देखियत याते स्याम पठायौ। .......। महर लिवाय गये निज मंदिर हरषित लियौ उतारी---२९६३।
सिर पर उठाए हुए भारकोनीचे रखकर।
(क) योग मोट,सिर बोझ आनि तुम कत धौं घोष उतारी.-३३ १६।
(ख) लादि खेप गुन ज्ञान योग की ब्रज मैं आनि उतारी-३३४०।
निर्विष होत नहिं कँसेहूँ बहुत गुनी उचि हारे। सुर स्याम गारुड़ी बिना को, जो सिर गढ़ उतारे---७४७।
उग्र प्रभाव या उद्वेग को दूर करे।
आनहुँ बेगि गारुरी गोबिंदहिं जो यहि बिषहिं उतारे-३२५४।
(पहने हुए वस्त्रादि) खोले।
इत-उत चितवति लोग निहारैं। कह्यौ सबनि अब चीर उतारैं-७९९।
[सं. उत्तारण, हिं. उतारन]
(नदी आदि के) पार पहुँचना।
भवसमुद्र हरि-पदनौका बिनु कोउ न उतारै पार-१-६८।
उतारा करे, नजर आदि उतारे।
जाको नाम कोटिभ्रम टारै। तापर राई-लौन उतारै–१०-१२९।
[सं. उत्तारण, हिं. उतारना]
(नदी नाले आदि को पार ले जाऊँ, पार पहुँचा दूँ। )
(क) सोखि समुद्र, उतारौं कपि-दल, छिनक बिलंब न लाऊँ-९-१०९।
(ख) आज्ञा होइ, एक छिन भीतर, जल इक दिसि करि डारोैं। अन्तर मारग होइ, सबनि कौं इहिं बिधि पार उतारौं--९.१२१।
जुड़ी हुई वस्तु को सफाई के साथ काटूँ, काटकर अलग करूँ।
तबै सूर संधान सकल हौं, रिपु कौ सीस उतारौं–९-१३७।
असुर कुलहिं संहारि, धरनि कौं भार उतारौं-४३१।
उतारा, उतरने योग्य स्थान, पड़ाव।
(क) जल औड़े में चहुँ दिसि पैरयौ, पाँउ कुल्हारी मारौ। बाँधी मोट पसारि त्रिबिध गुन, नहिं कहुँ बीच उतारी। देख्यौ सूर बिचारि सीस परी, तब तुम सरन पुकारोै-१-१५२।
(ख) ममता-घटा, मोह की बूँदैं, सरिता मैन अपारौ। बूड़त कत हुँ थाह नहिं पावत, गुरुजन-ओट अधारौ। गरजत क्रोध-लोभ कौ नारौ, सूझत कहूँ न उतारौ १-२०९।
(नदी-नाले आदि के) पार ले गया।
नारद जू तुम कियौ उपकार। बुड़त मोहिं उतारचौ पार---४-१२।
उठाया हुआ भार पृथ्वी पर रखा।
हरि करते गिरिराज उतारचौ-१०७०।
भले कान्ह हो बिषहिं उतारयौ। नाम गारुड़ी प्रगट तिहारो-७६२।
(क) सो राजा जो आगमन पहुँचे सूर सु भवन उताल। जौ जैहैं बलदेव पहिलैं ही, तौ हँसि हैं सब ग्वाल---१०-२२३।
(ख) कहै न जाइ उताल जहाँ भूपाल तिहारौ। हौं बृंदाबन चद्र कहा कोउ करै हमारौ-१११२।
कोउ गावत, कोउ बेनु बजावत, कोऊ उतावल धावत। हरि दर्सन लालसा कारनै बिबिध मुदित सब आवत---१० उ०-११२।
जिसका क्षय न हो, कभी न चुकनेवाला।
हरि-पद-सरन अक्षै फल पावै–१९२४।
समूचा पूरा, जो खंडित न हो।
जिसका क्रम, सिलसिला या धार न टूटे, अटूट।
सलिल अखंड धार धर टूटत कियौ। इंद्र मन सादर। मेघ परस्पर यहै कहत हैं धोइ के रहु गिरि खादर-९४८।
(क) सर्वोपरि आनंद अखंडित सूरपरम लपिटानी-१-८७।
(ख) बे हरि सकल ठौर के वासी। पूरने ब्रह्म अखंडित मंडित पंडित मुनि न बिलासी।
उतांवला, जल्दी मचाने वाला।
[सं. उद् + त्वर, हिं. उतावली]
अँधियारी आई तहँ भारी। दनुज-सुता तिहि तैं न निहारी। बसन सुक्रतनया के लीन्हे। करत उनावलि परे न चीन्हे--१-१७३।
प्रातहिं धेनु दुहावन आई, अहिर तहाँ नहिं पाई। तबहिं गई मैं ब्रज उतावली, आई ग्वाल बुलाई-७२८।
शीघ्रता से, बहुत जल्दी से।
वह नायिका जो मिलन के स्थान पर प्रिय के न आने से चिंतित हो।
नृतकार उतिम बनाइ बानिक संग चंद न अर्व---सा ० ९१।
उपकार का बदला चुका देने वाला।
[हिं. उस + त (प्रत्य.) = उत]
उतै देखि धावेै, अचरज पावेै, सूर सुरलोक-ब्रजलोक एक ह्वै रहयो-४८४।
पूर्णता या उत्तमता की ओर क्रमशः बढ़ने की प्रवृत्ति।
ध्रुव का सौतेला भाई जो राजा उतानपाद की छोटी रानी सुरुचि से उत्पन्न हुआ था।
प्रश्न के समाधान में कही गयी बात।
उत्तर देने वाला, जिम्मेदार।
राजा विराट की पुत्री जो अभिमन्यु को ब्याही थी। महाभारत के युद्ध में जब अभिमन्यु मारा गया था तब यह गर्भवती थी। इसी के गर्भ से आगे चल कर परीक्षित उत्पन्न हुए थे।
हिमालय के समीप का प्रदेश।
किसी के मरने के बाद धन-संपत्ति का अधिकार।
वह व्यक्ति जो किसी के मरने के बाद उसकी संपत्ति का अधिकारी हो।
मकर रेखा से उत्तर कर्क रेखा की ओर सूर्य की गति।
छह महीने का समय जब सूर्य मकर रेखा से कर्क रेखा तक बढ़ता रहता है।
उपरना, दुपट्टी, ओढ़ने की चादर।
एक के बाद एक, लगातार, क्रमशः।
एक राजा जो स्वायंभुवमनु के पुत्र और प्रसिद्ध भक्त ध्रुव के पिता थे।
[सं. अ = नही + हिं. खर्ब = छोटा]
जो छोटा न हो, बड़ा, लंबा।
खाद .अखाद न छाँडै अब लौं, सब मैं साधु कहावै---१-१८६।
[सं. अक्षवाट, प्रा. अक्ख आडोहिं. अखाड़ा]
तहाँ देखि अप्सरा-अखारा। नृपति बछू नहि बेचन उचार-९-४।
(क)तुम सर्वज्ञ, सबै विधि पूरन, अखिल भुवन निज नाथ १-१०३।
(ख) तुन हर्त्ता तुम कर्त्ता एकै तुम हौ अखिल भुवन के साँई-२५५८।
तुमहीं ब्रह्म अखिल अबिनासी भक्तन सदा सहय।
[सं. अक्षीण, प्रा. अक्खीण.]
[सं. अ = नहीं + खुटना = समाप्त होना]
अखुटित रहत सभीत ससंकित सुकृत सब्द नहिं पावै--१:४८।
[सं. अ = नही + खंडन = तोड़ना, खंडित करन]
नैना अतिही लोभ भरे।::::::::। लूटत रूप अखट दाम को स्याम बस्य भो मोर। बड़े भाग मानी गह जानी इनते कृपिन न और--१८३३।
[सं. उत्थापन, हिं. उत्थावना]
आरम्भ करना, अनुष्ठान करना।
उकसाने वाला, उभाड़ने वाला,
मनोवेगों को तीव्र करने वाला।
मनोवेगों को तीव्र करने वाला।
उपद्रव करने वाला, उपद्रवी।
उपद्रवी, अशांति फैलाने वाला व्यक्ति।
अशांतिकारिणी, हलचल मचाने वाली।
दुख देना, पीड़ा पहुँचाना।
एक अर्थालंकार जिसमें उपमान को भिन्न समझते हुए भी उपमेय में उसकी प्रतीति की जाय।
एक संचारी भव, किसी कार्य के करने में, दूसरे की राह न देखकर, स्वयं तत्पर हो जाना।
[सं. उद् = ऊपर + क = उदक]
भड़काना, उत्तेजित करना, प्रज्वलित करना।
उत्तेजित की, प्रज्वलित की।
प्रगट होता हैं, उदय होता है।
अदभुत्व वस्तु होना या घटना।
अँखियनि तैं मुरली अति प्यारी वह बैरिनि यह सौति। सूर परस्पर कहत गोपिका यह उपजी उदभौति--पृ.३२८।
उदमद यौवन आनि ठाढ़ि केै कैसे रोको जाइ-३ ११३।
गोपन के उदमाद फिरत उदमदे कन्हाई
उन्माद, मतवालापन, पागलपन।
सरदकाल रितु जानि दीपमालिका बनाई। गोपन के उदराद फिरत उदमदे कन्हाई।
मेरो हरि कहँ दसहिं बरस को तुम ही यौवन मद उदमादौ--१०५७।
अग्नि कबहुँक बरखि बारि बरषा करै प्रद्युम्न सकल माया निवारी। शाल्व परधान उदमान मारी गदा प्रद्युम्न मुरछित भए सुधि बिसारी १० उ०-५६।
(माई) बिहरत गोपाल राइ मनि मन रचे अँगनाइ लरकत पररिंगनाइ, घुटरूनि डोलै-१०-१०१।
अंग का भंग या खंडित होना।
मोहित करने की स्त्रियों की क्रिया। अंगों को मोड़ना, मरोड़ना।
शरीर में लगाने का सुगन्धित लेप।
महावर आदि स्त्रियों के लेप।
जब अखेट पर इच्छा होइ। त ब रथ साजि चलै पुनि सोइ-४-१२।
(क) सब दिन याहो भाँति बिहाइ। दिन भए, बहुरि अखेटक जाइ----४-१२।
(ख) इक दिन ताते अनुज सौं मागी लै गयौ अखेटक राजा--१० उ--२६।
[सं. अ = नहीं + के लि = खेल]
[सं. अ = नहीं + के लि = खेल]
[सं. अ = नहीं + हिं. खोलना]
रसना जुगल र सनिधि. बोलि। कनकबेलि तमाल अरुझी सुभ ज बंध अखोलि सा. उ.--५।
अग जग जीव जल थल गनत सुनत न सुधि लहौं---१० उ.--२४।
दिन पति चले धौं कहा जात। धरा धरन धरनिसुत न लीनो कहो उदधि सुत बात...सा ० ८।
[सं. उद्वासन = स्थान से हटाना]
[सं. उद्वासन = स्थान से हटाना]
स्थान से निकाला हुआ, एक स्थान पर न रहने वाला।
अब तो बात घरी पहरन सखि ज्यों उदबस की भी त्यो। सूरस्याम दासी सुख सोलहु भयो उभय मन चीत्यौ-२८८४।
[सं. उदधि (= समुद्र) + तनया = पुत्री = शुक्ति = सीप) + पति (शुक्तिपति = मेघ = नीरद = जीवनद)]
बेगि मिलौ सूर के स्वामी उदधितनया-पति मिलिहै आईसा० उ० ३ ०।
मेरो हरि कहँ दसहिं बरस को तुमही जोबन मद उनमानी (उदमादी)-१० ५७।
उदय कीनो- प्रकट किया, प्रकाशित किया।
तिलक भाल पर परम रुचिर गोरौचन की दीनो। मानो तीन लोक की सोभा अधिक उदध सो कीनो।
उदय अरु अस्त लौं- सारे संसार में, सारी पृथ्वी पर। उ.- हिरनकस्यप बढ्यो उदय अरु अस्त लौं. हठी प्रह्लाद चित चरन लायौ। भीर के परे तैं घीर राबहिनि तजी, खंभ तैं प्रगट ह्वै जन छुड़ायो-१-५।
उदयाचल जिसके पीछे से सूर्य निकलता है।
उदयाचल जिसके पीछे से सूर्य निकलता हैं।
पूर्व दिशा का एक पर्वत जिसके पीछे से सूर्य निकलता दिखायी देता है।
[सं. उदसन = नष्ट करना। अथवा उद्वासन]
[सं. उदसन = नष्ट करना। अथवा उद्वासन]
एक अलंकार जिसमें संभावित वैभव ऐश्वर्य या समृद्धि का बहुत बढ़ाचढ़ाकर वर्णन हो।
यह उदात अनूप भूषन दियो सब घर तोर। सूर सब रे लच्छनन जुत सहित सब त्रिन तोर-सा-९४।
उदर जियाऊँ :- पेट पालूँ, पेट भरूँ, खाऊँ। माँगत बार-बार सेष ग्वालन को पाऊँ। आप लियौ कछु जानि भक्ष करिं उदर जियाऊँ। उदर भरै-पेट पाले। भिक्षा-वृत्ति उदर नित भरै निसि दिन हरि हरि सुमिरन करे।
किसी वस्तु के बीच का भाग।
निकलते या प्रकट होते ही (या होकर)।
मेरौ हरन मरन है तेरौ, स्यौं कुटुम्ब-संतान। जरिहै लक कनकपुर तेरौ, उदवत रघुकुल-भान-९-७९।
प्राणवायु का एक भेद जिसकी गति हृदय से कंठ और सिर के भ्रमध्य तक है।
उड़े-उड़े, मारे मारे अस्थिर।
अब मेरी को बोलेै साखि। कैसे हरि के संग सिधारे अब लौं यह तन राखि। प्रान उदान फिरत ब्रज बीथिनि अवलोकनि अभिलाषि--२८४७।
धावत कनक-मृग के पाखैं, राजिव-लोचन परम उदारी---९-१९८।
उच्च विचारवाला विशाल हृदय, महात्मा।
तोड़ फोड़ दूँ, छिन्नभिन्न कर दूँ, नष्ट कर डालूँ
जो तुम आज्ञा तेहु कृपानिधि तो एहि पुर सहारौं। कहहु तो लंक उदारौं (बिदारौं )---९-१०७।
( क ) हरि अमृत लैं गए अकास। असुर देखि यह भए उदास---७-७।
(ख) रामचन्द्र अवतार कहत है सुनि नारद मुनि पास। प्रगट भयो निसचर मारन को सुनि यह भयो उदास
जिसका चित हट गया हो, बिरक्त।
(क) राजिव रवि को दोष न मानत, ससि सो सहज उदास---३२१९।
(ख) ऐसे रहत उतहिं को आतुर मोसों रहत उदास। सूर ध्याम के मन क्रम बच भए रीझे रूप प्रकास--प.--३३४।
जो किसी से सम्बन्ध न रखे, तटस्थ, निरपेक्ष।
मैं उदास सबसों रहौं इह मम सहज सुधाइ। ऐसोजानै मोहि जो मम माया न रचाइ-१० उ.-४७
उदार-उदधि-बहुत दयालु, महानदानी।
प्रभु ओ देख एक सुभाइ। अति-गंभीर-उदारउदधि हरि जान-सिरोमनि राइ-१-८।
उच्च आचार विचार रखनेवाला।
जिसका चित्त हट गया हो, विरक्त।
नि:कबन जिनमें मम बासा। नारि संग मै रहौं उदासा--१० उ० ३२।
अरुणोदय उठि प्रात हो अक्रूर बोलाए।…..। सोवत जाइ जगाइ के चलिए नृप पासा। उहै मंत्र मन जानि के उठि चले उदासा-----२४७६।
दुख का प्रसंग, दुख की बात।
मन ही मन अक्रूर सोच भारी …..। कुबलिया मल्ल मुष्टिक चाणूर से कियो मैं कर्म यह अति उदासा २५५१।
[सं. उदास + हिं. इल (प्रत्य.)]
[सं. उदास + हिं. ई (प्रत्य.)]
विरक्त या त्यागी पुरुष, संन्यासी।
जोग, ज्ञान ध्यान, अवराधन साधन मुक्ति उदासी। नाम प्रकार कहा रुचि मानहि जो गोपाल उपासी-१०९।
बिनु दसरथ सब चले तुरत ही कोसलपुर के बासी। आए रामचन्द्र मुख देख्यौ सबकी मिटी उदासी।
दुखी, विरक्त, त्यागी. उदास।
(क) ब्रज बासी सब भए उदासी को संताप हरै--३०४७
( ख ) किहि अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भक्ति ते करत उदासी। सूरदास तो कौन बिरहिनी माँगे मुक्ति छाँडे गुनरासी---३ १५।
वह मुग्धा नायिका जिसमें बचपन का भोलापन शेष हो।
उत्तर दिग। अथवा प्रदेश का रहने वाला।
उत्तेजित करने की क्रिया, जगाना।
उदय, निकलना या प्रकट होना।
डुलै सुमेरु सेष सिर को पश्चिम उदै करै बास पति। सुनि त्रिजट, तौहूँ नहिं छाडौं मधुर मूर्ति रंघुनाथ-गात रति-९-८२।
मृत्यु के पीछे की बुरी दशा, मोक्ष की अप्राप्ति, नरक।
(क) सूरदास हरि भजौ गर्ब तजि, बिमुख अगति कौं जाहीं-२-२३।
(ख) कहौ तौ लंक उखारि डारि देउँ, जहाँ पिता संपति कौ। कहौ तौ मारि सँहारि निसाचर, राबन करौं अगति कौ--९-८४।
[सं. अगती + नि ( हिं. प्रत्य.)]
पापी मनुष्य, कुमार्गी व्यक्ति, वे जो मोक्ष के अधिकारी न हों।
जय जय जय जय माधबवेन। जग हित प्रगट करी करुनामय, अगनिति के गति दैनी----९-११।
अनगिनती, असंख्य, अनेक, बहुत।
(क) बंदौ चरने.सरोज तिहारे।•••••••। जे पद-पदुम रमत बृंदाबन अहि. सिर धरि अगनित रिपु मारे--१-९४।
(ख) अगनित गुन हरिनाम तिहारै-१-१५७।
सूरदास प्रभु-अगनित महिमा, भगतनिकै मन भावत--१-१२५।
[सं. अ = नहीं + हिं. गिन ना]
जेंवत स्याम नंद की कनियाँ-... ! बरी, बरा, बेसन बहु भाँतिन, ब्यंजन बिबिध,अगनियाँ-१०-२३८।
सूर सुनत सुरपती उदासी। देखहुए आए जलरासी-१०६१।
जिसका चित्त किसी वस्तु या व्यक्ति से हट गया हो, विरक्त।
जो किसी के झगड़े में न पड़े, निष्पक्ष तटस्थ।
(क) धर अंबर, दिन-विदिसि, बढ़े अति सायक किरन-समान। मानौ महाप्रलय के कारन, उदित उभय षट भान---९.१५८।
(ख) उदित चारु चन्द्रिका अवर उर अंतर अमृत मई-२८५३।
अति सुख कौसल्या उठि ध।ई। उदित बदन मन मुदिन सदन तैं, आरति साजि सुमित्रा ल्याई---९-१६९।
वृद्धि, उन्नति, बढ़ती, उदय।
(क) तुम्हरो कठिन बियोग बिषम दिनकर सम उदो करै। हरिपद बिमुख भए सुनु। सूरज को इहि ताप हरै---३ ४५८।
(ख) राकापति नहिं कियो उदो सुनि या सम ये नहिं आवत---सा ० उ० १३।
नव-तन चन्द्र रेख-मधि राजत, सुर गुरु-शुक्र-उदोत परस्पर-१०-९३।
स्थान जहाँ से नदी निकलती है।
तरल पदार्थ जो सवेग बाहर निकले।
मन की पुरानी बात जो सतेज और एकबारगी कही जाय।
वमन होने क क्रिया और वस्तु।
नंद उदौ सुनि आयौ हो, बृषभानु कौ जगा---१०-३७।
एक उपसर्ग जो शब्दों के आदि में जुड़कर इन अर्थों की विशेषता लाता है। ऊपर, जैसेउदगमन। अतिक्रपण, जैसे-उत्तीर्ण। उत्कर्ष-जै उद्बोधन-जैसे उदगार। प्रधानता--जैसे उद्देश्य। कमी, जैसे उद्वासन। प्रकाश,-जैसे उच्चारण। दोष,-जैसे उदमार्ग ( उन्मार्ग)।
प्रकट करना, प्रकाशित करना।
सूत्रधार की नाटकीय प्रस्तावना में उसकी बात का मनमाना अर्थ लगाकर नेपथ्य से कुछ कहना।
ठोकर या धक्का मारने वाला।
उतेजित करने वाला, भावों को उभाड़ने वाला।
उत्तेजित करने वाला पदार्थ या वातावरण।
रस को उत्तेजित करने वाला विभ व।
आशय, अभिप्राय, अभिप्रेत अर्थ।
वाक्य में जिसके विषय में कुछ कहा जाय, विशेष्य।
जो ऊँचा-नीचा या ऊबड़-खाबड़ हो।
उज्ज्वल, स्वच्छ, प्रकाशपूर्ण, कांतिवान।
(क) नव-मन-मुकुट-प्रभा अति उद्दित, चित्त. चकित अनुमान न पावति--१०-७।
(ख) तहँ अरि-पंथ-पिता जुग उद्दित वारिज बिबि रंग भजो आकास--सा ० उ० २८।
दिखाया या संकेत किया हुआ।
किसी पुस्तक आदि से उसका कुछ अश नकल करना।
[सं. उद्धरण + हिं. ई (प्रत्य.)]
[सं. उद्धरण + हिं. ई (प्रत्य.)]
[स. उद्धरण, हिं. उद्धार, उद्धरना]
(क) गए तरि लै नाम केते, पतित हरि-पुर-धरन। जासु पद-रज-परस गौतम--नारि-गति उद्धरन-१-३०८।
(ख) भक्तबछल कृपारन अररन-मरन पतित-उद्धरन कहै वेद गई--८-९।
(ग) देखि देखि री नंदकुल के उधारी। मातु पितु दुरित उद्धरन, ब्रज उद्धरन धरनि उद्धरन सिर मुकुट धारी-१४०३।
[सं. उद्धरण, हिं. उद्धरना]
जे पद परसि सिला उद्धरिगई, पांडव गृह फिरि आए-५६८।
[सं. उद्धरण, हिं. उद्धार]
उबरोगे, मुक्त होगे छुटकारा पाओगे।
स्रुति पढ़ि कै तुल नहिं उद्धरिहौ। विद्या बेचि जीविका करिहौ-४-५।
[सं. उद्धरण, हिं. उद्धरना]
और जो मो पर किरपा करौ। तौ सब जीवनि को उद्धरोै-७-२।
मुक्ति, छुटकारा, मरण, निस्तार दुख निवृत्ति।
(क) अब मिथ्य। तप जाप ज्ञान सब, प्रगट भई ठकुराई। सूरदास उद्धार सहज गति, चिंता सकल गँवाई-१-२०६।
(ख) धन्य भाग्य, तुम दरसन पाए। मम उद्धार करन तुम आए----१-३४१।
(ग) बाल गोप बिहाल गाई करत कोटि पुकार। राख गिरिधर लाल सूरज नाथ बिनु उद्धर-सा. ३०।
मुक्ति, छुटकारा, निवृत्ति, निस्तांर।
मुक्त करना, छुटकारा देना।
[सं. उद्धार, हिं. उद्धारना]
सखासुर मारि कै. वेद उद्धारि केै आपदा चतुरमुख की निवारी-६-१७।
[सं. उद्धार, हिं. उद्धारना]
उद्धार या मुक्त करूँगा छुटकारा दूँगा।
कस को मारिहौ, धरनि निरवारिहो, अमर उद्धाररिहौ, उरगघरनी-५५१।
[सं. उद्धार, हिं. उद्धारना]
दोउ जन्म ज्यौं हरि उद्धारे सा तौ मैं तुमसोैं उच्च रे----१०-२।
किसी पुस्तक पत्र आदि से नकल किया हुआ अंश)
जहाँ कोई जा न सके। पहुँच के बाहर।
(क) जीव जल थल जिते, बेप धरि धरि तिते, अटत दुरगम अगम अचल भारे----१-१२०।
(ख) देखत बन अति अगम डरौं वै मोहिं डरपावैं–४३७।
भक्त जमुने सुगम, अगम औरै-१.२२२।
समुझि अब निरखि जानकी मोहिं। बड़ौ भाग गुनि, अगम दसानन, सिव बर दीनौ तोहिं-९-७७।
न जानने योग्य, बुद्धि से परे, दुर्बोध।
(क) मन-बानी कौं अगमअगोचर, जो जानै सो पावै---१-२।
(ख) ब्रह्म अगोचर मन-बानी तैं, अगम अनंत प्रभाव-२.३४।
(क) अगम सिंधु जतननि सजि नौका, हठि क्रम भार भरत। सूरदास ब्रत यहै, कृष्ण-भजि, भव-जल निधि उतरत-१-५ ५।
(ख) सूर मरत मीन तुरत मिले अगम पानीं-२९५२।
(क) लंका बसत दैत्य अरु दानव उनके अगम सरीर.-.-९-८६।
(ख) कैसे बचे अगम तरु के तर मुख चूमति, यह कहि पछितावति-३९०।
दादुर मोर कोकिला बोलै पावस अगम जनावै--२८२५।
आजु हौं राजकाज करि आॐ। बेगि सँहारौं सकल घोष-सिसु, जौ मुख आयसु पाऊँ। मोहन मुर्छन-बसीकरन पढ़ि, अगमति देह बढ़ाऊँ १०-४९।
सो राजा जो अगमन पहुंचै, सूर सु भवन उताल-१०-२२३।
(क) इह ले देहु मारु सिर अपने जासों कहत कंत तुम मेरी। सूरदास सो गई अगमने सब सखियन सों हरि मुख हेरी---९०३।
(ख) पौढ़े हुते पर्यंक परम रुचि रुक्मिनि चमर डुलावति तीर। उठि अकुलाइ अगम ने ली ने मिलत नैन भरि आये नीर----१ ० उ.-६ १।
(ग) मोहन बदन बिलोकि थकित भए माई री ये लोचन मेरे। मिले जाइ अकुलाइ अगमने कहा भयौ जो घूघँट घेरे-पृ० ३३१।
उपपति से स्वयं प्रेम करने वाली परकीया नाकाि।
ज्ञान कर नेवाला सचेत करनेवाला।
उपपति की इच्छा समझ कर प्रेम करने वाली परकीया नायिका।
एक काव्यालंकार जिसमें गुप्त बात लक्षित की जाय।
(क) अति प्रचड पौरुष बल पाएँ, केहरि भूख मरै। अनायास विनु उद्यम कीन्हैं, अजगर उदय भरे---१-१०५।
(ख) साधन, जंत्र, मंत्र, उद्यम, बल, ये सब डरो खोई। जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोई-१-२६२।
मम सरूप जो सब घट जान। मगन रहै तजि उद्यम आन--३-१३।
पृथ्वी से पैदा होनेवाले प्राणी, वनस्पति।
भूमि में पैदा होने वाले प्राणी, वनस्पति।
किसी व्रत के समाप्त हो जाने पर किये जानेवाले हवन, दान आदि कायं।
(क) सूरदास प्रभु तो जीवहिं देखहिं रविहिं उद्योत--३३६०।
(ख) दामिनी थिर घनघटा बर कबहुँ ह्वै एहि भाँति। कबहु दिन उद्योत कबहूँ होत अति कुहुराति--सा० उ० ५।
चमकना या चमकाना, प्रकट या व्यक्त करना।
एक काव्यालंकार जिस में धस्तु के कई गुणों या दोषों का एक के आगे मन्द हो जाना वर्णित होता है।
घबराहट, ब्याकुलता या व्यग्रता।
रसशास्त्र में वियोग की व्याकुलता।
उद्धार पाता है, मुक्त होता है, छूटता है।
धर्म बहैं, सरसयन गंग-सुत, तेतिक नाहिं सँतोष। सुत सुमिरत आतुर द्विज उधरन, नाम भयौ निर्दोष--१. २१५।
(ख) उधरत लोग तुम्हारे नाम-११-५।
मुक्त, होना, छुटकारा पाना।
मुक्त करना, छुटकारा देना।
हवा में इधर उधर उड़कर, बिखरकर।
लोक सकुच मर्यादा कुल वी छिन ही में बिसराइ। ब्याकुल फिरतिं भवन वन जहँ तहँ तूल आक उधराइ---पृ० ३२१।
हवा में इधर उधर उड़ना, बिखरना।
[सं. उद्धरण हिं. उद्धार, उधरना]
उद्धार पा गयी, मुक्त हो गयी।
गीध ब्याध गज गनिका उधरी, लै लै नाम तिहारौ--१-१७८।
उद्धार या छुटकारा पावे, मुक्त हो।
(क) भक्त सकामी हू जो होइ। क्रम-क्रम करिकै उधरै सोइ-३-१३।
(ख) राज-लच्छमी मद नहिं होइ। कुल इकीस लौं उधरै सोइ। ७-२।
(ग) बिना गुन क्योैं पुहुमि उधारै यह करत मन डौर-२९०९।
उद्धार या मुक्त करे, छुटकारा दिलावे।
सूर स्याम गुरु ऐसौ समरथ, छिन मैं लै उधरै-६-६।
[सं. उद्धरण, हिं. उद्धरना]
उद्धार करूँ, उबारूँ, रक्षा करूँ।
छीर-समुद्र-मध्य तैं यौं हरि दीरघ बचन उचारा। उधरौं धरनि, अमुरकुल-मारौं, धरि नर-तन अवतारा--१०-४।
[सं. उद्धारण, हिं. उधरना]
उद्धार या छुटकारा पाया, मुक्त हुआ।
तिन मैं कहौं एक की कथा। नारायन कहि उधरचौ जथा-६-३
इहिं सराप सौं मुक्ति ज्यौं होइ। रिपि कृपलु भाषौ अब सोइ। क्ह्यौ जुधिष्ठिर देखै जोइ। तब उद्धार नृप तेरौ होइ-६-७।
[सं. उद्धार = बिना ब्याज का ऋण]
[सं. उद्धार, हिं. उधारना]
(क) अब कहाँ लौं कहौं एक मुख या मन के कृत काज। सूर पतित, तुम पतित उधारन, गहौ विरद की लाज---१-१०२।
(ख) कांपन लागी धरा, पाप तैं ताड़ित लखि जदुराई। आपुन भए उधारन जग के, मैं सुधि नीके पाई--१-२०७।
उद्धारक, उद्धार करनेवाले।
अव मोसौं अलसात जात हौ अधम उधारनहारे-१-२५।
सूरदास सब तजि हरि भजिये जब कब करै। उधारा-१० उ०-३६।
[सं. उद्धरण, हिं. उधारना]
उद्धारो. मुक्त करो, पार लगाओ।
अब कैं नाथ, मोहिं उधारि। मगन हौं भव-अंबुनिधि मैं, कृपासिंधु मुरारि.---१-९९।
उद्धार करनेवाला, उद्धारकं।
देखि देखि री नंदकुल के उधारी। मातु पितु | दुरित उद्धरन ब्रज उद्धरन धरनि उद्धरन सिर मुकुट धारी--१४७३।
[सं. उद्धरण, हिं. उद्धार]
तार दिये, मुक्त किये ( उनका) उद्धार किया।
(क) गज, गनिका अरु बिप्र अजामिल, अगनित अधम उधारे-१-१२५।
(ख) अवगाहौं पूरन गुन स्वामी, सूर से अधम उधारे–१-१९७।
[सं. उद्धरण, हिं. उधारना]
जो-जौ मुख हरि-नाम उचारै। हरि-गन तिहिं तिहिं तुरत उधारैं–६-४।
[सं. उद्धार, हिं. उधारना]
उद्धार करे, मुक्त करे, छुटकारा दिलावे।
तुम बिनु करुना सिंघु और को पृथी उधारै-३-११।
[सं. उद्धरण, हिं. उधारना]
नारद-साप भए जमलार्जुन, | तिनकौं अब जु उधारौं-१०-३४२।
[सं. उद्धारण, हिं. उधारना]
(क)संततदीन, महा अपराधी, काहैं सूरज कर बिंसाराँ सोकहि नाम रह्यौ प्रभु तेरोै, बनमाली, भगवान, उघारौ-१-१७२।
(ख) प्रभु मेरे मोसों पतित उधारौ-१-१७८।
(ग) नाथ सको तौ मोहिं उधारौ---१-१३१।
उद्धारा, मुक्त किया, रक्षा की।
(क) संकट तैं प्रह्लाद उधारयौ हरिनाकसिपु-उदर नख फारी-१-२२।
(ख) धरनीधर बिधि बेद उधारयौ मधु सों सत्रुहयो-२२६४।
उन तौ करी पाहिले की गति, गुन तोरयौ बिच धार--१-१७५।
आजु घन स्याम की अनुहारि। उनइ आए साँवरे ते सजनी देखि रूप की आरि--२८२९।
माया देखत ही जु गई।…...। सुत-संतानस्वजन-बनिता-रति, घन समान उनई। राखे सूर पवन पाखंड हति, करी जो प्रीति नई-१-५०।
जपत अठारहो भेद उठईस नहिं बीसहू बिसो ते सुखहि पैंहै-१२७८।
[सं. एकोनपं वाशत: पा. एकोनपंचास, उनपंचास]
[सं. एकोनत्रिंशत; पा. एकुंतीसा, उन्तीसा]
[हिं. ‘उस' का बहु. 'उन' + तैं(प्रत्य.)]
ब्रज मैं को उग्ज्यौ यह भैया। संग सखा सब कहत परस्पर, इनके गुन अग मैया--४२८।
एक पेड़ जिसकी लकड़ी सुगंधित होती है।
चंदन अगर सुगंध और घृत, बिधि करि चिता बनायौ-९.५०।
धृष्टतायुक्त बात, अनचित कथन।
गेंड्डरि दई फटकारि कै हरि करत हैं लँगरी। नित प्रति ऐसेई ढंग करैं हमसों कहै अगरी-८५८।
[सं. उन्निद, हिं. उनींदा]
(क) निद्रा-बस जो कबहूँ सोवै। मिलि सो अविद्या सुधि-बुध खोवै। उनमत ज्यो सुख दुख नहिं जानैं। जागै वहै रीति पुनि ठानै-४-१२
(ख) बहुरोै भरतहिं दै करि राजा। रिषभ ममत्व देह कौ त्याग। उनमत की ज्यों बिचरन लागे। असन--बसन की सुरतिहिं त्यागे--५-२।
माधो जू मन सबही बिधि पोंच। अति उन मत्त, निरंकुस, मैगल, चिंतारहित, असोच-१-१०२।
उदास, खिन्न, उचाट चित्त का।
भानुतपन किसान ग्रह के रच्छपालक आप। मद्ध ठाढ़ो होत नंदनंदन कर उनमाद सा०-११६।
(४) कहिबे मैं न क छू सक राखी। बुधि बिबेक उनमान आपने मुख आई सो भाखी-३४६९।
(ख) सुनि स्रवन उनमान करति हौं निगम नेति यह लखनि लखी री-२११३।
आगम निगम नेति करि गायौं, सिव उनमान न पायौ। सूरदास बालक रसलीला यह अभिलाष बढ़ायौ।
शक्ति, सामर्थ्य, योग्यता।
(क) तुव नासापुट गत मुक्त फल अधर बिंब उनमान। गंजाफब सब के सिर धारत प्रकटी मीन प्रमान।
(ख) उरगइंदु उन सान सुभग भुज पानि पदुम आयुधराजैं-१ ६९।
अनुमान करना,, सोचना समझना।
स्पष्ट, प्रकट, खुला, हुआ।
बाँसुरी तै जान मोको परो ना सुत सोइ। सूर उनमीलत निहारो कहें का मति भोइ सा० ७७।
एक काव्यालंकार जिसमें दो वस्तुओं को बहुत अधिक समानता हो, पर केवल थोड़ी बात का ही उन में भेद दिखायी दे।
[सं. अन्यमनस्क, हिं. अनमना]
हठयोग की एक मुद्रा जिसमें भौं को ऊपर चढ़ाते और दृष्टि को नाक का नोक पर गड़ाते हैं।
पहली वर्षा के पश्चात जल में उत्पन्न जहरीला फेन जिससे मछलियाँ मर जाती हैं, माँजा।
इन्द्री-स्वाद बिबस निसि बासर आपु अपुनपौ हारयौ। जल उनमेद मीन ज्यौं बपुरो पाँव कुल्हारो मारयौ।
(क) अजु सखी अरुनोदय मेरे नैनन धोख भयौ। की हरि आजु पंथ यहि गौने कीधौं स्याम जलद उनयो-१६२८।
(ख) नेक मोहिं मुसुकात जानि मनमोहन मन सुख आन्ययौ। मानो देव द्रुम जरत आरा भघो उनयो अंबर पान्यो-२२७५।
उठोगी, उमड़ोगी, झुकोगी, प्रवृत्त होगी।
घिरकर, चारों ओर छा जाती है।
[सं. एकोनषष्ठि, प्रा. एकुन्नसटि, उनसट्टि]
[सं. अनुसार, प्रा. अनुहार]
नैननि निपट कठिन ब्रत ठानी।….। समुझि समुझि उनहार स्याम को अति सुन्दर बर सारँगपानी। सूरदास ए मोहि रहे अति हरि मूरति मन माँझ समानो--३०३७।
तामै एक छबीलो सारग अध सारंग उनहारि-सा० उ० २।
प्रेरित या प्रवृत्त करना।
सुनना, ध्यान देना आज्ञा मानकर काम करना।
कह्यौ, सरमिष्ठा सुत कहँ पाए ? उनि कह्यौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।
[सं. अनुसार, प्रा. अनुहारि]
[सं. अनुसार, प्रा. अनुहार, हिं. उनहार]
तब चिंतामनि चितै चित्त इक बुधि बिचारी। बालक बच्छ बनाइ रचे वेही उनहारी-४९२।
[सं. अनुसार, प्रा. अनुहारि, हिं. उनहार]
नींद से भरा हुआ, ऊँघता हुआ।
नींद से भरे हुए, ऊँघते हुए।
(क) बछरा-वृंद घेरि आगैं करि जन-जन सृंग बजाए। जनु बन कमल सरोवर तजिकै, मधुप उनींदे आए--४३२।
(ख) स्याम उनींदे जानि मातु रचि सेज बिछाई। तापर पौढ़ ताल अतिहिं मन हरष बढ़ाई-४३७।
ते दिन बिसरि गये इहाँ आए। अति उन्मत्त मोह-मद छाक्यौ, फिरत केस बगराए--१-३२०।
हटयोग की एक मुद्रा जिसमें दृष्टि को नाक की नोक पर गाड़ते और भौंह, को ऊपर चढ़ाते हैं।
उमड़ उमड़ कर, घिरकर, छाकर।
उनै घन बरषत चख उर सरित सलिल भरी-२८१४।
(क) गोबिंद कोपि चक्र करु लीन्हो।.....। कछक अंग तैं उड़त पीतपट, उन्नत बहु बिसाल-१-२७३।
(ख) आवहु बेगि सकल दुहुँ दिसि तैं कत डोलत अकुलाने। सुनि मृदु बचन देखि उन्नत कर, हरषि सबै समुहाने-५०३।
हतासन' ध्वज उमँगि उन्नत चलेउ हरि दिसि वाउ--२७१५।
एक संचारी भाव जिसमें वियोग दुख आदि के कारण चित्त ठिकाने नहीं रहता।
बुरे आचरण वाला, कुमार्गा।
एक काब्य लंकार जिसमें दो वस्तुओं की बहुतँ अधिक समानता वर्णित हो और अंतर केवल एक छोटी बात का रह जाय।
(क) उघटत स्याम नृत्यत नारि। धरे अधर उपंग उपजै लेत हैं गिरिधारि-पृ० ३४६ (४५)।
(ख) बीज मुरज उपग मुरली झाँझ झालरि ताल। पढ़त होरी बोलि गारी निरखि कै ब्रजलात २४ १५।
(ग) डिमडिमी पतह ढोल डक बीणा मृदग उपंग चंग तार। गावत है प्रीति सहित श्री दामा बढ्यौ है रंग अपार--२४४६।
उपंग का पुत्र, ऊधव जो उपंगसुत श्री कृष्ण का सखा था।
(क) हरि गोकुल की प्रीति चलाई। सुनहुँ उपँगसुत मोहि न बिसरत ब्रज निवास सुखदाई
(ख) कहत हरि सुन उपँगसुत यह कहत हौं रसरीति-१९१६।
[सं. उत्पन्न, प्रा. उप्पन्न]
( क) हम तुम सब बैस एक, काते को अगरौ। लियो दियौ सोई कछु, डारि देहु झगरौ---१०.३३६।
(ख) सूर सनेह ग्वारि मन अटक्यो छाँडहु दिए परत नहि पगरौ। परम मगन ह्वै रहो चितै मुख सबते भाग यही कौं अगरौ-पृ. २३५।
(ग) हम तुम एक सम कोन कातैं अगरौ----१०५६।
योजन बीस एक अरु अगरो डेरा इहि अनुमान। ब्रजबासी नर नारि पति नहिं मानो सिंधु समान----९२२।
[सं. आकर = वान, हिं. अगर]
[सं. आकर = वान, हिं. अगर]
सूरदास प्रभु सब गुननि अगरौ। और कहूँ जाइ रहे छाँड़ि ब्रज बगरौ--१० ५६।
सूर स्याम तेरी अति गुननि माहि अगरौ। चोली अरु हार तोरि छोरि लियौ सगरौ----१०-३३६।
[हिं. आगे + ना (प्रत्य.)]
किसी कार्य के लिए प्रस्तुत होना, आगे बढ़ना।
[सं. अग्र = आगे + आयाम = आना]
आगे से जाकर लेना, अभ्यर्थना।
विवाह में बारात का स्वागत करने वाले कन्या पक्ष के लोग।
समीपता, सामथ्र्य, न्यूनता आदि अर्थों का द्योतक एक उपसर्ग।
तोसी नहीं और उपकारिनि यह बसुधा सब बुधि करि हेरी--२७५२।
(क) जा कारन तुम यह बन सेयौ, सो तिय मदन-भुअंगम खाई।……..। ताहि कछू उपचार न लागत, कर मीड़ैं सहचरि पछिताई-७४८।
(ख) दिसिअति कालिंदी अति कारी। अहो पथिक कहियो उन हरि सों भई बिरह ज्वर जरी।…..। तट बारू उपचार चूर जल परी प्रसेद पनारी---२७२८।
(ग) आपुन को उपचार करौ कछु तउ औरन सिख देहु। बड़ो रोग उपज्यौ है तुमको मौन सबारे लेहु३०१३।
(घ) आगम सुख उपचार बिरह ज्वर बासर ताप नसावते–२७३५।
पुरानी कथा, पुराना वृत्तांत।
मोसों बात सुनहु ब्रजनारि। एक उपखान चलत त्रिभुवन में तुमसों आजु उघारि--१०९९
पूजा के सोलह अंग--आव हन, आसन, अर्धंपाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान वात्राभरण, यज्ञोपवीत, गंध, (चंदन) , पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, परिक्रमा, वंदना।
बिरही कहाँ लौ आपु सँभारे।.......। सूरदास जाके सब अंग बिछरे केहि विद्या उपचारे-३१८९।
घर घर तें आई ब्रज सुन्दरि मंगल काज सँवारे। हेम कलस सिर पर धरि पूरन काम मंत्र उपचारे।
काम में लाये, व्यवहार करे।
[हिं. उपजना, का स. रूप, ‘उपजाना']
अजहुँ लौं मन मगन काम सौं, विरति नाहिं उपजाई-१-१८७।
संकट परैं जो सरन पुकारौं, तो छत्री न कहाउँ। जन्महिं तैं तामस आराध्यौ, कैसें हित उपजाऊँ--९-१३२।
[हिं. उपज + आऊ ( प्रत्य.)]
जिसमें अच्छी उपज हो उर्वरा।
[हिं. उपजाना ( ‘उपजाना' का स. रूप)]
गो सुत अरु नर-नारि मिले अति हेत लाइ गई। प्रेम सहित वे मिलत है जे उपजाए आजु-४३७।
[हिं. उपजाना ( ‘उपजाना' का स. रूप)]
गिरि कर धारि इंद्र-मद मद्यौं, दासनि सुख उपजाए-१-२७।
पंचतत्व तैं जग उपजाया-१०.३
[हिं. 'उपजना' का स. रूप ‘उपजाना]
नरतन, सिंह-बदन, बपु कीन्हौ, जन ल गि भेष बनायौ। निज जन दुखी जानि भय तैं अति, रिपु हति, सुख उपजायौ-१-१९०।
[हिं. उपजना का स, रूप ‘उपजाना']
उत्पन्न करता है, पैदा करता है, स्थितिविशेष उपस्थित करता है।
(क) मन्त्री कामक्रोध निज, दोऊ अपनी-अपनी रीति। दुविधा-दंद रहै निसि-बासर, उपजावत बिपरीत-१-१४१।
(ख) नँदनँदन बिनु कपट कथा एकत कहि रुचि उपजावत-२९८९।
तारी देहु आपने कर की परम प्रीति उपजावहु-१०.१७९।
गान में राग की निश्चित तानों के अतिरिक्त नयी तानें अपनी ओर से मिलाना।
उर बनमाला सोहै सुन्दर बर गोपिन के संग गावै। लेत उपज नागर-नागरि संग बिच बिच तान सुनावै---पृं. ३५१-(७०)।
उत्पन्न होता है, पैदा होता है, मिलता है।
मोहन के मुख ऊपर वारी। देखत नैन सबै सुख उपजत, बार बार तातैं बलिहारी--१-३०
पैदा होती है, उत्पन्न होती है।
चितवत चलत अधिक रुचि उपजति, भँवर परति सब अंग-६२८।
उत्पन्न करता हैं, पैदा करके।
यह बर दै हरि कियौ उपाइ। नारद-मन संसय उपजाइ-१-२२६।
करौं जतन, न भजौं तुम कौं, कछुक मन उपजाइ। सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ-१-४५।
[हिं. उपजना का स. रूप उपजाना]
(क) परम स्वाद सबही सु निरन्तर अमित तोष उपजावै---१-२।
(ख) पुरुष वीर्य सौं तिय उपजावै – ३-१३।
(ग) मन में रुचि उपजावै, भावै, त्रिंभुवन के उजियारे-४१९।
उपजि परयौ, सिसु कर्म-पुन्य-फल समुद्र-सीप ज्यौं लाल-१०-१३८।
उपजि परी :- सामने आयी, ज्ञात हुई, जान पड़ी। उ.- तनु आत्मा समर्पित तुम कहँ पाछे उपजि परी यह बात----१० उ.-११।
दच्छ के उपजी पुत्री सात-४-३।
(क) भाव-भक्ति कछु हृदय न उपजी, मन विंषया मैं दीनौं--१-६५।
(ख) काढ़ि काढ़ि थाक्यौ दुस्सासन, हाथनि उपजी खाज-१-२५५।
(ग) विषय-विकार दवानल उपजी, मोह-ब्यारि लई--१-२९९।
(घ) सूरदास मोहन मुख निरखत उपजी सकल तन काम गुँभी---१४४६।
उत्पन्न हुए,जन्मे, पैदा हुए।
दस सुत मनु के उपजे और। भयौ इच्छवाकु सब्रनि सिरमौर-९-२।
उपजने पर, उत्पन्न होने पर।
समुझि न परत तुम्हारी ऊधो। ज्यौं त्रिदोष उपजे जक लागत पोलत वचन न सूधो-३०१३।
गाने में राग की निश्चित तानों के अतिरिक्त नयी ताने मिलाना।
धरि अधार उमंग उपजैं लेत हैं गिरिधारि--पृं० ३ ४६ (४५)
उपजता है, उत्पन्न होता है।
(क) जाकौ नाम लेत अब उपजै, सोई करत अनीति-१-१२९।
(ख) प्रेम-कथा अनुदिन सुनै (रे) तऊ न उपजै ज्ञान---१-३२५।
(ग)ज्ञानी संगति उपजै ज्ञान-३-१३।
बान सखी सुत है पुत्री के मदन बहुत उपजैहै सा० ८१।
अब मेरी राखौ लाज मुरारी। संकट मैं इक संकट उपजोै, कहै मिरग सौं नारी--१-२२१।
उत्पन्न किया हुआ। जन्मा, पैदा हुआ।
(क) गनिका उपज्यौ पूत सो कौन कौ कहावै-२.९।
(ख) बड़ो रोग उपज्यौ है तुमको मौन सवारे लेहु-३०१३।
[सं. उत्पट = पट के ऊपर अथवा उत्पतन + ऊपर उठना]
[सं. उत्पट = पट के ऊपर अथवा उत्पतन + ऊपर उठना]
द्विरद को दंत उपटाय (उपठाय) तुम लेत हौ उहै बल आज काहे न सँभारचौ-२६०२।
कोकिल हरि को बोल सुनाव। मधुबन तैं उपटारि (उपठारि) स्याम को यहि ब्रज लै करि आव-२८५१।
[सं. उत्पाटन, हिं. उपटाना]
द्विरद को दंत उपठाय (उपटाय) तुम लेत हो उहै बल आज काहे न सँभारयो-२६०२।
[सं. उत्पटन, हिं. उपटारना]
कोकिल हरि को बोल सुनाव। मधुबन से उपठारि (उपटारि) स्याम को यहि ब्रज लै करि आव-२८५१।
राधिका हरि अतिथि तुम्हारे। अधर सुधा उपदंस सीक सुचि बिधु पूरन मुख बास सँचारे।
सतगुरु हृदय धरि, जिन भ्रम सकल निवारयौ--१-३३६।
[सं. उपदेश, हिं. उपदेशना]
सिखाते हैं, शिक्षा देते हैं।
(क) गोविन्द-भजन करौ इहिं बार। संकर पारवती उपदेसत, तारक मंत्र लिख्यौ स्रुति-द्वार-२-३।
(ख) जद्यपि अलि उपदेसत ऊधो पूरन ज्ञान बखानि। चित चुभि रही मदन मोहन की जीवन मृदु मुसुकानि-३२१४।
[सं. उपदेश +ना (प्रत्य.)]
उपदेश देने पर, उपदेशों से।
जैसे अंधौ अंध कूप मैं गनत न खाल-पनार। तैसेहिं सूर बहुत उपदेसैं सुनि सुनि गे कै बार-१-८४।
[सं. उपदेश, हिं. उपदेशना]
उपदेश या शिक्षा दूँ, समझाऊँ।
अब मैं याकौ दृढ़ देखौं। लखि बिस्वास, बहुरि उपदेसौं-४९।
तुम हमको उपवेस्यौ धर्म। ताको कछु न पायो मर्म-१८१२।
इहाँ सिव-गननि उपद्रव कियौ-४•५।
[सं. उपधरण = अपनी ओर आकर्षित करना]
द्रजाधिप नंद के छोटे भाई।
विवाह में बात का स्वागत करने कन्या पक्षवालों के जाना।
आने वाल का आगे पहुँचकर स्वागत करना, पेशवाई।
पाँच-पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे। सुनीं तगीरी, बिसरि गई सुधि मो तजि भए नियारे---१-१४३।
सखी री पुर बनिता हम जानी। याही तैं अनुमान होता है षटपद-से अगवानो-३४०२।
आगे चली, अग्रगामिनी हुई :
क्यों करि पावै विरहिन पारहिं बिन केवट अगवानौ---२७९६।
एक ऋषि जो मित्रा वरुन के पुत्र थे। ऋग्वेद में इनकी ऋचाएँ हैं
एक ऊँचे पेड़ की फली जिसको तरकारी बनती है।
फूल करील करी पाकर नम। फली अगस्त्य करी अमृत सम-२३२१।
जो पकड़ी न जा सके, अति चंचल।
माधौ नैकुँ हटकौ गाय। भ्रमत निसि-बासर अपय पथ, अगह गहि नहिं जाइ---१-५६।
पैदा हुई, उपजी,उत्पन्न हुई, जन्मी।
कुटिल भृकुटि, सुख की निधि आनन, कल कपोल की छबि न उपनियाँ १०. १०६।
ब्राह्मण ग्रंथों के वे अंतिम भाग जिन में आत्म-परमात्मा का सम्बन्ध निरूपण मिलता है। इनकी संख्या के सम्बन्ध में मतभेद है। कोई इन्हें १८ मानता है तो कोई १०६।
मेल मिलाना, चरितार्थ होना।
बस्तु के व्यवहार का आनंन्द।
सादइय, समानता, तुलना, मिलान।
(क) सूरदास-प्रभु भक्त-बछल हैं, उपमा कौंन बियौ---१-३८।
(ख) परम सुसील सुलच्छन जोरी, बिधि की रची न होइ। काकी तिनकौं उपमा दीजै, देह धरैं धौं कोइ-९-४५।
(ग) अजिर पद-प्रतिबिंब राजत चलत उपमा-पुंज। प्रति चरन मनु हेम बसुधा, देति आसन कज--१०-२१८।
एक अलंकार जिसमें दो भिन्न वस्तुओं में समान धर्म बताया जाय।
उपमा, सादृश्य तुलनाँ पटतर।
मुक्तमाल बिसाल उर पर, कछु कहौं उपमाइ। मनौ। तारा-गगनि वेष्ठत गगन निसि रह्यौ छाइ--१०-२३४।
वह वस्तु जिससे उपमा दी जाय।
प्रथम डार उपमान कहा मुख बैठी मंत्र सु डारो---सा ० २०।
वह वस्तु जिसकी उपमा दी जाय।
(क) तीन दस कर एक दोऊ आप ही में दौर। पंच को उपमान लीनो दाव आपुन तौर--सा० १० १।
(ख) भामिन आजु भवन में बैठी। मानिक निपुन बनाय नीकन में धनु उपमेय उमेठी-सा. ११२।
(क) नैन कमल-दल बिसाल, प्रीति बापिका मराल, मदन ललित बदन उपर कोटि वारि डारे--१०-२०५।
(ख) सूर प्रभु नाम सुनि मदन तन बल भयो अंग प्रति छबि उपर रमा दासी--१=९४।
[हिं. ऊपर + ना (प्रत्य.)]
(क) पहिरे राती चूनरी, सेत उपरना सोहे (हो)---१-४४।
(ख) लियो उपरना छीनि दूरि डारनि अटकायो----११२४।
ऊपरी, इधर-उधर का, व्यर्थ का, निष्प्रयोजन।
बाहँ तुम्हारी नैंकु न छाँड़ौं, महर खीझिहैं हमकौं। मेरी बाहँ छाड़ि दै राधा, करत उपरफट बातैं। सूर स्याम नागर नागरि सौं करत प्रेम की घातैं ६८१।
बिनु परवहि उपराग आजु हरि तुम है चलन कह्यौ। को जानै उहि राहु रमापति कत ह्वै सोध लह्यौ---२५२७।
बाँधो सुरति सुहाग सबन को हरि मिलि प्रीति उपराजी-३०९४।
[हिं. ऊपर + ला (प्रत्य.)]
गर्व से सिर ऊँचा किये हुआ,अकड़ता हुआ।
एक वस्तु के | लिए कई आदमियों का प्रयत्न।
होड़, स्पर्द्धा, प्रतियोगिता।
(क) सिर पर मुकुट, पीत उपरैना, भृगु-पद उर, भुज चारि धरे-१०८।
(ख) तब रिस धरि सोई उत मुख करि झुक झाँक्यो उपरैना माथ--२७३६।
हिम के उपल तलाई अंत ते याके जुगुत प्रकासो-सा० १०५।
इहिंबिधि उपलै तरत पान ज्यौं, जदपि सैल अति भारत। बुद्धि न सकति सेतु रचना रचि, राक-प्रताप बिचारत-९-१३।
उपवन बन्यो चहूँधा पुर के अति ही मोको भावत-२५५९।
वासना को दबाना, इन्द्रियों को वश में करना।
निबारण करना, दूर करता है।
एक दैत्य जो सुंव का छोटा भाई था। ये दोनों परस्पर युद्ध करके एक दूसरे के हाथ से मारे गये थे।
खड़े होकर स्तुति या पूजा करना।
(क) सुन्दर कर आनन समीप, अति राजत रहिं आकार। जलरुह मनौ बैर बिधु सौं तजि मिलत लए उपहार ३८३।,
(ख) आये गोप भेंट लै लै के भूषन-बरान सोहाए। नाना बिधि उपहार दूध दधि आगे धरि सिर नाए।
(क) निंदा जग उपहास करत, मग बंदीजन जस गावत। हठ, अन्याय, अधर्म सूर नित नौबत द्वार बजावत----१-१४१।
(ख) सूरदास स्वामी तिहुँ पुर के, जग-उपहास डराइ-९-१६१।
(ग) घेरि राखे हमहिं नहिं बूझे तुमहिं जगत में कहा उपहास तैहो-२६०५।
( घ) हम अलि गोकुलनाथ अराध्यौ।…..। गुरुजन कानि अग्नि चहुँ दिसि नभ तरनि ताप बिनु देखे। पिवत धूम उपहास जहाँ तहँ अपयस स्रवन अलेखे---३०१४।
अपरिचित या अजनवी व्यक्ति।
(क) अबकी बार मनुष्य-देह धरि, कियौ न कछू उपाय-१-१०५।
(ख) यह बर दै हरि कियौ उपाइ। नारद मन-संसय उपजाइ-१-२२६।
शत्रु पर विजय पाने का साधन या युक्ति।
जब तैं जन्म लियौ ब्रज-भीतर तब तैं यहै। उपाइ। सूर स्याम के बल-प्रताप तैं, बन बन चारत गाइ---५०८।
[सं. उत्पन्न, पा. उत्पन्न, हिं. उपाना]
सकल जीव जल-थल के स्वामी चींटी दई उपाय। सूरदास प्रभु देखि ग्वालिनी, भुज पकरे दोउ आइ-१०-२७८।
(क) गुरु-हत्या मौतैं ह्वै आई। कह्यौ सो छूटै कौन उपाई-१-२६१। (ख) पृथ्वी हित नित करै उपाई-१२-३।
[सं. उत्पन्न, प्रा. उप्पन्न, हिं. उपाना]
(क) सूरदास सुरपति रिस पाई। कीड़ी तनु ज्यों पाँख उपाई-१०४१।
(ख) ब्रह्मा मन सो भली न भाई। सूर सृष्टि तब और उपाई---३-७।
[सं. उत्पन्न, प्रा. उप्पन्न, हिं. उपाना]
(क) तबहिं स्याम इक युक्ति उपाई-३८३। (ख) सुने जदुनाथ इह बात तब पथिक सौं धर्म सुत के हृदय यह उपाई-१० उ०-५०। (ग) प्रीति तिनकी सुमुरि भय अनुकूल हरि सत्यभामा, हृदय यह उपाई-१० उ०-३१।
सखी मिल करहु कछू उपाउ--सा० उ०-४०।
जो वर्णन और चिंतन से बाहर हो।
अगमते अगह अपार आदि अबिगत है सोऊ। आदि निरंजन नाम ताहि रंजै सब कोऊ---३४३।
ऊधौ जो तुम हमहिँ बतायौ।…..। जोग जाचना जबहिँ अगह गहि तबही” सौ है ल्यायौ।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग + हिं. हर ( प्रत्य.)]
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग + हिं. हर (प्रत्य.)]
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग + हिं. हुँड (प्रत्य.)]
सोवत कहा चेत रे रावन, अब क्यों खात दगा ? कहति मँदोदरि, सुनु पिय रावन, मेरी बात अगा-९-११४।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग + हिं. आऊ (प्रत्य.)]
जब हिरनाच्छ जुद्ध अभिलाष्यौ, मन मैँ अति गरबाऊ। धरि बाराह रूप सो मारयौ, लै छिति दंत-अगाऊ---१०-२२१।
(क) हौं डरपौं, काँपौं अरु रोवौं, कोउ नहिं धीर धराऊ। थरसि गयौँ नहिँ भागि सकोँ, वै भागे जात अगाऊ-४८१।
(ख) प्रीतम हरि हमकोँ सिधिं पठई आयौ जोग अगाऊ--३११०।
(क) अब मैं उनकौं ज्ञान सुनाऊँ। जिहिं तिहिं बिधि बैराग्य उपाऊँ-१-२८४।
(ख) जैसी तान तुम्हारे मुख को तैसिय मधुर उपाऊँ--पृ० ३११।
(ग) सुनहु सूर प्यारी हृदय रस बिरह उपाऊ पृ० ३१२।
तीनि पुत्र तिन और उपाए। दच्छिन राज करन सो पठाए--९-२।
कथा के अंतर्गत प्राँसंगिक कथा।
उखाड़ता है, नष्ट करता है, नोचता है।
जन कै उपजत दुख किन काटत? जैसे प्रथम अषाढ़ आँजु तृन, खेतिहर निरखि उपाटत-१-१०७।
तरुवर तब इक उपाटि हनुमत कर लीन्होै -९-९६।
जोजन बिस्तार सिला पवन-सुत उपाटी--९-९६
संगति रहति सदा पिय प्यारी क्रीड़त करत उपाधा। कोक कला बितपन्न भई है कान्ह रूप तनु आधा--१४३७।
कर्तव्य का विचार धर्मचिंता।
(क) मन-बच-कर्म और नहिं जानत, सुमिरत और सुमिरावत। मिथ्याबाद-उपाधि-रहित ह्वै, बिमल-बिमल जस गावत-२-१७।
(ख) क्रम-कम क़म सों पुनि करै समाधि। सूर स्याम भजि मिटै उपाधि-२-२१।
उत्पात करने वाला, उपद्रवी।
[सं. उत्पन्न, पा. उप्पन्न]
[सं. उत्पन्न, पा. उप्पन्न]
[सं. उत्पन्न, पा. उप्पन्न]
उत्पन्न किया, रचा, बनाया।
तुम्हारी माया जगत उपाया--१०उ.-१२९।
(क) ता रानी सौं नृप-हित भयौ। और तियनि कौ मन अति तयौ। तिन सबहिनि मिलि मंत्र उपायौ। नृपति-कुँवरि कौं जहर पियायौ-६-५।
(ख) धर्मपुत्र जब जज्ञ उपायौ द्विज मुख ह्वै पन लीन्हौ-१-२९।
(क) तिन प्रथमहि महतत्व उपायौ। तातैं अहंकार प्रगटायौ---३-१३।
(ख) तातैं कीने और ब्रह्म-नाल उपायौ-४३७।
उखाड़ते समय, उखाड़ने में।
मंदराचल उपारत भयौ स्रम बहुत, बहुरि लै चलन कौं जब उठायौ-८-८।
[सं. उत्पाटन, हिं. उपाटना]
(क) स्वर्ग-पाताल माहिं गम ताकौ, वहिये कहा बनाई। केतिक लंक उपारि बाम कर, लै आवै उचकाइ-९-७४।
(ख) कहौ तौ सैल उपारि पेड़ि तैं, दै सुमेरु सौं मारौं-९-१०७।
(ग) कंध उपारि डारिहौं भूतल सूर सकल सुख पावत-९-१३३।
(क) सिब ह्वै क्रोध इक जटा उपारी। बीरभद्र उपज्यौ बलभारी-४-५।
(ख) क्रुद्ध होइ इक जटा उपारी-६-५।
(ग) पटक्यौ भूमि फेरि नहिं मटक्यो लीन्हे दंत उपारी-२५९४।
रजक धनुष जोधा हति दंतगज उपारे--१६०१।
(क) जारौं लंक छेदि दस मस्तक, सुर संकोच निवारौं। श्रीरघुनाथ-प्रताप-चरन करि, डर तैं भुजा उपारौं-९-१३२।
(ख) प्रबल कुवलिया वंत' उपारौं-११६१
उखाड़ लो, (किसी वस्तु से) अलग कर लो।
गउ चटाइ, ममत्वचा उपारौ। हाड़नि कौ तुम बज्र सँवारौ-६-५।
[सं. उत्पाटन, हिं. उपाटना, उपारना]
उखाड़ लिया, नोच-खसोट लिया।
बीरभद्र तब दच्छईि मारयौ। अरु भृग रिषि कौ केस उपारयोै –४.५।
(क) अति उनमत्त मोह-माया-बस, नहिं कछु बात बिचारौ। करत उपाव न पूछत काहू. गनत न खाटौ-खारी--९-१५२।
(ख) कहौ पितु, मोसौं सोइ सति भाव। जातैं दुरजोधन-दल जीतौं, किहिं बिधि करौं उपाव-१-२७५।
उत्पन्न करें, रचें, बनावे।
बहुरो ब्रह्मा सृष्टि उपावैं-१२-४।
जौ मन कबहुँक हरि कौ जाँचै। आन प्रसंग उपासन छाँडै, मन-बच-क्रम अपनै उर साँचै-२-११
(क) नाम गोपाल जाति कुल गोपक गोप गोपाल उपासी---३३१४।
(ख) हम ब्रज बाल गोपाल उपासी-३४४२।
पूजा सेवा के योग्य, पूज्य, सेष्य,आराध्य।
[सं. उप + यमन, हिं. उपदना]
लोप होना, उड़ जाता है, विलीन होता है।
खुली हुई, नंगी, आच्छादन रहित। जय जय जय माधव-बेनी। जगहित प्रगट करी करुनामय, अगतिनि कौं गति दैनी। जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप, संग सजी अघ--सैनी। जनु ता लगि तरवारि त्रिविक्रय, धरि धरि कोप उपैनी-९-११।
[सं. उत्पन्न, पा. उत्पन्न, हिं. उपाना]
स्याम तुम्हारी कुसल जानि एक मंत्र उपेैहौं---९३३ (४)।
[सं. उप् + फेन, हिं. उफनना]
(क) उफनत छीर जननि करि व्याकुल इहि बिधि भुजा छुड़ाई-१०३४२।
(ख) एक दुहनी दूध जावत को सिरावत जाहिं। एक उफनत ही चलीं उठि धरयौ नही उतारि--पृ०३३९ (८४)।
(ग) उतसहकंठा हरि सो बढ़ी। उफनत दूध न धरयौ उतारि। सीझो थूली चूल्हे दारि--१८०३।
उमड़ता है हिलोरें मारताहै।
आँच या गरमी से फेना उठना।
उबलकर, उफान आकर फेना उठकर, छिटक कर।
छलकति तक्र उफनि अँग आवत नहिं जान ति तेहि कालहि सो---१ १८०।
क्यौं हुँ जतन जतन करि पाए। तन उबटन तेल लगाए-१०-१८३।
एक दुहावत ते उठि चली।….। लेत उबटना त्यागो दुरि। भागन पाई जीवन मूरि।
तेल उबटनो अरु तातो जल ताहिं देखि भजि जाते---२७७७।
(क) तब महरि बाँह गहि आनै। लै तेल उबटनो सानै--१०--१८३।
(ख) केसरि कौ उबटनौं बनाऊँ रचि रचि मैल छुड़ाऊँ-१०-१८५।
(क) जननी उबटि न्हवाइ कै (सिसु क्रम सोैं लीन्हे गोद--१०-४२।
(ख) जसुमति उबटि न्हवाइ कान्ह कौं पट-भूषन पहराइ-१०८९।
(ग) इक उबटि खौरि सृंगारि सखिअनि कुँअरि चोरी आनियो—पृ० ३४८ (५८-१)
मुक्त होते, बचते, छुटकारा पाते।
यह कुमाया जो तबहीं करते। तौ कत इन ये जियत आजु लौं या गोकुल के लोगअ उबरते-२७३८।
उद्धार पाना, मुक्त होना, छुटकारा या निस्तार पाना।
सुनि याके उतपात कौं, सुक सनकादिक भागे (हो)। बहुत कहाँ लौं बरनिऐ, पुरुष न उबरन पावै (हो)-१-४४।
बड़े भाग्य हैं महर महरिके। लै गयौ पीठि चढ़ाइ असुर इक कहा कहौं उबरन या हरि के--६०७।
[सं. उद्वारण, पा. उब्बारन]
[सं. उद्वारण, पा. उब्बारन]
मिलहु लोकपति छाँडि कै हरि होरी। है नाहिं उवरिबो निदान अहो हरि होरी हैं।--२४१५।
उद्धार, मुक्ति या छुटकारा पाओगे।
उनकैं क्रोध भस्म हूँ जैहौ, करौ न सीता चाउ। तब तुम काको सरन उबरिहौ, सो बलि मोहिं बताउ----९-७८।
मुक्त हुई, उद्धार हुआ, रक्षा हुई, बची।
(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी। सुमिरत पट को कोट बढ्यौ तब, दुखसागर उबरी-१-१६।
(ख) सूरदास प्रभु सों यों कहियो केला पोष सँग उबरी बेरि३२५८।
(ग) जाति स्वभाव मिटै नहिं सजनी अंतत उबरी कुबरी---३१८८।
मुक्त, जिसका उद्धार हुआ हो।
बिलग मति मानहु ऊधो प्यारे। वह मथुरा काजरि कौं उबरी जे आवै ते कारे--३१७५।
[सं. उद्बरण, पा. उब्बारण, हिं. उबरना]
(क) बड़े भाग्य हैं नंद महर के, बड़ भागिनी नंदरानी। सूर स्याम उर ऊपर उबरे, यह सब घर-घर जानी--१०---५३।
(ख) तात कहि तब स्याम दौरे, महर लियौ अँकवारि। कैसैाँ उबरे बृच्छतर तैं सूर है बलिहारी----३८७।
बच जायँ, मुक्त रहें, निस्तार पा जायँ।
कैसहुँ ये बालक दौउ उबरेँ, पुनि पुनि सोचति परी खभारे–५९५।
[हिं उबरना] बच जायँ, मुक्त रहें, निस्तार पा जायँ।
कैसहुँ ये बालक दौउ उबरेँ, पुनि पुनि सोचति परी खभारे–५९५।
उद्ध र पा सकता है, मुक्त हो सकता है, छूट सकता है निस्तार पा सकता है।
(क) सूरदास भगवंत. भजन करि, सरन गए उबरै-१०-३७। (ख) इहिं कालिकाल-ब्याल-मुखग्रसित सूर सरन उबरै-१-११७।
रक्षित रहेगा, बच जायगा, छुटकारा पा जायगा।
(क) रे मन, राम सोैं करि हेत। हरि-भजन की बारि करि लै, उबरेै तेरौ खेत-१-३११।
(ख) सुनत धुनि सब ग्वाल डरपे अब न उबरै स्याम। हमहिं बरजत गयौ, दे्खौ, किए कैसे काम---४२७।
जिसका कोई पार न पा सके, जो समझ में न आए, दुर्बोध।
(क) मनसा और मानसी सेवा दोउ अगाध करि जानौं-१-२११।
(ख) ऐसी कहि मोहिँ कहा सुनावत तुम को यही अगाध---११२७।
(ग) सूरज प्रभु गुन अथाह धन्य धन्य श्री प्रिय नाह, निगमन कौ अगाध सहसामन नहिँ जानैं---२५५७।
(ध) के सी अव पूतना निपाती लीला गुननि अगाध--२५८०।
(ङ) रसना रटत सुनते ज स स्रवनन इतनी अगम अगाध-२७७८।
अपार, असीम, अत्यंत, बहुत।
पोड़स सहस नारि सँग मोहन कीन्हो सुख अगाध-१८३८।
(क) जननी निरखि चकित रही ठाढ़ी दंपति-रूप अगाधा-७०५।
(ख) भृकुटी धनुष नैंन सर सीधे बदन बिकास अगाधा--१२३४।
जो समझ में न आवे, अदभुत, विचित्र। थाह या अनुमान से परे।
मोकौं संग बोलि तू लेती करनी करी अगाधा--१४७९।
(क) करिहै कहा अक्रूर हमारौं दैहै प्रान अगाधो-२५०८।
(ख) सूरदास राधा बिलपति है हरि कौ रूप अगाधौ--२७५८।
दुख आवन कछु अटक न मानत सूनो देखि अगार--२८८८।
भली करी हरि माखन खायौ। इहौ मान लीन्ही अपने सिर उबरो सो ढर कायौ-११२८।
निस्तार पाओगे, छूटोगे, बचोगे, उद्धार पाओगे।
अपनौं पिंड पोषिबे का रन, कोटि सहज जिय मारे। इन पापनि तैं क्यों उबरौगे, दामनगीर तुम्हारे-१-३३४।
मुक्त हुआ, रक्षित, रहा, उद्धार या निस्तार पाया।
(क) गाए सूर कौन नहिं उबरयौ. हरि परिपालन पन रे-१-६६।
(ख) उबरयौ स्याम, महरि बड़भागी। बहुत दूर, तैं आइ परयौ धर, धौं कहुँ चोट न लागी-१-७९।
मारे मल्ल एक नहिं उबरयौ-२६४३।
काम न आया, बाकी बचा शेष रहा।
(क) फोरि भाँड़ दधि माखन खायौ, उबरयौ सो डारयौ रिस करिकै---१०-३१८।
(ख) माखन खाइ, खवायौ ग्वालिन, जो उबरयौ सो दियौ लुढ़ाई-१०-३०३।
[सं. उद्वहनी, पा. उब्बहन = ऊपर उठना]
शस्त्र उठाना, शस्त्र खींचना।
[सं. उद्वहनी, पा. उब्बहन = ऊपर उठना]
[सं. उद्धारण, हिं.उद्धार]
उद्धार, निस्तार छुटकारा, बचाव, रक्षा।
(क) अब उबार नहिं दीसत कतहूँ सरन राखि को ले इ-५२८।
( ख) यासौं मेरो न उबार। मोहि मारि मारे परिवार--५८५।
(ग) झरझराति भहराति लपट अति देखियत नहीं उबार ५९३।
उबारने वाले, उद्धारकर्त्ता।
सत-उबारन, असुर-सँहारन दूरि करन दुख-दंदा-१०-१९२।
उद्धार, करना रक्षा करना, मुक्त करना।
[सं. अब, पा. औ + सं. इष्ट, पा. इट्ट = ओइटठ]
अरुचि हो जाना, मन भर जाना।
सुठि मोती लाड़ मीठे। वेै खात न कबहुँ उबीठे---१०-१८३।
[हिं.उ = नहीं + सं. उपानह = जूता]
उद्धार या मुक्त करके, रक्षा या विस्तार करके।
करि बल-बिगत उबारि दुष्ट देैं, ग्राह ग्रसत बैकुंठ दियौ-१-२६।
उद्धार किया, रक्षा की मुक्त किया, बचाया।
द्रुपद-सुता जब प्रगटपुकारी। गहत चीर हरि-नाम उबारी-१-२८।
उद्धार किया, रक्षा की, मुक्त करे, छुड़ाये |
(क)लाखागृह तैं जरत पांडु सुत बुधि-बल नाथ, उबारे-१-१०।
(ख) तुम्हारी कृपा बिनु कौन उबारे-१-२५७।
उद्धार करें, छुटकारा दिलाएँ, बचाएँ।
गाइ मिलि अंध दसकंध, गहि दंत तृन, तौ फलैं मृत्युमुख तैं उबारैं-९-१२९।
उद्धार करे, मुक्ति दे, छुट का रा दे।
दुहुँ भांति दुख भयौ आनि यह, | कौन उबारेै प्रान-१-९७।
कंस बस कोै नास करत है, कहँ लौं जीव उबारोैं-१०-४।
उद्धारो, छुड़ाओ, निस्तरो, मुक्त करो। द.-अब मोहि भज्जत क्यौं न उबारोै। दीनब धु, करुनामय, स्वामी, जन के दुःख निबारौ-१.२०९।
मुक्त किया, उद्धार किया, रक्षा की।
(क) सरन गए को को न उबारयो। जब जब भीर परी संतनि कोैं, चक्र सुदरसन तहाँ सँभारयौ-१-१४।
(ख) ततकालहिं तब प्रगट भए हरि, राजा जीव उबारयौ--१-१०९।
[सं. उदिभदन, अथवा उद्भरण, प्रा. उब्भरण]
प्रकट होना, उत्पन्न होना।
[सं. उदिभदन, अथवा उद्भरण, प्रा. उब्भरण]
[हिं. उभार + औहाँ (प्रत्य.)]
हाथ पैर पटकना और सिर हिलाना जिससे सिर पर भूत आना समझा जाता है।
अधिक, बहुत, ज्यादा, अपार।
पारथ तिय कुरुराज सभा में बोलि करन च है नंगी। स्रवन सुनत करुना-सरिता भए, बढ़यौ बसन उमंगी----१-२१।
[हिं. उमंग +ना (प्रत्य.)]
उमड़ी हुई, उमड़ कर प्रवाहित होती हुई।
उमँगी प्रेम-नदी छबि पावैं। नंद नंदन सागर कौं धावैं--१०-२।
[हिं. उमंग + ना (प्रत्य.)]
उमड़ने लगे, उमड़ चले, बह चले।
सूरदास उमँगे दोउ नैना, सिंधु-प्रवाह बह्यौ--१-२४७।
[हिं. उमंग + ना (प्रत्य.)]
आनंदित होकर, हुलास से भरकर।
उमँगे लोग नागर के निरखत, अति सुख सबहिनि पाइ-९-२९।
[हिं. उमग + ना (प्रत्य.) = उमगना]
उमड़े, उभड़े, उमड़ कर बह चले।
उमँगै प्रेम नैन ह्वैके, कापे रोक्यौ जात जरी-१०-१३६
मनु उभैं अंभोजभाजन, लेते सुधा भराइ----६२७।
[सं. उद् = ऊपर +मंग =चलना, हिं. उमंग]
(क) उमँगो ब्रजनारि सुभग, कान्ह वरष-गाँठउमँग, चहत बरष बरषनि--१०-९६।
(ख) बसे जाय आनंद उमँग सौं गैयाँ सुखद चरावेैं।
[सं. उद् = ऊपर +मंग =चलना, हिं. उमंग]
[सं. उद् = ऊपर +मंग =चलना, हिं. उमंग]
[हिं. उमंग + ना (प्रत्य.)]
[हिं. उमंग + ना (प्रत्य.)]
सोल्लास, हुलास-सहित, जोश में आकर।
(क) भ्रातमुख निरखि राम बिलखाने। मुंडित केस-सीस बिहवल दोउ, उमँगि कंठ लपटाने-९-५२।
(ख) आनंद भरी जसोदा उमँगि अँग न माति, आनंदित भई गोपी गावति चहर के---१०-३०।
भरत गात सीतल ह्वै आयौ, नैन उमँगि जल ढारे। सूरदास प्रभु दई पाँवरी, अवध पुरी पग धारे-९-५४।
तलुए को जोर देकर किसी वस्तु को दबाना, हुमचना।
चकृत भई बिचार करत यह बिसरि गई सुधि गात। उमवि जात तबही सब सकुचति बहुरि मगन ह्वै जाति। सूर स्याम सौं कहौं कहा यह कहत न बनत लजाति-११९०।
फिरि फिरि उझ कि झाँकत बाल। बह्नि-रिपु की उमड़ देखत करत कोटिन ख्याल--सा० ३४।
द्रव पदार्थ के अधिक होने से बह चलना।
आवेशयुक्त होना, क्षुब्ध होना।
(द्रव की बहुतायत के कारण ) ऊपर उठकर, उतराकर।
हा सीता, सीता कहि सियपति, उमड़ि नयन जल भरि-भरि ढारत--९-६२।
द्रव पदार्थ अधिक भर जाने से बह चली।
फैलकर, चारों ओर छा कर, धिरकर।
अति आनंद भरे गुन गावत उमड़े फिरत अहीर---९२०।
सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै, सूखेै, खेह उड़ाइ--१०-२६५।
अब हौं कौन को सुख हेरौं ? रिपु-सैना-समूह-जल उमड़यो, काहि संख लै फे हैं-९-१४६।
मतवाला होता है, उन्मत होता है।
प्रतिष्ठित व्यक्ति, सरदार। दरबारी।
असुरपति अति ही गर्व धरयौ।…..। महा महा जो सुभट दैत्यबल बैठे सब उमराव। तिहूँ भुवन भरि गम है मेरौ मो सम्मुख को आव---२३७७।
[सं. उन्मंथन, प्रा. उम्महन अथवा। सं. उद् + मह = उभड़ना]
(द्रव पदार्थ को अधिकता के कारण ) बहना, उमड़ना।
[सं. उन्मंथन, प्रा. उम्महन अथवा। सं. उद् + मह = उभड़ना]
[सं. उन्मंथन, प्रा. उम्महन अथवा। सं. उद् + मह = उभड़ना]
का यह सूर अजिर अवनो तनु तजि अगास पिय भवन समैं हौं-१२०७।
[सं. अग्नि, हिं. अगि याना]
और कवन अबलन ब्रत धार्यौ जोग समाधि लगाई। इहि उर आनि रूप देखे की आगि उठै अगि आई-३३४३।
[सं.:अ = नहीं + हिं. गिनना]
साँव कौ लक्ष्मण सहित लाए बहुरि दियो दायज अगिन गिनी न जाइ-१० उ. ४६।
(द्रव पदार्थ की अधिकता से) बह चला, उमड़ा।
नहिं स्रुति सेस महेप प्रजापति जो रस गोपिन गायौ। कथा गंग लागी मोहि तेरी उहि रस सिंधु उमहायो-३४९०।
उमंग में भर गयी, आवेश युक्त हो गयी।
(क) सिर मटुकी मुख मौन गही। भ्रमि-भ्रसि बिबस भई नव ग्वालिन नवल कान के रस उमही---१२१३।
पालगौं तुमही बूझत हौं तुम पर बुधि उमही---३३७०।
सघन बिमान गगन भरि रहे। कौतुक देखन अम्मर उमहे--१८ १९।
उमंग में आती है, आवेश युक्त हो जाती है।
(क) पहिले अग्नि सुनत चन्दन सी सती बहुत उमहै। समाचार ताते अरु सीरे पीछे जाइ लहै-२७१३।
(क) आनंद अति सेै भयौ घर-घर, नृत्य ठाँवहि-ठाँई। नंद-द्वारे भेंट लै लै उम ह्यौ गोकुल गाँव--१०-२६।
(ख) उमह्यौ मानुष घोष यों रंग भीजी ग्वालिनि---२४०५
मदन गुपाल मिलन मन उमह्यौ कौन बसै इह यदपि सुदेस--३२२५।
उमड़ पड़ा, उतरा कर बह चला
तौलोैं भार तरंग महँ उदधि सखी लोचन उमह्यौ-३४७०।
[सं. उ = नहीं + मंक = जाना]
यहै कहहिं पति देहु उमापति गिरिधर नन्दकुमार---७६६
[सं. उद् + माह = उमगाना, उत्साह करना]
ब्रज घर घर अति होत कोलाहल। ग्वाल फिरत। उमँगे जहँ तहँ सब अति आनन्द भरे जु उमाहल।
भामिनि आजु भवन में बैठी। मानिक निपुन बनाय नीकन में धनु उपमेय उमेठी-सा० ११२।
अंगदान बल कों दे बैठी। मन्दिर आजु आपने राधा अन्तर प्रेम उमेठी-सा० १००।
[सं. उद्गमन, पा. उग्गवन, हिं. उगना]
नँदनँदन मुख देखौ माई। अंग-अंग छबि मनहू उये रवि, ससि अरु समर लजाई-६२६।
(क) भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर बोले बचन सकल सुखदाई-१-३।
(ख) दनुष दरचौ उर दरि सुरसाँई-१-६।
उर आनना या लाना :- छाती से लगाना, आलिंगन करना। लियो उर लाई--छाती से लगा लिया। उ.- महाराज कहि श्री सुख लियो उर लाई--२६१९।
उर आनना या धरना :- ध्यान करना, विचारना।
उर धरना :- ध्यान में रखना।
उर धरी :- मन में सोचा, निश्चय किया। उ.- सदा सहाय करी दासिन की, जो उर धरी रोइ प्रति पारी-११६०।
भई रीति हठि उरग छछूँदर :- साँप छछूँदर की गति होना, दुविधा या असमंजस में पड़ना। उ.- जब वह सुरति होति है बात। सुनौ मधुप या वेदन की रति मन जानेै केै गात। रहत नहीं अंतर अति राखे कहत नहीं कहि जात। भई रीति हठि उरग छछूँदर छाँडै बनै न खात-३१२७।
वेणी, चोटी, (क्योकि इसकी उपमा साँप = उरग से दी जाती है।)
हरि उर मोहनि बेलि लसी। तापर उरग ग्रसित तब सोभित पूरन अस ससी-सा. उ. २५।
उरग-इंद्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजै-१-६९।
सूर-प्रभु के बचन सुनत, उर गिनी कह्यौ, जाहि अब क्यौं न, मति भई भरनी-५५१।
(क) दै दै दगा बुलाइ भवन मैं भुज भरि भेंटत उरज कठोरी-१०-३०५।
(ख) उरज भँवरी भँवर मोन मीन मनि की कांति--१४१६।
मन चुभि रही माधुरी मूरति अंग अंग उरझाई-३३ १७।
उलझ गया, फँसा, लिप्त हुआ।
नवकिसोर मोहन मृदु मूरति तासौं मन उरझानौ-३०६४।
पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह सिबार--१-९९।
मोह्यौ जाई कनक-कामिनि-रस ममता-मोह बढ़ाई। जिह्व-स्वाद मीन ज्यौं उरझ्यों, सूझी नहीं फँदाई-१-१४७।
काम में फँस गया, लिप्त हुआ, लगा रहा।
बात-चक्र-बासना प्रकृति मिलि, तन तृन तुच्छ गह्यौ। उरझ्यौ बिबस कर्म-निरअंतर, स्रमि सुख-सरनि चह्यौ---१-१६२।
उरझे संग अग अंग प्रति बिरह बेलि की नाई--१८२१।
मूँग मसूर उरद चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
उरधारी लटैं छूटी आनन पर भीजीं फुलेलन सों आली सँग केलि।
(क) आंखैं भरि लीनी उराहनौ देन लाग्यो। तेरौ री | सुवन मेरी, मुरली लै भाग्यौ-१०-२८४।
(ख) अब न देहिं उराहनो जसुमतिहिं आगे जाइ--२७५६।
तू कहि भोजन करयौ कहा री। बेसन मिले उरस मैदा सों अति कोमल पूरी है भारी।
जसुदा भदन-गुपाल सोवायै। स्बाँस उदर उरसति (उससित) यौं मानों दुग्ध-सिंधु छबि पावै-१०-६५।
[सं. उपालंभ या अवलंभन, पा. ओलं भन, हिं. उलाहना]
[हिं. ओर + आना (प्रत्य.)]
जे पद-कमल सुरसरी परसे तिहूँ भुवन जस छाव। सूरस्याम पद-कमल परिसहाैं मन अति बढ़यौ उराव--२४८४।
[सं. अवलंबन, प्रा. ओलंबन)
[सं. उर्वी = पृथ्वी + ज = उत्पन्न]
(क) उरहन दिन देउँ काहि, काहै तू इतौ रिसाइ। नाहीं ब्रज बास, सास, ऐस बिधि मेरौ-१०-२७६।
(ख) ग्वालिनि उरहन कैं मिस आई। नंदनंदन तन-मन हरि-लीन्हौ, बिनु देखँ छिन रहयौ न जाइ १०-३०४।
(ग) वृथा ब्रज की नारि नित प्रति देइ उरहन आन--सा० १४४।
आवति सूर उरहने कैं मिस, देखि कुँवर मुसुक नी-१०-३११
नैननि झुकी सुमन मैं हँसी नागरि उरहनो देत रुचि अधिक बाढ़ी-१०-३०७।
सीताजी की छोटी बहन जो लक्ष्मण को ब्याही थीं।
अब तुम नाम गहौ मन-नागर। जातै काल. अगिनि तै बाँचौ, सदा रहौ सुखसागर-३-९१।
कट क अगिनित जुर्यौ, ल क खरभर पर्यौ, सूर कौ तेज धर-धूरि-ढाँप्यो-९,१०६।
[सं. अप्र, हिं. अगला + ऊ(प्रत्य.)]
अगला भी, भावी भी, आगामी भी।
तु पंखि पपीहा पिउ पिउ पिउ अधराति पुकारत। .......। सूर स्याम बिनु ब्रज पर बोलत हठि अगिलेऊ जनम बिगारत-२०४९।
[सं. अगीत = आगे मं. अग्र, प्रा. अग्ग +सं. इष्ट ; प्रा. इट्ठ (प्रत्य.)]
[सं. अग्रसर + ना (प्रत्य.)]
[सं. अ = नहीं + गेह = घर]
इंद्रियाँ जिसका अनुभव न कर सकें। इंद्रियातीत, अव्यक्त।
मम बानी कौं अगम अगोचर जो जानै सो पाबै--१-२।
जब रथ भयौ अदृष्ट अगोचर लोचन अति अकुलात-२५४१।
लड़ना, झगड़ नो। विवाद करना।
नाँघना, फाँदना, उल्लंघन करना।
बसुधा त्रिपद करत नहिं आलस तिन हिं कठिन भयो देहरी उलंघना---१०-११३।
नाँघना, फाँदना, पार करना।
कबहुँक तीनि पैग भुव नापत. कबहुँक देहरि उलँघि न जानी-१०-१४४।
नाँघी, फाँदी, उल्लंघन की।
घर आँगन अति चलत सुगम भए, देहरि अँटकावत। गिरि-गिरि परत, जात नहिं उलँघी, अति स्रम होत नँघावत-१०-१२५।
लौट आओ, पलट आओ, वापस आ जाओ।
अब हलधर उलटहु काह तुम धावहु ग्वाल जोर—२४४६ (३)।
उलटाकर, चित करते, पेट के बल से पीठ के बल लिटा कर।
महरि मुदित उलटाइ कै, मुख चूमन लागी-१०-६८।
बिहारीलाल आवहु आई छाक भई अबार, गाइ बहुरावहु, उलटाव हु दै हाँक-४६४।
लौटकर, उलट कर, वापस आकर, पीछे मुड़कर, घूमकर।
(क) उलटि पवन जब बावर जरिंयौ, स्वान चल्यो सिर झारी-१-२२१।
(ख) जैसे सरिता मिलै सिंधु को उलटि प्रवाह न आवैहो-२८०४।
(ग) हम रुचिकरी सूर के प्रभु सौं दूजे मन न सुहाइ। उलटि जाहि अपने पुर माहीं बादिहि करत लराई–३ ११०।
(घ) जाइ समाइ सूर वा निधि मैं, बहुरि न उलटि जगत मैं नाचै--२-११।
ऊपर नीचे होकर, उलट पलट कर।
नृत्यत उलटि गए अँग भूषण बिथुरी अलक बाँधौ सँवारि-पृ० ३५२ (८४)।
ससि-सन्मुख जो धूरि उड़ावै, उलटि ताहि के मुख परै--१-२३४।
क्रम-विरुद्ध, इधर का उधर।
(क) इंद्री अजित ,बुद्धि बिषया रत, मन की दिन-दिन उलटी चाल-१-१२७।
(ख ) हँसति रिसाति बोलावति बरजति देखहु उलटी चालहि-११८१।
(ग) अब समीर पावक सम लागत सब ब्रज उलटी चाल-३१५५।
लौटकर, पीछे की ओर, पलटकर।
जमुना उलटी धार चली बहि पवन थकित सुनि बेनु----पृ० ३४७ (५३)।
उलटी परी :- आशा के विरुद्ध हुआ, दूसरे को हानि पहुँचाने के प्रयत्न में स्वयं हानि उठायी या स्वय नीचा देखा। उ.-अंबरीष को साप देन गयौ बहुरि पठायौ ताकौं। उलटी गाढ़ परी दुर्बासैं दहत सुदरसन जाकौं-१-११३।
उलटी-पलटी :- भली-बुरी, उचित-अनुचित। उ.- तब उलटी पलटी फबी जब सिसु रहे कन्हाई। अब उहि कछु धोखैं करौं तौं छिनक माँह पति जाई---१०१०।
उलटी-पुलटी :- अंड-बंड, बिना ठीक-ठिकाने। उ.- तुमहिं उलटी कहाै तुमहिं पुलटी कहौ, तुमहिं रिस करति मैं कछु न जानौं।
(क) हँसे तात मुख हेरि कै, करि पगचतुराई। किलकि झटकि उलटे परे, देबनि मुनिराई १०-६६।
(ख) स्याम उलटे परे देखे,बढ़ी सोभा लहरि-१०-६७।
पीछे करके, पीठ की ओर मोड़ कर।
पलना पौढ़ाई जिन्हैं बिकट बाउ काटै। उलटे भुज बाँधि तिन्हैं लकुट लिए डाँटै--३४८।
[हिं. उलटा + ही (प्रत्य.)]
विपरीत, अयुक्त, अनुचित, विरुद्ध।
उलटोइ ज्ञान सकल उपदेसत सुनि सुनि हृदय जरै-३३११।
एक पाख त्रय मास कौ मेरौ भयौ कन्हाई। पटकि रान उलटौ परयौ, मैं करौं बधाई-१०-६८।
उलटा हो गया, पीछे की ओर चला।
अतिं थकित भयौ। समीर। उलटयौ जु जमुना-नीर-६२३।
गिराता है, लौटाता हैं, बरसाता है।
[सं. अवलंबन, पा. ओलंबन = लटकना]
[सं. उपालंभन, प्रा. उवाहन]
उचीलती है, पानी फेंकती है।
चिरिया कहा समुद्र उलीचै--१-२३४।
ढरकांना, एक पात्र से दूसरे में ढालना।
गारी होंरी देत दिवावत। ब्रज में फिरत गोपिकन गावत। रुकि गए बाहन नारे पैंड़े। नवकेसर के माट उलेड़े।
पालन न करना, नीति-विरुद्ध आचरण।
हो चाहे तासो सब सीख रसबप रिझवो कान। जागि उठी सुन सूर स्याम संग का उल्लाम बखान-सा ०-६८।
एक अलंकार जिसमें एक के गुण-दोष से दूसरे में गुण-दोष आना वणिंत हो।
प्रकट करना, प्रकाशित करना।
अंग में लगाया, शरीर में मला।
चदन और अरगजा आन्यो। अपने कर बल के अँगवान्यो-२३२१।
खंडित अंग का, लँगड़ा-लूला।
मनौ गिरिवर तैं आवति गंगा। राजति अति रमनीक राधिका यहि बिधि अधिक अनूपम अंगा १०-१९०५।
नख सिखे लौं मीन जाल जड़यो अंग-अंगा-९-९७।
मोटी रोटी या रोट (अंगकरी) बड़ी लीटी।
पद-नख-चन्द-चकोर विमुख मन, खात अँगार मई-१-२९९।
(क) उचटत भरि अंगार गगन लौं, सूर निरखि ब्रज जन बेहाल-५९४।
(ख) अति अगिनि-झार, भंभार धुंधार करि, उचटि अंगार झंझार छायौ-५९६।
[सं. अंगिका, प्रा. अँगिआ]
[सं. अग्र = हिं. ओट = आड़]
नहसुत कील कप ट सुलक्षण दै दृग द्वार अगोट। भीतर भाग कृष्ण भूपति कौ राखि अधर मधु मोट--२२१८।
[सं. अग्र = हिं. ओट = आड़]
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग+ हिं. ओट + ना (प्रत्य.)]
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग+ हिं. ओट + ना (प्रत्य.)]
पहरे में रखना, बंदी करना।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग+ हिं. ओट + ना (प्रत्य.)]
[सं. अंग = शरीर + हिं. ओटना (प्रय.)]
[सं. अंग = शरीर + हिं. ओटना (प्रय.)]
रुकी हुई, फँसी हुई, उलझी हुई।
दोउ भैया मैंया पै माँगत, दै री मैया, माखन-रोटी। सुनत भावती बात सुतनि की, झूठहिं धाम के काम अगोटी-१०-१६५।
एक अलंकार जिसमें एक वस्तु या व्यक्ति का अनेक रूपों में दिखायी पड़ना वर्णित हो।
मुरली मधुर बजावहु मुख ते रुख जनि अनतै फेरो। सूरज प्रभु उल्लेख सबन को हौ पर पतनी हेरो-सा ० ८।
अथवत आये गृह बहुरि उवत भान उठी प्राननाथ महाजान मनि जानकी---१६०९।
वाणासुर की पुत्री जो अनिरुद्ध को ब्याही थी।
धर बिधमि नल करत किरषि हल, बारि बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सील उष्न कौं सौई सुफल करै-१-११७।
सघन कुंज ते उठे भोर ही स्याम घरे। जलद नवीन मिली मानों द मिनी बरषि निसा उसरे।
गोरे गात उस सत जो असित पट और प्रगट पहिचानै। नैन नि कट ताटंक की सोभा मडल कवनि बखानै।
साँस लेकर, दम लेकर, साँस से फूलकर।
स्वास उदर उससित यौं मानौं दुग्ध सिंधु छबि पावै--१०-६५।
खोदना, तैयार करना, बनाना।
नवग्रह परे रहैं पाटी-तर, कपहिं काल उसारौ। सो रावन रघुनाथ छिनक मैं, कियौ गोध | कौ चारौ--१-१५९।
लंबी साँस, ऊपर को चढ़ती हुई साँस।
(क) गइ सकल मिलि संग दूरि लौं, मन न फिरते पुर–बाँस। सूरदास स्वामी के बिछुरत, भरि भरि लेत उसास-९:४५।
(ख) लेति उसास नयन जल भरि भरि धुकि सो परै धरि धरनी। सूर सोच जिय पोच निसाचर, रामनाम की सरनी-९-७३।
(ग) त्रिजटी बचन सुनत बैदेहो अति दुख लेति उसास--९-८३।
कबहुँक आगे कबहुँक पाछे पग-पग भरत उसासी-१८१२।
सूरस्याम सुन्दर रस अटके हैं मनो उहँइ छएरी---सा ० उ० ७।
उहाँ जाइ कुरु-पति बल-जोग। दियौ छाँड़ि तन को संजोग १-२८४।
(क) दच्छ तुम्हारौ मरम न पायौ जैसाै कियौ सो तैसो पायौ। अब इहिं चाहियै फेरि जिवायौ-४५।
(ख) एक बिटिनियाँ सँग मेरे ही, कारैं खाई ताहि तहाँ री।…...। कहत सुन्यौ नंद कौ यह बारौ, कछु पढ़ि कै तुरतहिं उहिं झारी-६९७।
जसुमति बाल विनोद जानि जिय, उहीं ठोर लै आई-१०-१५७।
फन-फन-निरतत नद नंदन।…...। उहै काछनी कटि, पीतांबर, सीस मुकुट अति सोहत---५६५।
देवनागरी वर्णमाला का छठा अक्षर। ओष्ठय वर्ण।
झपकी लेना, नींद में झूमना।
अंबरीष, प्रह्नद, नृपति बलि, महा ऊँच पदवी तिन पाई-१-२४।
ऊँच नीच हरि गिनत न दोइ-९-२।
ऊपर की ओर का विस्तार, उठान।
स्रवन सुनाइ गारि दै गावति ऊँची तानि लेति प्रिय गोरी २४४८ (२)।
सतगुरु कौ उपदेस हृदय धरि निज भ्रम सकल निवारयौ। हरि भजि, बिलँब छाँड़ि सूरज सठ, ऊँचैं टेरि पुकारचौ-१-३३६।
लंबे, बड़े, देर तक खिंचने वाले।
उर ऊँचे उसाँस तृणावर्त तिहि सुख सकल उड़ाइ दिये-३०७३।
भूमुतत्रिय तलफत सफरी भौ वार हीन तन हेरो। ‘सूरज' चितै नीच जल ऊचो लयौ बिचित्र बसेरौ---सा० ४२।
ऊँछ अड़ाने के सुर सुनियत निपट नायकी लीन। करत बिहार मधुर केदारौ सकल सुरन सुख दीन।
एक ऊंचा चौपाया जो रेगिस्तानो में सर्वंत्र होता है और जिसके बिना वहाँ के निवासियों का काम कदाचित चल ही नहीं सकता। भारी बोझ लादने के यह काम आता है। कवियों ने ऐसे लोगों की उपमा इससे दी है जो नीरस जीवन का भार भर ढोया करते हैं, कोई सार्थक काम नहीं करते।
सूरदास भगवत भजनबिनु मनौ ऊँट बृष-भैंसों--२-१४।
[हिं. आव, बाव। सं. वायु = हवा]
जनम गँवायौ ऊआबाई। भजे न चरन कमल जदुपनि के, रह्यौ बिलोकत छाई---१-३२८।
हृदय जरत है दावानल ज्यों कठिन बिरह की ऊक।
हरि-स्वरूप सब घट यौं जान्यौ। ऊख माहिं ज्यौं रस है सान्यौ ३-१३।
और दिनन ते आजु दहो हम ऊखा ल्याई। देखत ज्योति बिलास दई मुख बचन डिठ'ई-११४१।
मानिक मध्य पास चहुँ मोती पंगति पंगति झलक सिंदूर। रेंग्यौ जनु तम तट तारागन ऊगत घेरेयौ सूर--१८९६।
उजड़ा हुआ सूनसान, बिनाँ बसा हुआ।
ज्यों ऊसर खेरे के देवन को पूगै को मानै। त्यों हम बिनु गोपाल भए ऊधो कठिन प्रीति को जानै-३३०६।
उत्सहित होना, उमंग में आना।
बेढंगा, बेमेल, टेढ़ा-मेढ़ा।
[स. ऊह = सं.देह पर विचार]
सोचविचार करना, अटकल लगाना।
वह परकीया नायिका जो पति को छोड़ कर किसी अन्य से प्रेम करे।
जिसके पुत्र न हो, निपूता।
बाट जोहना, प्रतीक्षा करना।
[सं. अग्र = आगे, हिं. अगोर ना]
मेरे नैनन ही सब खोरि। स्याम बदन छबि निरख जु अट के बहुरे नहीं बहोरि। जो मैं कोटि जतन करि राखति घूँघट ओट अगोरि। पृ. ३३३।
[सं. अग्र, प्रा. अग्ग हिं. अगवानी]
जठर | अग्नि कौ व्यापै ताव-३-१३।
स्वयंभू मनु के आत्मज राजा प्रियव्रत का पुत्र।
ब्रह्मा स्वयंभुव मनु जायौ। तातै जन्म प्रियव्रत पायौ। प्रियव्रत के अग्नी ध्र सु भयौ-५-२।
मैं अग्यान अकुलाइ, अधिक लै, जरत माँझ घृत नायौ-१:१४५।
उपद्रव, उत्पात हल्ला-गुल्ला।
श्रीकृष्ण के सखा ए यादव जिन्हें ज्ञान का गर्व था और जो गोपियों क ज्ञानोपदेश देने गये थे।
भेड़ बकरी के रोएँ जिसे गरम कपड़े बनते है।
(क) भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर बोले बचन सकल सुखदाई--१-३।
(ख)-मेरे हेत दुखी तू होत। कै अधर्म तो ऊपर होत-१-२९०।
(ग) तुव ऊपर प्रसन्न मैं भयौ-९-३।
(घ) दूत पठाइ देहु ब्रज ऊपर नन्दहिं अति डरपावहु--५२२।
प्रकट में, प्रत्यक्ष में।
ऊपर (से) :- इसके अतिरिक्त. इसके साथ-साथ। उ.- जय अरु विजय कर्म कह कीन्हौ, ब्रह्म सराप दिवायौ। असुर-जोन ता ऊपर दीन्हीं धर्मउछेद करायौ-१-१०४।
ऊपर ऊपर :- बिना किसी को बताये या जताये।
नँदनँदन लै गए हमारी अब ब्रज कुल की ऊब। सूर स्याम तजि और सूझे ज्यों खेरे की दूब--३३६१
[सं. उद्= बुरा + बत्र्म, प्रा. बट्ट == मार्ग]
जो समतल न हो, ऊँचा नीचा, अटपट।
[सं. उद्वेजन, पा. उब्बिजन, पु. हिं. उबियाना]
मुक्त हुई, बच गयी, छुटकारा पाँ गयी।
बड़ी करबर टरी, साँप सौं उबरी, बात कैं कहत तोहिं लगति जरनी-६९८।
ऊबड़-खाबड़ मार्ग, कुमार्ग।
उठीं, उमड़ पड़ीं. खडी हुई।
करुन करति मँदोदरि रानी। चोदहमहम सुन्दरी ऊभी (उमद्दीं) उठै न कंत महा अभिमानी-९-१६०।
उमड़ना, उमगना है ऊमर, ऊमरि संज्ञा पुं०[सं० उदुंबर) गूलर।
चारु कपोल पीक कहाँ लागी ऊरज पत्र लिखाई--२१२९।
(क) ऊरध स्वाँस चरन गति थाक्यो, नैनन नीर न रहाई-२६५०।
(ख) परी रहत ना कहत कबहूँ कछु भरि भरि ऊरध श्वाँस-सा ०.२६।
अदभुत राम नाम के अक।….। मुनि मन-हंस-पच्छ-जुग जाकैं बल उड़ि ऊरध जात----१-९०।
इंद्रियों को वश में रखनेवाली, ब्रह्मचारी।
एक काव्यालंकार जिस में सहायकों के रहने पर भी उत्तम बने रहने या घमंड न रहने का वर्णन रहता है।
ऊर्जस्वल, ऊर्जस्वित, ऊर्जस्वी
ऊर्जस्वल, ऊर्जस्वित, ऊर्जस्वी
कहा पुरान जु पढ़े अठारह, ऊध्र्व धूम के घूँटै --२-१९।
दसवाँ द्वार, ब्रह्मरंध्र।
भुजा उठाये रह कर तप करने वाले तपस्वी।
इन्द्रियों को वश में रखने वाला, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय।
वाणासुर की कन्या जो अनिरुद्ध को ब्याही थी।
श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध।
वह भूमि जिसमें रेह की अधिकता के कारण कुछ न ज मे
( क) एक अंश पृथ्वी कौं दयौ। ऊसर तामैं तातैं भयौ-६-५।
(ख) या ब्रज को बसिबौ हम छाँड़यौं सो अपनैं जिय जानी। सूरदास ऊसर की बरषा थोरे जल उतरानी-१०-३३७।
देवनागरी वर्णमाला का सातवाँ स्वर। इसका उच्चारण स्थान मूर्द्धा है।
हान दिनपति सीस सोभा रंच राजत आज। सूर प्रभु अग्यान मानो छपी उपमा साज-स ० २।
हरि जब हिरन्याच्छ कौं मारयौ। दसन अग्र पृथ्वी कौं धारयौ--७-२।
(क) निधरक भयौ चल्यौ ब्रज आवत अग्र फौजपति मैन-२८१९।
(ख) दसनराज जो महारथी सो आवत अग्र अनूपसा। ० ८२।
(क) बहुत श्रेय पुन कुंत अग्र में नीतन सो रंग सारो---सा ० ८३।
(क) कुंत अग्र गज औ नीकन में ऑपुन ही ते देहैं---सा ० ९७।
अगला, प्रथम, श्रेष्ठ, उत्तम।
आगे करके, सामने रखकर, ओट लेकर।
मधुकर काके मीत भए। दिवस चारि करि प्रीति सगाई, रस लै अनत गए। डहकत फिरत आपने स्वारथ पाखंड अग्र दए। चाड़ सरे पहिचानत नाहिंन प्रीतम करत नए-५१२।
आगे से, पहिले ही से, अभी से।
याहि मारि तोहिं और बिवाहौं अग्र सोच क्यों मरई-१० ४।
नक्षत्रों का राजा चंद्रमा।
ब्रज सुन्दरि नहिं नारि ऋचा स्रुति की सब अहिं-१८५१
ऋच्छराज वह मनि तासों लै जांबवती को दीन्हीं १०-३०-२६।
प्रकृति की स्थिति के अनुसार वर्ष के विभाग।
ऋतु के अनुसार खानपान की व्यवस्था।
सबै कूर मोसौं ऋन चाहत कहौ कहा तिनौदीजै-१-१९६।
जौ पै नाहीं मानत प्रभु बचन ऋन। तौ का कहिए सूर स्याम सिन-३ ३९४।
उपकार माननेवाला, उपकृत, अनुग्रहीत।
गर्भ देवकी के तन धरिहौं जसुमति कों पय पीहौं। पूरब तप बेहु कियो कष्ट करि इनको बहुत ऋनी हौं।----११८३।
संगीत के सात स्वरों में से दूसरा।
राजा नाभि के पुत्र जो विष्णु के चौबीस अवतारों में माने जाते हैं।
वेदमंत्रों को प्रकाश करने वाला।
देवनागरी वर्णमाला का आठवाँ स्वर। 'अ' और 'इ' के संयोग से बना है। कंठ और तालु से इसका उच्चारण होता है।
एक अव्यय जिसका प्रयोग संबोधन के लिए किया जाता है।
(क) छाँड़त छिन में ए जो सरीर हि गहि कै ब्यथा जात हरि लैन-२७६८।
(ख) लोचन लालच ते न टरैं। हरि-मुख ए रंग सँग बिधे दाधौं फिरैं जरैं--२७७०।
(क) आधा बका संहारन ऐई असुर सँहारन आए-२५८१।
(ख) एई माधव जिन मधु मारे--२५६८।
[सं. एष. + हिं. ऊ (प्रत्य.)]
ताही के मोहन विरहिनि को एऊ ढीठ करे-२८४१।
बैठि एकांत जोहन लगे पंथ सिव, मोहिनी रूप कब दै दिखाई-८-१०।
इकाइयों में सबसे पहली संख्या।
प्रभु कौ देखी एक सुभाई-१८।
एक ही प्रकार का, समान, तुल्य।
एकटक लागि आशा रही :- बहुत समय से आसरा बँधा था। उ.- जन्म ते एकटक लागि आसा रही विषय विष खात नहिं तृप्ति मानी-१-११०।
एक आँक (या अंक) :- पक्की बात।
एकटक :- दृष्टि गड़ाकर।
एकताक :- समान, बराबर। उ.- सखन संग हरि जेंवत छाक। प्रेम सहित मैया दै पठयो सबै बनाए हैं एक (इक) ताक-४६६।
एकतार :- (१) वि.- समान रूप-रंग-नाम का। (२) क्रि. वि.- सम भाव से।
एक एक कर :- अलग अलग, अकेले-अकेले। उ.- आजु हौं एक-एक करि टहिौं। कै तुमहीं कै हमहीं. माधौ, अपने भरोसैं लरिहौं-१-१३४।
सूर्य का रथ जिसमें एक ही चक्र माना गया है।
अपने पूर्ण अधिकार से युक्त, निष्कंटक।
[सं. एक + एव, प्रा. ज्जेव] केवल एक, एक मात्र, अकेला।
एक स्थान पर, एक ठौर एकत्र।
इतहुँ की उनहुँकी सबै जुरी एकठी कहति राधा कहाँ जाति हैरी-१५२६।
जो इकट्ठा हुआ हो जुटाया हुआ।
एकही स्थान यो समय से संबंध रखनेवाला, जो सदा न घटे।
एकनि कौं दरसन ठगै, पकनि के सँग सोवै (हो)। एकनि लै मंदिर चढ़ै, एकनि विरचि बिगोवै (हो)-१-४४।
एक ही पर श्रद्धा या निष्ठा रखनेवाला।
एक ढंग का, सदा एक-सा रहने वाला, अपरिवर्तनीय।
(क) सिसु, किसोर, बिरधौ तनु होइ। सदा एकरस आतम सोइ-७--२।
(ख) अज-अनीह-अबिरुद्ध-एकरस, यहै अधिक ये अवतारी-१०-१७१।
समान रूप-रंग का, एक सा, एक समान।
ज्वों का त्यों, जैसे का तैसा।
एक रूप ऊधो फिरि आए हरि चरनन सिर नायौ।
सायुज्य मुक्ति जिसमें जीवात्मा परमात्मा से मिल जाता है।
प्रभुजू यों कीन्हीं हम खेती।•••••••। इंद्रिय मूल किसान, महातृन-अग्रज बीज बई। जन्म-जन्म की विषय-बासना उपजत लता नई---१.१८५।
प्रतिहिं किए अघ भारे--१-२७।
मथुरा के राजा कंस का एक सेनापति अघासुर जो श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
(क) अघ-अरिष्ट-केसी काली मथि दावानलहिं पियौ--१.१२१।
(ख) अघ बक बच्च अरिष्ट केसी मथि जल तैं काढ़यो काली--२५६७।
(ग) नंद नहिं नि कंद कारन अघ संवारन धीर-सा. ९३।
[सं. अ = नहीं + घट् = होना]
जो कार्य में परिणत न हो सके।
[सं. अ = नहीं + घट् = होना]
[सं. अ = नहीं + घट् = होना]
जो ठीक न घटे, बेमेल, अनुपयुक्त।
जहँ तहँ मुनिवर निज मर्यादा थापी अघट अपार।
[सं. अ = नही + घट = घटना कम होना, अघट == जो कम न हो = पूर्ण + उपमा]
अलुप्तोपमा, पूर्णोपमा अलंकार। वह अलकार जिसमें उपसा के चारों अंग उपमान, उपमेय, साधारण धर्म और वाचक शब्द वर्तमान हों।
सूरस्याम सुजान सुकिया अघट उपमा दाव-सा, १।
[सं. एक + हिं. ही (पत्य.)]
सूरदास कंचन अरु काँचहिं. एकहिं धगा पिरोगै -१-४३।
एक स्थान से सम्बन्ध रखनेवाला, एकदेशीय।
प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि। इस दिन वैष्णव मतावलम्बी व्रत रखते हैं।
ग्यारह का संख्याबोधक अंक।
ग्यारहवीं राशि अर्थात कुंभ। इससे अर्थ निकला उरोज, स्तन।
नवमी छोड़ अवर नहिं ताकत दस निज राखैं साल। एकादस लै मिलो बेगहुँ जानहु नवल रसाल--सा ० २९।
प्रत्येक पक्ष को ग्यारहवीं तिथि। इस दिन वैष्णव लोग अनाहार अथवा फलाहार करते हैं।
एकही, केवल एक, निश्चित रूप से यही।
(क) एकै चीर हुतौ मेरे पर, सो इन हरन चह्यौ-१-२४७।
(ख) मेरैं मात-पिता-पति-बंधू, एकै टेक हरी--१-२५४।
(क) सूरदास प्रभु बिनु ब्रज ऐसो एको पल न सुहाइ-२५३८।
(ख) सूरस्याम देखत अनदेखत बनत न एको बीर--सा. ७२।
[सं. एक + हिं. औ (प्रत्य.)]
माया देखते ही जु गई। ना हरि-हित, न तू-हित, इन मैं एकौ तौ न भई-१-५०।
नान्हीं एड़ियनि, फल बिब न पूजै-१०-१३४
पैर की गद्दी का पीछे की ओर निकला हुआ भाग।
इतना (अधिक), इतनी (अधिक मात्रा का)।
(क) कहि धौं री तोहिं क्यौं करि आवै, सिसु पर तामस एत--३४९।
इस देश का, इस देश से संबंधित।
तनक दधि कारन जसोदा एना कहा रिसाही।
इतनी ( अधिक) इस मात्रा की।
जेतिक सैल-सुमेरु धरनि मै, भुज भरि आनि मिलाऊँ। सप्त समुद्र देउँ छाती तर, एतिक देह बढ़ाऊँ--९-१०७।
इतनी, ऐसी। ( संख्या वाचक)
(क) एती करबर हैं हरी, देवनि करी सहाय। तब तैं अब गाढ़ी परी, मोकौं कछु न सुझाई-५८९।
(ख) एती के ती तुमरी उनकी कहत बनाइ बनाइ-३३३४।
इतने (अधिक, संख्या वाचक)।
गाँउ बसत एते दिवस नि मैं, आजु कान्ह मैं देखे---१०-७३०।
हौं तो कहत तिहारे हित को एते मो कत भरमत--३३८७।
इतने पर भी, ऐसा होने, पर भी।
एते पर नहिं तजस अधोड़ी कपटी कस कुचाली--२५६७।
( क ) कहत सुर बिरथा यह देही, एयौ कत इतरात--१-३११।
(ख) तनक दधि कारनै यसोदा, एतौ कहा रिसाहो।
(ग) सो सपूत परिवार चलावै एतो लोभी धृग इनही–पृ० ३२२।
[सं. अयि, हिं. हे, ऐ-+ री]
(एरी) आनन्द सौं दधि मथति जसोदा, धमकि मथनियाँ घूमै--१०-२४७।
ऐसा ही हो ( शुभाशीर्वाद)।
एव मस्तु निज मुख क ह्यौ पूरन परमानंद--१८६१।
भक्तनि | हित तुम धारी देह। तरिहैं गाइ-गाइ गुन एह--७-२।
(क) एहि थर बनी कीड़ा गज-मोचन और अनन्त कथा स्रुति गाई---१-६।
(ख) भूसुत आइगो एहि बेर-सा० ५४।
(क) एहि थर बनी कोड़ा गज-मोचन और अनन्त कथा स्रुति गाई---१-६।
(ख) भूसुत आइगो एहि बेर-सा० ५४।
समय बिचारि मुद्रिका दीजौ सुनौ मत्र सुत एहु----९-७४।
देवनागरी वर्णमाला का नवाँ स्वर। कठ और तालु से इसका उच्चारण होता है।
[पुं. हिं. हींचना, हिं. ऐंचना =खींचना]
इत-उत देखि द्रौपदी टरी। ऐंचत बसन, हँसत कौरव-सुत, त्रिभुवननाथ सरन हौं ते री-१-१५१।
अपनी रुचि जित ही जित ऐंचति इंद्रिय-कर्म-गटी। हौं तिनहीं उठि चलत कपट लगि, बाँधे नैन-पटी---१-९८।
[हिं. खींचना, पू. हिं. हींचना]
(क) नोरहू तैं न्यारौ कीनौ, चक्र नक्र-सीस छीनौ, देवकी के प्यारे लाल ऐंचि लाए थल मैं-८-५।
(ख) नीलांबर पट ऐंचि लियो हरि मनु बादर ते चांद उतारयौ–४० ७।
(ग) गहि पटकि पुहुमि पर नेक नहिं मटकियो दत मनु मृनाल से ऐंचि लीन्हे-२५९६।
टर्राती हैं सीधी तरह बात नहीं करती।
आँखियन तब ते बैर धरयौ। ....... तब ही ते उन हमहीं भुलाई गयी उतही को धाई। अब तो तरकि तरकि ऐठति हैं लेनी लेति वनाई।
भुजा ऐंठि रज-अग चढ़ायो--२६०६।
चतुराई कहाँ गई बुद्धि कैसी भई चूक समुझे बिना भौंह ऐंठी-१८७१।
जिसने मान किया हो, जो अप्रसन्न हो।
बाएँ कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे। हाँकत हरि हाँक देत गरजत ज्यौं ऐंठे-१-२३।
कुबलिया मल्ल मुष्ठिक चानूर सो होउ तुम सजग कहि सबन ऐंठयो-२६६३।
ऐंड़त अंग जम्हात बदन भरि कहत सबै यह बानी--१८५४।
अँगड़ाई लेते हैं,बदन तोड़ते हैं।
आलस हैं भरे नैन बैन अटपटात जात ऐंड़ात जम्हात जात अंग मोरि बहियां झेलि-१५८२।
बाँह उँचाइ ज़ौरि जमुहानी ऐंड़ानी कमनीय कामिनी--२११७
(क) खेलत तुल निसि अधिक गई, सुत नैननि नींद झँपाई। बदन जँभात, अग ऐंड़ावत, जननि पलोटहि पाई-१०-२४२।
(ख) कबहुँक बाँह जोरि ऐंड़ाबत बहुत जम्हात खरे---१९७४।
जिन सों कृपा करी नँदनदन सो कहे न ऐंड़ी डोलै-३०९ १।
धन-जोबन-मद ऐंडौ. ऐंड़ौ, ताकत नारि पराई। लालच-लुब्ध स्वान जूठनि ज्यौं, सोऊ हाथ न आई-१३२८।
ऐंड़ो डोलै :- इतराता फिरता है, अकड़ दिखाता घूमता है। उ.- जिन पर कृपाकरी नंदनंदन सो ऐंड़ो काहे नहिं डोलै---३०९१।
परम अनाथ, बिबेक नैन बिनु, निगम ऐन क्योँ पावै ? पग-पग परत कर्म-तप, कूपहिं. को करि कृपा बचावै-१-४८।
उदर-अर्थ चोरी हिंसा करि, मित्र बंधु सौं ल रतौ। रसना-स्वाद सिशिल, ल ट ह्व अघटित भोजन करतौ--१-२०३।
[सं. अघ = पाप + हर =हरण करने बाली]
पापों का हरण करने वाले त्रिवेणी। इसका संक्षिप्त रूप होता है ‘वेणी' जिसका दूसरा अर्थ ‘केशपाश' या चोटी होता है।
अघहर सोहत सुरन समेत। नीतन ते बिछुरो सारंगसुत कुंत अग्र ते बंदन रेख----सा, ९६।
अघासुर जो मथुरा के राजा कंस का सेनापति था और कृष्ण द्वारा मारा गया था।
अन ज्ञानत सब परे अघा-मुख-भीतर माहीं --४३१।
भोजन पान से तृप्त होती है, छकती है।
(क) माधो नैकु हटकौ गाइ…... ब्योम, धर, नद सैल, कानन इतै चरि न अघाइ--१-५६।
(ख) राजनीति जानौ नहीं, गोसुत चरवारे। पीवौ छाँछ अघाइ कै, कब के रयवारे--१-२३८।
इच्छा पूर्ण हुई, संतुष्ट या तृप्त होता है, मन भरता है।
(क) जब तै जनम-मरन अंतर हरि, करत न अबहि ई१-१८७
( ख ) किरि दरस करत एही मिसि प्रेम न प्रीति अघाई---१० ० ०।
सोभा सिंधु समाइ कहाँ लौं हृदय साँकरे ऐन-२७६५
गंग-तरंग बिलोकत नैन।…….। त्रिभुवन हार सिंगार भगबती, सलिल चराचर जाके ऐन-९-१२।
(क) निरखत अंग अधिक रुचि उपजी नख-सिख सुन्दरता को ऐन-७४२।
(ख) हौं जल गई जमुना लेन। मदन रिस के आदि ते मिल मिली गुनगन ऐन---सा० ६६।
उर काँप्यौ नन पुलकि पसीज्यौ, बिसरि गए मुख-बैन। ठढ़ी ही जैसैं तैसें झुकि, परी धरनि तिहिं ऐन-७४९।
त्रिबिधि पवन जहँ बहत निसादिन सुभग-कुंजघर.ऐनु। सूर स्याम निज धाम बिसारत, आवत यह सुख लैनु-४४८।
इहाँ रहहु जहँ जूठनि पालहु, ब्रजवासिनि कैं ऐनु। सूरदास ह्याँ की सरवरि नहिं. कल्पवृच्छ सुर-धैनु-४९१।
आतपत्र मयूर चंदिका लसति है रवि ऐनु---२७५५।
रह न सकति मुरली मधु पीवत चाहत अपनो ऐनु---२३५५।
लीन्हे फिरति रूप त्रिभुवन को ऐनोखी बैनि जारिनि-१०४०।
चावल और हल्दी से। बना एक मांगलिक द्रव्य जिसका छापा पूजा के अवसर पर दीवार, कलश आदि पर लगाते हैं।
ऐपन की सी पूतरी (सब) सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०।
अंकम भरि भरि लेत सूर-प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ---७७९।
(क) बनत नहीं जमुना को ऐवो। सुन्दर स्याम घाट पर ठाढ़े-कहौ कौन बिघि जैबो-७७९।
(ख) सूरदास अबसोई करिए बहुरि गोकुलहिं ऐवो-३३७२।
सुरगन राहित इंद्र ब्रज आवत। धवल बरन ऐरापति देख्यो उतरि गगन तैं धरनि धँसावत।
इन्द्र का हाथी जो पूर्व दिशा का दिग्गज है।
पुरूरवा जो इला का पुत्र था।
एक कँटीली लता जिसकी पत्तियाँ लगभग एक फीट लंबी होती हैं।
फूले बेल निवारी फूली एलि फूले मरुवी मोगरो। सेवती फूल बेल सेवती संतन हित ही फूल डोल--२४०५।
तृ्ना बर्त से दूत पठाए। ता पाछै कामासुर धाए। बकी पठाइ दई पहिलैहीं। ऐसनि को बलवै सब लैहीं-५२१।
(क) ब्रह्मा कह्यौ, ऐसिये होइ-१७-२।
(ख) लागे लैन नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी। सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिकसलोरी-१०-२८६।
इस प्रकार की, इस ढंग या तरह की, इसके समान।
ऐसी को करी अरु भक्त। काजैं। जैसी जगदीस जिय धरी लाजैं-१-५।
इस तरह, इस ढब से, इस ढंग के।
बिनु दीन्हें ही देत सूर-प्रभु, ऐसे हैं जदुनाथ गोसाई-१-३।
कोटि छ्यानबे नृप-सेना सब जरासँघ बँध छोरे। ऐसैं जन परतिज्ञा, राखत, जुद्ध प्रगट करि जोरे-१-३१।
फिरि फिरि ऐसोई है करत। जैसैं प्रेम-पतंग दीप सौं, पावक हू न डरत-१-५५।
ऐसा, इस प्रकार का, इसके समान।
(क) ऐसौ को जुन सरन गहे तैं कहत सूर इतरायौ-१-१५।
(ख) ऐसौ सूर नाहिं कोउ दूजौ, दूरि करै जम-दायो-१-६७।
भाग्य-भवन मैं मीन महीसुत, बहु ऐस्वर्यं बढ़ेहैं-१०८६।
इस लोक से सम्बन्ध रखने वाला, सांसारिक।
(क) काके हित नृपति ह्याँ ऐहैं, संकट रच्छा करिहैं ? १-१-२९।
(क) कैहो कहा जाइ जसुमति सो जब सनमुख उठि ऐहैं-२६५०।
(क) श्रमतैं तुम्हैं पसीना ऐहै, कत यह टेक करी---१:१३०।
(ख) सो दिन त्रिजटी कहु सब ऐहै। जा दिन चरन कमल रघुपति के हरषि जानकी हृदय लगैहै----९.८१।
(क) मन-बच-कर्म जानि जिय अपनै, जहाँ-जहाँ जन तहँ तहँ ऐहौं-७-५।
(ख) बरस सात बीतैं हौं ऐहौं-९-२।
(ग) यह मिथ्या संसार सदाई यह कहि कै उठि ऐहौं-२९२३।
क्यों रहिहैं। मेरे प्रान दरस बिनु जब सध्या नहिं ऐहौ-२६५०।
देवनागरी वर्णमाला का दसवाँ स्वर। उच्चारण ओष्ठ और कंठ से होता है। 'अ' और 'उ' के योग से बना है।
परब्रह्मवाचक शब्द। इसके 'अ' 'उ' और 'म्' वर्ण क्रमशः विष्णु, शिव और ब्रह्मा के वाचक माने जाते हैं।
चुप करि रहो मधुप लंपट तुम देखे अरु ओऊ--३३४९।
(क) सूर स्याम काली पर निरतत, आवत हैं। ब्रज-ओक--५६५।
( ख ) मारयो कंस धरनि उद्धारयाै ओक-ओक आनद भई-२६१६।
ग्रहों-नक्षत्रों का समूह।
नागरी स्याम सों कहत बानी।…...।रुद्रपति, छुद्रपात, लोकपति, ओकपति, धरनिपति, गगनपति अगम बानी।
काँड़ी, हवन, उलूखन, उखली।
[सं. ओख = वारण करना, बच ना]
पैड़ो देहु बहुत अब कीनो सुनत हँसेगे लोग। सुर हमैं मारग जनि रोकहु घर तें लीजै ओग।
[हिं. ओछा + नि (प्रत्य.)]
तुच्छ व्यक्ति क्षुद्र मनुष्य, खोटे।
ऐसे जनम-करम के ओछे ओछनि हूँ ब्याैहरात----१-१२।
नीचता छिछोरापन, क्षु्द्रता।
हमहिं ओछाई भई जबहिं तुमको प्रतिपाले। तुम पूरे सब भाँति मातु रितु संकट घाले--११३७।
ओछी बुद्धि जसोदा कीन्ही--३९१।
जो गंभीर या उच्चाशय न हो, तुच्छ, क्षुद्र, छिछोरा, बुरा, खोटा।
इन बातन कहुँ होत बड़ाई। डारत, खात देत नहिं काहू ओछे घर निधि आई।
काव्य का एक गुण जिससे सुनने वाले के चित्त में उत्साह उत्पन्न होता है।
[सं. अवरुंधन, प्रा. ओरुज्झन, हिं. ओझन]
(भार) ऊपर लेना, सहन करना।
तेजयुक्त, प्रतापो, ओजपूर्ण।
[सं. उपाध्याय, प्रा. उवज्झाओ, उवज्झाय]
[सं. उपाध्याय, प्रा. उवज्झाओ, उवज्झाय]
रोक, आड़, अतर, व्यवधान, ओझल।
(क) ना हरि-हित, ना तु हित, इनमें एकौ तौ न भई। ज्यौं भधु माखी सँचति निरन्तर, बन की ओट लई---१-५०।
(ख) बसन ओट करि कोट बिसंभर, परन न दीन्हौं झाँको---१-११३।
(ग) ममता-घटा मोह की बूंदै, सरिता मैने अपारी। बूड़त कतहुँ थाह नहिं पावत, गुरुजन ओट अधारौ--१.२०९।
(घ) पलक भरे की ओट ने सहतौ अब लागे दिन जान-२७४७।
(ङ) सगुन सुमेर प्रगट देखि यत तुम तृन की ओट दुरावत-३ ११५
(च) ललना लै लैं उछंग अधिक लोभ लागै। निरखति निंदति निमेष करत ओट आगैं-१०.९०।
(छ) सूरदास प्रभु दुरत दुराये डुँगरनि ओट सुमेरु---४५८।
(क) बड़ी है राम नाम की ओट। सरन गये प्रभु काढ़ि देत नहिं करत कृपा कैं कोट--१-२३२।
(ख) भागी जिय अपमान जा न जनु सकुच ने ओट लई---२७९१।
अपनी ही बात बार बार कहना।
स्वयं (आपत्ति, बात आदि) सहन करना।
लेहु मातु सहिदानि मुद्रिका, दई प्रीति करि नाथ। सावधान ह्वै सोक निवारहु, ओड़हु इच्छिन हाथ---९.८३
[अपने] ऊपर ले, स्वीकार कर, भागी बन जा, सहन कर।
बोल्यौ नहीं रह्यौ दुरि बानर, द्रम मैं देहि छपाइ। कै अपराध औड़ि तू मेराै, कै तूं देहि दिखाइ----९-८३।
ओड़िये नँदनंद जू के चलत ही दृगवान। राखिये दृग मद्ध दीजै अनत नाही जान----सा० १०७।
नृप भूषन कपि पितु गज पहिलो आस बचन की छोड़ै। तिथि नछत्र के हेतु सदाई महाबिपति तन ओड़ैं-सा० ४३।
ऐसो को दाता है ससरय, जाके दियें अघाऊँ---१-१ ६४।
[हिं. अघाना] संतुष्ट या तृप्त करू, इच्छा पूर्ण करूँ।
घरैं भहराय भभकत रिपु घाइ सौं, करि कदन रुधिर भैरों अघाऊँ ---९-१२९।
कौरव काज चले रिषि सापन साक-पत्र सु अघाए-१-२३।
तब उन माँगी इन नहिं दीन्ही, बढ़चौ बाढ़चौ बैर अघात।
[सं. अघ्राण = नाक तक, हिं. अधाना]
संतुष्ट या तृप्त होता है।
निपट निसंक बिबादति सम्सुख, सुनि सुनि नंद रिसात। मोसों कहति कृपन तेरे घर ढोटाहू न अधात----१०-३२६।
दुहुँ कर माट गह्यौ नँदनंदन, छिटकि बूंद-दधि परत अघात। मानौं गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभग साँवरे गात---१०-१५९।
भोजन पान से तृप्त होती है, छकती है।
माधौ नैकु हटकौ गाइ••••• छुधित अति न अघाति कबहूँ, निगम-द्रुम-दलि खा इ १-५६।
भोजन या पान से तृप्त होना।
अपने ऊपर ले, भागी बने, सहन करे।
कै अपराध ओढ़ (ओड़ि) अब मेरौ, कै तू देहि दिखाइ-९-८३।
ओढ़ता है। (वस्त्र से शरीर) ढकता हैं।
पीतांबर यह सिर तैं ओढ़त, अंचल दै मुसुकात--१०-३३८।
डासन काँस कामरी ओढ़न बैठन गोप सभा की--२२७५।
[सं. उपवेष्ठन, प्रा. ओवेड्ढन]
[सं. उपवेष्ठन, प्रा. ओवेड्ढन]
अपने सिर लेना, भागी बनना।
स्त्रियों के ओढ़ने का वस्त्र, उपरैनी, चादर, फरिया।
(क) पीतांबर काकैं घर बिसरयौ, लाल ढिगनि की सारी आनी। ओढ़नि आनि दिखाई मोकौं, तरुनिनि की सिखई बुधि ठानी-६९५।
(ख) सूरदास जसुमति सुत सौं क है, पीत ओढ़नी कहाँ गँवाई-६९२।
ओढ़िये पीठ :- (अवसर और स्थिति के अनुकूल) काम कीजिए। उ.- सूरदास के प्रिय प्यारी आपुहों जाई मनाइ लीजै जैसी बयारि बहै तैसी ओढ़िए जु पीठि-२०७५।
( वस्त्र से) शरीर ढके, पहने हुए।
पियरी पिछौरी झीनी, और उपमा न भीनी, बालक दामिनि मानौ ओढ़ो बारौ बारि-धर --१०-१५१।
ओढ़ै कि बिछावैं :- क्या करें, किस काम में लावें। उ.- दुस्सह बचन हमें नहिं भावैं। जोग कथा ओढ़ैं कि बिछावैं।
गुथा हुआ, बहुत मिला-जुला।
आनँद कंद, सकल सुखदायक, निसि दिन रहत, केलि-रस-ओद-१०-११९।
(क) दधि ओदन दोना भरि दैहौं, अरु भाइन मैं थपिहौं--९-१६४।
(ख) ओदन भोजन दै दधि काँवरि, भूख लगै तैं खैहौं–४१२।
(ग) व्यंजन बर कर बर पर राखत ओदन मधुर दह्यौ---४८६।
उत्तम बिधि सौं मुख पखरायौ, ओदे बसन अँगोछि----६०९।
(क) सूरदास प्रभु प्रेम हेम ज्यों अधिक ओप ओपी-३४८७
(ख) राधे तैं बहु लोभ करयौ। लावन रथता पति आभूषन आनन-ओप हरयौ-सा. उ०---१४।
रघुकुल-कुमुद-चंद चितामनि प्रगटे भूतल महियाँ। आए ओप देन रघुकुल कौं, आनँदनिधि सब कहियाँ--९-१९।
साफ करना, चमकाना, स्वच्छ करना।
पत्थर या ईट का टुकड़ा जिससे कोई वस्तु माँजी या (घिसकर) साफ की जय।
जेती हती हरि के अवगुन की ते सबई तोपी। सूरदास प्रभु प्रेम हेम ज्यों अधिक ओप ओपी-३४८७।
बिलग मति मानौ ऊधो प्यारे। वह मथुरा काजर की ओबरी (उबरी) जे आवैं ते कारे--३१७५
देखो री झलक कुंडल की आभा-२९५२।
अंत, सीमा, सिरा, छोर, किनारा।
सोभा-सिंधु अंगअंगनि प्रति, बरनत नाहिंन ओर री-१०-१३९
ओर (निबाह्यौ) निबाहे :- अंत तक कर्तव्य का पालन किया। उ.- (क) और पतित आवत न आँखि-तर देखत अपनौ साज। तीनौं पल भरि ओर निबाह्यौ तऊ न आयौ बाज-१-९६। (ख) तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे, इहै स्वाँग कौं काछै। सूरदास कौं य है बड़ो दुख परत सबनि के पाछे-१-१३६।
ओर आयौ :- अंत निकट आ गया।
हरि जू की आरती . बनी।.........। नारदादि सनकादि प्रजापति, सुरनर-असुर अनी। काल-कर्म-गुन-ओर-अंत नहिं. प्रभु इच्छा रचनी--२-२८।
यादव बीर बराइ बटाई इक हलधर इ४ आपै ओर---१० उ०-६।
ढलुआ छप्पर के किनारे का वह भाग जहाँ से वर्षा का पानी नीचे गिरता है।
वह भाग जहाँ यह पानी गिरे।
छप्पर का वह भाग जहाँ से पानी नीचे गिरे।
यह उपदेस सुनहिं ते ओरी-३३४५।
मनहुँ प्रचंड पवन बस पंकज गगन धूरि सोभित चहुँ ओरी–२४०४।
अपराधी मतिहीन नाथ हौं, चूक परी निज भोरे। हम कृत दोष छमौ करुनामय, ज्यौं भू परसत ओरे-----४८८ |
कागद धरनि, करैं द्रुम लेखनि, जल-सायर मसि घोरै। लिखै गनेस जनम भरि मम कृत, तऊ दौष नहिं ओरै-१-१२५।
वह वस्तु या व्यक्ति जो कोई शर्त पूरी न होने तक किसी दूसरे के पास रहे या रखा जाय।
बने बिसाल अति लोचन लोल। चितै चितै हरि चारु बिलोकनि मानौ माँगत हैं मन ओल ६३०।
छप्पर का वह किनारा जहाँ से बरसा हुआ पानी नीचे गिरता है।
वह स्थान जहाँ यह पानी गिरता है।
परदा करना, ओट या आड़ में करना।
मेह के जमे हुए पत्थर या गोले।
ओली ओड़ना :- आँचल पसार कर याचना करना।
जाकैं मीत नंदनंदन से, ढकि लइ पीत पटोलै। सूरदास ताकौं डर काको, हरि गिरिधर के ओलै-१२५६।
जमानत-रूप में रखी हुई वस्तु या व्यक्ति।
वनस्पति या, जड़ी-बूटी जो दवा के काम कीहो।
फलने के बाद सूखे हुए पौधे।
संतुष्ट होना, इच्छा पूर्ण होना। प्रसन्न होना।
भोजन-पान से तृप्त हुये, छक गए।
(क) बल-मोहन दो उ जोंवत यचि सौं, सुख लूट ति नँदरानी। सूर स्याम अब कहत अघाने, अँचवन माँगत पानी----४४२।
(ख) बिस्वं भर जगदीस कहावत ते दधि दोना माँझ अघाने---११८७।
संतुष्ट हुआ, इच्छा पूरी हुई, मन भरा।
(क) याही करत अधीन भयो हौं, निद्रा अति न अघानौ-१-४६
(ख) बहुत प्रपंच किए माया के तऊ न अधम अधानौ-१३२९।
पेट भर गया, छक गया, तृप्त होगया
कान्ह कहयौ हौं मातु अघानौ-३९६।
एक दैत्य जो कंस का सेनापति था और जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
[सं. आघृाण = नाक तक, हिं. अघाना]
भक्ति बिनु बैल बिराने ह्व हो।.........। चारि पहर दिन चरत फिरत बन, तऊ न पेट अघैहौ हौ--१-३ ३१।
जिन (अक्षरों) का उच्चारण ओठ से हो। ( उ ऊ प फ ब भ म ओष्ठ्य वर्ण हैं।)
[सं० अवश्याय, पा० उस्पाव] हवा से मिली हुई भाप जो उससे अलग होकर गिर जाती है।
ओस का मोती :- शीघ्र नष्ट हो जानेवाला।
दुख या आश्चर्यसूचक अव्यय।
उसे। सब हलधर, माखन प्यारोै तोहि। ब्रज प्यारौ, जाकौ मोहिं गारौ, छोरत काहे न ओहि-३७५।
देवनगरी वर्णमाला का ग्यारहवा स्वर जो अ और ओ के संयोग से बना है। इसका उच्चारण कंठ और ओष्ठ, से होता है।
पोंछकर, झाड़पोंछकर, हाथ फेरकर।
दोऊ भैया कछु करौं कलेऊ लई बलाई कर औंछि-६०९।
[सं. आवेजन = व्याकुल होना]
उमड़ता हुआ, चढ़ा या बढ़ा हुआ।
इन्द्री-स्वाद-बिबस निसि बासर, आपु अपुनपौ हाराै। जल ओड़े मैं चहुँ दिसि पैरयौ, पाउँ कुल्हारौ माराै-१-१५२।
जिस (पात्र) का मुँह नीचे हो।
(पात्र का) मुख नीचे करके (द्रव आदि) गिराना।
[सं. अपर, प्रा. अवर, हिं. और]
मन बच-कर्म और नहिं जानत सुमिरत औ सुमिरावत-२-१७।
घुसना, धंसना, प्रवेश करना।
[सं. अवगाहन, हिं. अवगाहना]
ग्रहण किया, अपनाना सीखा, छानबीन की।
सब आसन रेचक अरु पूरक कुंभक सीखे पाइ। बिनु गुरु निकट सँदेसन कैसे यह औगाह्यौ जा इ--३१३४।
औघड़-असत-कुचीलनि सौं मिलि, माया-जल में तरतौं-१-२०३।
(क) बलिहारी वा रूप की लेति सुघर औ औघर तान दै चुम्बन आकर्षति प्रान।
(ख) मोहन मुरली अधर धरी।::::::::। औघर ताने बंधान सरस सुर अरु रस उमगि धरी।
(क) यह सुनतहिं जसुमति रिस मानी। कहाँ गयौ कहि सारंगपानी। खेलत हैं। औचक हरि आए। जननी बाँह पकरि बैठाए३९१।
(ख) गए स्याम रवि तनया कैं तट, अग लसति चन्दन की खोरी। औचक ही देखी तहँ राधानैन बिसाल भाल दिए रोरी -६२७।
[सं. अ = नहीं +हिं. उचटना = हटना]
लग्यौ फिरत सुरभी ज्यौ सुत-रँग, औचट गुनि गृह बन कौं--१-९।
[सं. आवर्तन, प्रा. आवट्टन]
किसी द्रव को ऑग पर खौलाना या गाढ़ा करना।
[सं. आवर्तन, प्रा. आवट्टन]
[सं. आवर्तन, प्रा. आवट्टन]
रस लै लै औटाइ करते गुर, डारि देत है। खोई.--१-६३।
फिरि औटाए स्वाद जात है, गुर तैं खाँड न होई--१-६३।
आँच पर खौलाना या गाढ़ा करना।
औटा कर, खौला कर,गर्म करके।
(क) आछौ दूध औटि धौरी को, लै आई रोहिनि महतारी-१०-२२७।
(ख) ग्वाल सखा सब हीं पय अँचयौ। नीकैं औटि जसोदा रचयौ--३९६।
आछेेैं औटयौ मेलि मिठाई, रुचि करि-अँचवत क्यौं न नन्हैया--१०-२२९।
औटा हुआ, खौला हुआ, पका हुआ।
औटायौ दुध, सद्य दधि, मधु, रुचि सौं खाहु लला रे--४२९।
[सं. अव + हिं. ढार या ढाल]
[सं. अव + हिं. ढार या ढाल]
शीघ्र ही या थोड़े ही में प्रसन्न हो जाने वाला।
अवतार ले, जन्म ग्रहण करे।
याकीं कोख औतरै जो सुत, करै प्रान-परिहारा---१०-४।
शरीर ग्रहण करना, जन्मना, सृष्टि, अवतार।
उदार होने की क्रिया या भाव।
उद्योग-धन्धों से संबंधित।
जिन द्वति सकट लब तृन वृत इंद प्रतिज्ञा टाली। एते पर नहि तजत अवोरी कपटी कंस कुचाली--२५६७।
तुम याही बात अचंभव भाषत नाँगी आवहु नारी----८२६।
यह मेरे जिय अतिहि अचंभित तौ बिछुरत क्यों एक घरी-२०९२।
देख सखी पँच कमल द्वै संभु। एक कमल ब्रज ऊपर राजत निरखत। नैन अचंभु-१९१८ और सा. उ.--४४।
कहँ लगि समुझाऊँ सूरज सुनि, जाति मिलन की औधि टरी-८०६।
सिसिर बसन्त सरद गत सजनी बीती औधि करी--२८१४।
वह तिथि जिसकी हानि हो गयी हो
एक संयोजक शब्द; दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने वाला शब्द।
एहि थर बनी क्रीड़ा गज-मोचन और अनत कथा स्रति गाई-१-६।
हरि सौं ठ कुर और न जन कौं-१-९।
कानन सुनै आँखि नहिं सूझै। कहै और और कछु बूझै---४-१२।
भई और की और (औरै): -विशेष परिवर्तन हो गया, भारी उलट-फेर हो गया, कुछ का कुछ हो गया। उ.- (क) कहत हे आगैं जपिहैं राम। बीचहिं भई और की औरै, परयौ काल सौं काम---१.५७। (ख) बीचहिं भयी और की औरे, भयौ शत्रु को भायौ---९-१४६। (ग) हम सौं कहत और की और इन बातनु मन भावहुगे--१९७८। (घ) अब ही और की और होत कछु लागै बारा----१०। ८।
और की औराई (औरै) :- कुछ का कुछ। उ.- (क) कहति और की औराई मैं तुमहिं दुरैहौं।-२१०२। (ख) तैं अलि कहत और की औरै स्रुतिमति की उर लीनी--१३८०।
जो संतान विवाहिता पत्नी से उत्पन्न हो।
मैं हूँ अपनेैं औरस पूतैं बहुत दिननि मैं पायौ--१०-३३९।
बिसरो सूर बिरह दुख अपनो अब चली चाल औरासी-२८७७।
[सं. अव = विरुद्ध या उलटी + रेव = गति]
[सं. अव = विरुद्ध या उलटी + रेव = गति]
चाल भरी बातें, छल-कपट की घात।
कृपन, सूम, नहिं खाइ खवावैं, खाइ मारि के औरै.--१-१८६।
(क) जो प्रभु अजामील कौ दीन्हों, सो पाटाै लिखि पाऊँ। तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौ पतित बुलाऊँ-१-१४६।
(ख) अबहिं निवछरौ समय, सुचित ह्वै, हम तो निरधक कीजे। औरौ आइ निकसिहैं तातैं, आगैं हैं सो कीजै-१-१९१।
औरौ दँडदाता दोउ आहि। हम सौं क्यौं न बतावो ताहि-६.४।
रोग दूर करने की वस्तु, दवा।
बिन जानैं कोउ औषध खाइ। ताकौ रोग सफल नसि जाइ---६-४।
तुम दरसन इक बार मनोहर, यह औषधि इक सखी लखाई-७४८।
(क) हरि सौं मीत न देख्यौ कोई। विपति काल सुमिरत तिहिं औसर आनि तिरीछौ होई--१-१०।
(ख) गए न प्रान सूरता औसर नंद जतन करि रहे घनेरो-२५३२।
औसर हारयौ :- मौका चूक गये। उ.-औसर हारयौ रे तैं हारयौ। मानुष-जनम पाइ नर बौरे, हरि को भजन बिसरायाै--१-३३६।
जेहि तन गोकुलनाथ भज्यौ। ऊधो हरि बिछुरत ते बिरहिनि सो तनु त बहिं नज्यो। अब औसान घटत कहि कैसे उपजी मन परतीति।
सुरसरि-सुवन रन भूमि आए। बान वर्षा लागे करन अति क्रोध ह्वै पार्थं औसान (अवसान) तब सब भुलाए---१-२७३।
[सं. अवसे रु = बाधक, हिं. अवसेर]
गोपिन बैठि औसेर कीनो--२४३२ (४)।
[सं. अपघात, अवहन = कुचलना, कूटना]
(क) अचंभौ इन लोगनि को आवै। छाँडै स्याम-नाम-अम्रित-फल, माया-बिष-फल भावै--२-१३।
(ख) डोलै गगन सहित सुरपति अरु पुहुमि पलटि जग परई। नसै धर्म मन बचन काय करि, सिंधु अचंभौ करई-९-७८।
(ग) मोसों कहत तुहूँ। नहिं आवैं सुनत अचंभो पाऊँ रौ---पुं. ३२३।
(घ) सोवत थी मैं स जनी आज। तब लग सुपन एक यह देखो कहत अचंभो साज-सा. ६८।
यह मूरति कबहूँ नहिं देखी मेरी | अँखियन कछु भूल भई सी। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कौ मनमोहन मोहनी अचई सी----१६८३।
[सं. अति, प्रा. अच + करणम् =ज्यादती]
नटखटपन, शरारत, शैतानी, छेड़छाड़।
(क) सूर स्याम कत करत अ व गरी, बार-बार ब्रह्मनहिं खिझायौ-१०-२४८।
(ख ) माखन दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अ नगरी कीन्ही। अब तो घात परे हौ लालन तुम्हैं भलै मैं चीन्ही-१०-२९७।
(ग) मैं बरजे तुम करत अचगरी। उरहन कौं ठाढ़ी र हैं सिगरी-३९१।
(घ) बहुत अचगरी यहिं करि रखो प्रथम मा रिहैं याहि---२५७४।
(ङ) अगचरी करि रहे बचन एई कहे डर नहीं करत सुत अहीर केरे--२६११।
नटखट, चंचल, छेड़खानी करनेवाला।
(क) ऐसौ नाहिं अवगरौ मेरौ, कहा बनावति बात-१०-२९०।
जसुमति तेरौ बारौ कान्ह अति ही जु अवगरौ -१०-३३६।
कहा करत तू नद डिठौना। सखी सुनहु री बातैं जैसी करत अतिहि अचभौना-पृं. २३६।
भोजन के पश्चात हाथ मुँह धोकर कुल्लो करने की किया।
भोजन करि नँद अचमन लीन्हौ, माँगत सूर जुठनिया-१०-२३८।
न चलने वाला, जड़, स्थावर।
[सं. अश्चर्य, प्रा. अच्चरिय]
(क) अविगत, अबिनासी पुरुषोत्तम, हाँ कत रथ कै आन। अचरज कहा पार्थ जौ बेधें, तीन लोक इक बान-१-२६९।
( ख ) अचरज सुभग बेद जल जातक कलस नीलमनि गात---१९०७।
(७) आजु अली लषि अचरज एक। सुत सुत लखत तिपीपी गोपी सुत सुत बाँधे टेक--
सा, ४५।
राधे तु अति रंग भरी। मेरे जान मिली मनमोहन अचर। पीक परी–२१०६।
जिहिं गोविंद अचल भुव राख्यौ, र विससि किए प्रदच्छिनकारी-१३४।
जो नष्ट न हो, अटूट, अजेय।
एक प्राचीन ऋषि जिनकी गणना दस प्रजापतियों में है और जो अथर्ववेद के कर्ता माने जाते हैं। उनके पिता का नाम उरु और माता का आग्नेयी था। इनकी चार स्त्रियां थीं-स्मृति, स्वधा, सती और श्रद्धा। इनकी कन्या का नाम ऋचस् और पुत्र का मनस् था।
[सं. अंगुष्ठ, प्रा अंगुट्ठ, हि अँगूठा]
कर गहे चरन अँगूठा चचो रैं -१०-६२।
एक नाप जो आठ जौ के पेट की लंबाई के बराबर होती है।
अंगुर द्वै धटि होति सबनि सौ पुनि पुनि और मँगायौ---१०-३४२।
एक अंगुली की मोटाई भर की नाप।
अंग अभुषन अँगुरिनि गोल----१०-९४।
दुहत अँगुरियनि भाव बतायौ--६६७।
गहे अँगुरिया ललन की, नँद चलन सिखावत---- १०-१२२।
चौथ मास कर-अँगुरी सोई-३-१३।
उँगली, उँगलियों (को) (से)।
मैं तौ जे हरे हैं, ते तौ सोबत परे हैं, ये करे हैं कौनैं आन, अँगुरीनि दंत दै रह्यौ - १०-४५४
[सं. अचल = पर्वत + जा = पुत्री]
[सं. अचन जा = पार्वती + पति]
[सं. अवलजा---पति = शिव + अग = शरीर + भूषण = अलंकार]
शिव के शरीर का भूषण, सर्प, शेषनाग।
अचलजपति अंग-भूषन भार-हित-हित
[सं. अचल जापति-अंग-भूषन = शेष + भार (शेष का भार = पृथ्वी ) का हित (पृथ्वी का हित यः हितू = इंद्र) + हित। ( इंद्र का हितू या प्रिय = मेघ = वन =घनश्याम )]
भोजन के बाद हाथ मुँह धोकर कुल्ली करना।
भोजन के बाद हाथ मुँह धोने और कुल्ली करने की क्रिया।
पचाने की | क्रिया, हजम कर जाना।
भोजन के बाद हाथ मुँह धुलाकर कुल्लो कराना।
आचमन करते हैं, पीते हैं, पान करते हैं।
रुक्मिनि चल हु जनम भूमि जाहीं। जदपि तुम्हारो हतो द्वारका मथुरा के सम नाहीं। यमुना के तट | गाय चरवत अमृत जल अ च वाहीं-१० उ.-१ ०४।
सुनहु सूर अधरन रस अँचवो दुहुँ मन तृषा बुझ ऊँगो-१९४४।
[सं. आ = अच्छी तरह + चक्र= भ्रांति]
[सं. आ + चक् अथबा सं. अज्ञान]
[स. अ = प्रच्छी तरह + चक् = भ्रांति, अथवा सं. अज्ञानात्]
बिना पूर्व सूचना के, एकबारगी, सहसा, अकस्मात।
(क) बरजि रहे सब, कह्यौ न मानत, करि करि जतन उड़ात। परै अचानक त्यों रस-लंपट, तनु तजि जमपुर जात---२-२४।
(ख) नृपति जजाति अचानक आयौ। सुक्र सुता को दरसन पायौ-९-१७४।
(ग) बटाऊ होहिँ न काके मीत। संग रहत सिर मेलि ठगौरी हरत अचानक चीत-२७३०।
नमक, मिर्च, राई आदि मसाले मिलाकर तेल, सिरके आदि में कुछ दिन रखकर खट्टे किए हुए फल या तरकारी।
पापर बरी अचार परम सुचि-२३ २१।
[सं. अ = नहीं + चाह = इच्छा]
[सं. अ + चाह = इच्छा, अचाह]
अप्रिय, अरुचिकर, अप्रीतिपात्र।
जो (वार आदि) खाली न जाय, जो निर्दिष्टकार्य अवश्य करे।
जिसका वार खाली न जाय, अति कुशल।
एहि वन मोर न ही ए काम बान। बिरह खेद धनु पुहुप भृंग गुन करिल तरैया रिपु समान। ल यौ घेरि मनो मृग चहुँ दिसि तै अचूक अहेरी, नहिं अजान-२८३८।
बेसुध, मूछिंत, संज्ञाशून्य।
पौढ़े कहा समर-सेज्या सुत, उठि किन उत्तर देत। थकित भए कछु मंत्र न फुरई कीन्हे मोह अचेत-१-२९।
सूर सकल लागत ऐसी यह सो दुख कासौं कहिये। ज्यों अचेत बालक की बेदन अपने ही तन सहिये---१४४२।
(क) ऐसौ प्रभू छाँड़ि क्यौं भटके, अजहूँ चेति अचेत-१-२९६।
(ख ) कुँ अर जल लोचन भरि भरि लेत। बालक वदन बिलोकि जसोदा, कत रिस करति अचेत--३४९।
आपुन तरि तरि और न तारत अस्म अचेत प्रकट पानी मैं बनचर लै लै डारन-९-१२३।
(क) कालीदह जल अचै गए मरि तब तुम लियै जिवाय-९८६।
(ख) मोहन माँग्यौ अपनी रूप। यहि ब्रज बसत अ वै तुम बैठी ता बिन तहाँ निरूप।
[सं. अ = नहीं + शयन = सोना आराम करना]
ससि पावस कपिल | के बिच मूँद राखे नैन। सह सिकारी नाग मनसिप सखिन वोर (ओर) अचैन--सा, ९२।
सारंग पच्छ अछ सिर ऊपर मुष सारंग सुष नीके–सा० १००।
अक्षकुमार जो रावण का पुत्र था और हनुमान द्वारा मारा गया था।
बिना टूटा चावल जो मंगल-द्रव्य माना गया है।
अच्छत दूब लिये रिषि ठाढ़े, बारनि बंदनवार बँधाई-१०-१९।
[सं. अप्सरा, प्रा. अच्छरा]
भछ विध के षरक फरकत अच्छु चारो ओर-सा ०३४।
बृषभ धर्म पृथ्वी सो गाइ। बृषभ कह्यौ तासौं या भाइ। मेरे हेत दुखी तू होत। कै अधर्म्म तुम अच्छोत (के अधर्म तो ऊपर होत]-१-२९०।
चतुरंगिनी सेना जिसमें १०९३५० पैदल, ६५६१० घोड़े, | २१८७० रथ और २१८७० हाथी होते थे।
(क) अच्युत रहै सदा जल-साई। परमानंद परम सुखद ई-१०-३।
(ख) मूरज प्रभु अच्युत ब्रजमंडल, घर हीँ घर लागे सुख देनु-४३८।
विष्णु और उनके अवतारों का नाम।
[सं. अ = नहीं + वर्ष = खाना]
अक्षत, देवताओं पर चढ़ाने के अक्षत।
मेरे कहैँ बिप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ, भूषन पहिरावौ। अछत-दूब दल बँधाइ, लालन की गांठि जुराइ, इहैं मोहिँ लाहौ नैननि दिखरावौ---१०-९५।
[अ. क्रि. 'अछना' का कृदन्त रूप]
रहते हुए, विद्यमानता में, सम्मुख।
(क) माता अछत छीर बिन सुत मरै, अजा कंठ-कुच से इ-१-२००।
(ख) ता रावन केैं अछत अछयसुत सहित सैन संहारी-९-१००
(ग) कुँवर सबै घेरि फेरे फेरत छुड़त नाहिने गुपाल। बलै अच्छत छलबल करि सूरदास प्रभु हाल-१० उ०-६।
[अ. क्रि. 'अछना' का कृदन्त रूप]
[सं. अ = नहीं + अस्ति, प्रा. अच्छाइ---है]
[सं. अस्, प्रा. अच्छ-होना]
जिसका अंत न हो, जो समास न हो।
करषत सभा द्रपद-तनया को अंवर अछय कियौ---१-१२१।
[सं. अ = नहीं + छय == छिपना]
[सं. अक्ष कुमार, हिं. अक्षयकुमार]
रावण का एक पुत्र जो लंका का प्रमोइवन उजाड़ते समय मारा गया था।
[सं. अ = नहीं + छुप्त = छुआ हुआ, प्रा. अछुत]
जो छुआ न गया हो, अस्पृष्ट।
[सं. अ = नहीं + छुप्त = छुआ हुआ, प्रा. अछुत]
जो काम में न लाया गया हो, कोरा।
[सं. अ = नहीं +छुप्त-छुआहुअ]
जो काम में न लाए गए हों, नए, कोरे।
मेरे घर को द्वार, सखी री, लाबलोैं देखति रहियोै। दधिमाखन द्वै माट अछूतें तोहिँ सौँ पति होँ सहियौ---१०-३१३।
जिसका छेदन न हो सके, अभेद्य, अखंड्य।
(क) अभिद् अछेद रूप मम जान। जो सब घट है। एक समान--३-१३।
(ख) इह अछेद अभेद अबिनासी। सर्व गति अरु सर्व उदासी-१२-४।
[सं. अक्षोभ, प्रा. अच्छोह]
[सं. अक्षोभ, प्रा. अच्छोह]
अजन्मा, जन्म-बंधन-रहित स्वयंभू।
अज, अविनासी, अमर प्रभु, जनमै-मरै न सोह --२.३६।
बहुत मोटा साँप जो बकरी और हिरन तक निगल जाता है। यह जंतु रथूलता और निरुद्यमता के लिए प्रसिद्ध है।
अति प्रचंड पौरुष बन पागें, केहरि भूख मरै। अनायास बिनु उद्यम कीन्हैं, अजगर उद र अरै---१-१०५।
[सं. अयुक्न, पु. हिं. अजुगुति]
अचंभे की बात, अमाधारण। व्यापार, अप्राकृतिक घटना।
(क) गोपाल सबनि प्यारो, ताकौं तैं कीन्हौ प्रहारौ जाकौ कौ है मोहुं कौ गारौ, अजगुन कियनौ-३७३।
( ब ) स्वान सँग सिंहिनि रति अजगुत वेद विरुद्ध असुर करै आइ-१० उ.---१०।
[सं. अयुक्न, पु. हिं. अजुगुति]
अनुचित बात, बेजोड़ प्रसंग या व्यापार।
(क) सरबस लूटि हमाराै लीनोै राज कूबरी पावै। तापर एक सुनौ री अजगुत लिख लिख जोग पठावै ३०९९।
(ख) द्विज बेगि धाव हु कहि पठा यहु द्वारकाते जाइ। कुंदनपुर एक होत अजवुत बाघ घेरी गाइ---१० उ०-१३।
आश्चर्यजनक, अदभुत, बेजोड़।
(क) पापी जाउ जीभ गलि तेरी अजगुत (अजुगुन) बात बिचारी। सिह कौ भच्छ सृगाल न पावै हौं समरथ की नारी-९-७९।
(ख) रंगभूमि मुष्टिक चनूर हति भुजबल तर बजाए। नगर में नारि देहिं गारि कंस कौ अजगुत युद्ध बनाए---२६२२।
जन्मरहित, जन्म-बंधन-मुक्त स्वयंसू।
(क) सफल लोकनायक, सुखदायक, अजन जन्म धरि आयौ----१०-४।
(ख) शंख, चक्र, गदा, पद्म, चतुर्भुज अजन जन्म ले आयौ।
जन्म बंधन से रहित, अनादि, नित्य।
आत्म, अजन्म सदा अबिनासी ताकौं देह भोह बड़ फाँसी-५-४।
जिसका उच्चारण न किया जाय।
उच्चारण न किया जानेवाला तांत्रिकों का मंत्र।
षटदल अष्ट द्वादस दल निर्मल अजपा जाप-जपाली। त्रिकुटी संगम ब्रह्मद्वार मिट यौं मिलिहैं बनमाली।
[सं. अजा = बकरी + भक्ष्य = भोजन]
बकरी का भक्षण या भोजन, पत्ता, पत्र। 'पत्र' का दुसरा अर्थ चिटठी भी होता हैं।
कबै द्रग भर देखबोजू सबौ दुख बिसराइ। अजाभष की हान हमको अधिक ससि मुख चाइ---सा. २२।
[सं. अजय === भाँग = भंग + रिपु= शत्रु]
भंग का शत्रु, उद्दीपन, उतेजाना।
षटकंध अधर मिलाप उर पर अजयारिषु की घोर। सूर। अबलान मरत ज्यावो मिलो नंद किशोर–सा.उ.---४७।
अँगुरीनि दंत दै रह्यौ :- चकित हुआ, अचंभे में आ गया।
उँगली में पहनने का छल्ला, मुँदरी, मुद्रिका।
एक फल जिसको सुखा कर किशमिश या दाख बनती है।
[सं. अंग = शरीर+एज = हिलना, कँपना]
[सं. अंग = शरीर+एज = हिलना, कँपना]
[सं. अ = नहीं + जरा = बुढ़ापा]
[सं. अ = नहीं + जरा = बुढ़ापा]
जो सदा एकरस रहे, ईश्वर का एक विशेषण।
दिनाचारी में सब मिटि जैहै। स्यामरंग अजरायल रैहै----१४८८।
जो सदा एकरस रहे, ईश्वर का एक विशेषण।
जसुमति धनि यह कोखि, जहाँ रहे बा वन रे। गिरैं भलैं सु दिन भयौ पूत, अमर अजरावन २-.-१६.३८।
[सं. अज--भेड़ा + सं. अरूढ़ = सवार]
[सं. अज--भेड़ा + सं. अरूढ़ = सवार]
असुर अजरूढ़ होइ गदा मारे फटकि स्याम अंग लागि सो गिरैं ऐसे। बाद के हाथ ते कमल अमलनाल जुत लागि गजराज तन गिरत जैसे-१० उ०-३१।
[सं. यवनिका, हिं. अजवायन]
एक तरह का इस मसाला, अजवायन, यवानी।
(क) हींग, मिरच, पिपरि, अजवाइन ये सब बनिज कहावैं---११०८।
( ब) रोटी रुचिर कनक बेसन करि। अजवाइनि सैंधौ गिलाइ धरि---२३ ११।
पार्वं अबार सुधारि रमापति अजस करत जस पायौ---१-१८८।
[सं. अद्य, प्रा. अज्ज, हिं.अज + हूँ (प्रत्य.)]
(क) अजहँ लगि उत्तानपाद:सुन अविचल राज करै-१-३७।
(ख) रे मन, अजहूँ क्यों न सम्हारे--१६३।
(ग) मैया कबहिं बढ़ेैगी चोटी। किती बार मोहिं दूध पियत भई यह अजहूँ है छोटी-१०-१७५।
(घ) मानिनि अजहूँ मान बिसारो--सा० २०।
न माँगनेवाखा आदमी, संपन्न व्यक्ति।
जो न माँगे, भरा-पूरा, संपन्न।
[सं. अयाचिन, हिं. अयाची.]
जिसे माँगने की आवश्यकता न हो, धन-धान्य से पूर्ण, भरा-पूरा।
बित्रसुदः मा कियौ अजाची, प्रीति पुरातन जानि-१-१८ और १-१ ३५।
सूरदास प्रभु महाभक्ति तैं जाति अजातिहि साजै १-३६।
हमैं नँदनंदन मोल लिये। जमके फंद काटि मुकराये, अभय आजाद किये--१-१७१।
[सं. अ = नहीं + ज्ञान, प्रा. ज्ञान]
सिव ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु हों अजान नहिं जानौं-१-११।
(ख) इहाँ नाहिन नंदकुमार। इहै जानि अजान मघवा करी गोकुल आरि-२८३ १।
[सं. अ = नहीं + ज्ञान, प्रा. ज्ञान]
एक पेड़ जिसके नीचे जाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
अनजान स्थिति में, अज्ञानतावश।
जान अजान नाम जो लेइ हरि बैकुंठ-बास f हिं देइ---६-४।
पुराणानुसार जीवन भर पाप कर्मौ में ही लिप्त रहनेवाला एक पापी ब्राह्मण। मरते समय यमदूतों का भयानक रूप देख कर इसने अपने पुत्र 'नारायण' का नाम लिया और अनजान में ही इस प्रकार ईश्वर का नाम लेने से तर गया।
अपराजित, जो जीता न गया हो।
इंद्रि अजित, बुद्धि बिषयारत, मन की दिन-दिन उलटी चाल--१-१२७।
(ख) पौरुषरहित, अजित इंद्रिनि बस, ज्यौं गज पंक परचौ---१-२०१।
तुम प्रभु अजित, अनादि, लोकपति, हौं अजान मतिहीन-१-१८१।
जो इंद्रियों को जीत न सका हो, विषयासक्त, इंद्रियलोलुप।
पाइ सुधि मोहिनी की सदासिव चले, जाइ भगवान सौं कहि | सुनाई असुर अजितेंद्रि जिहिं देखि मोहित भए, रूप सो मोहिं दीजै दिखाई--८-१०।
धरे निसानं अजिर गृह मंडल, बिप्र बेद अभिषेक करायौ ९-२५।
अब यह बिरह अजीरन ह्वैंकैं वमि लाग्यो दुख दैन। मूर बैद ब्रजनाथ मधुपुरी काहि पठाॐ लैन--२७६५।
[सं. अयुक्त, पु. हिं. अजुगुति, हिं. अजुगुन]
पापी, जाउ, जीभ गरि तेरी, अजुगुत बात विचारी।सिंह कौ भच्छ सृगाल न पावै, हौं समरथ की नारी-९-७९
सूर्यवंशी राजाओं की पुरानी राजधानी जो सरयू के किनारे बसी थी। इसकी गिनती सप्त पुरियों में है।
(क) सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि चित-चिंतामनि लियौ अजोरि--११५८।
(ख) बुधिविवेक बल बचन चातुरी पहिले हि लई अजोरि---पृ० ३ ३ ३।
(क) राधा सहित चंद्रावलि दौरी। औचक लीनी पीत पिछौरी। देखत ही ले गई अजोरी। डारि गई सिर स्याम ठगोरी--२४५४।
(ख) सूरस्याम भए निडर तबहिं ते गोरस लेत अजोरी-१४७२।
[सं. अद्य, प्रा. अज्ज, हिं. आज]
बालक अजौं अजान न जानै, केतिक दह्यो लुटायौ :-३५६।
खेलत श्याम पौरि कै बाहर, ब्रज लरिका संग जोरी। तैसेई आपु तैसई लरिका, अज्ञ सबनि मति थोरी---१०-२५३।
[सं. आज्ञाकारिन्, हिं. आज्ञाकारी]
तेऊ चाहन कृपा तुम्हारी। जिनकैं बस अनिमिष अनेक जन अनुचर आज्ञाकारी-१-१६३।
जड़ता, मूर्खता, अविद्या, मोह।
ज्ञानशून्य, मूर्ख, जड़, अनजान।
मै अज्ञान कछू नहि समुझ्यौं, परि दुख-पुंज सह्यौ----१-४६।
जो समझ में न आये, ज्ञानातीत,बोधागम्य।
कपड़े की लम्बी थैली, झोली।
[सं.अ = नहीं + टिक् = चलना अथवा सं. अ + टक = बंधन]
रोक, रुकावट, विघ्न, अड़चन, व्याघात।
(क) घाट-बाट कहुँ अटक होइ नहिँ सब कोउ देहिँ निबाहि--१-३१०।
(ख) अब लौं सकुच अटक रही अब प्रगट क अनुराग री---८८०।
(ग) जैसे तैसे ब्रज पहिचानत। अटक रहीं अटकर करि आनत-१०५०।
(ध) लोचते मधुप अटक नहिँ मानत जद्यपि जतन करौं--११०५।
(ङ) सोषति तनु सेज सूर चले न चपल प्रान। दच्छिन रवि अवधि अटक इजली जिय आन--२७४३।
(च) गह्यौ कर श्याम भुज मल्ल अपने धाइ झट कि लीन्हों तुरत पटकि धरनी। भडक अति सब्द भयौ खुटक नृप के हिये, अटक प्रानन परयो धटक करनो-२६०९।
(छ) अब सखि नींदाै लो गई। भागी जिय अपमान जानि जनु सकुचनी ओट लई। अति रिस अहनिसि कंत किए बस आयम अटक दई---२७९१।
[सं.अ = नहीं + टिक् = चलना अथवा सं. अ + टक = बंधन]
अकाज, हर्ज, बड़ी आवश्यकता।
(क) गैपनि भई बड़ी अवार, भरि भरि पय थन नि भार, बछरा गन करैं पुकार तुम बिन जदुराई। तातैं यह अटक परी, दुहन काज सौंह करी आवहु उठ क्यों न हरी, बोलत बल-भाई-६ १९।
(ख) ह्याँ ऊबो काहे को आए कौन सी अटक परी–३ ३ ४६।
[सं.अ = नहीं + टिक् = चलना अथवा सं. अ + टक = बंधन]
नितही झगरत हैं मनमोहन देखि प्रेम रस-चाखी। सूरदास प्रभु अटक न मानत, ग्वाल सबैं हैं साखी----७७४।
[सं. अ = नहीं + टिक = चलता]
[सं. अ = नहीं + टिक = चलता]
[सं. अ = नहीं + टिक = चलता]
[सं. अ = नहीं + टिक = चलता]
[सं. अट् = घूमना + कल = गिनना, हिं. अटकल]
जैसे तैसे ब्रज पहिचानत। अटक रहीं अटकर करि आनत-----१०५०।
बार-बार राधा पछितानी। निकसे स्याम सदन ते मेरे इन अटकरि पहिचानी।
[सं. अट् = घूमना + कल् = गिनना]
अनुमान लगाना, कल्पना करना।
एक बार माखन के काजे राखे मैं अटकाइ-२७ ०४।
त बहिं स्याम इस बुद्धि उफाई। जुवती गई घरनि सब अपने, गृह-कारज जननी अटकाई-३८३।
(क) मनि अभिरन डार डारन प्रति देखत छबि मन ही अटकाए-८२२।
(ख) लोचन भ ग को सरस पागे। स्याम कमल-पदसौं अनुरागे......। गए तबहिं ते फेरि न आए। सूर स्याम बेगहिं अटकाएं--पृ० ३२५।
लियो उपर ना छीनि दूरी डारनि अटका यौ--११२४।
रुकावट, प्रतिबंध, अड़चन, बाधा।
अटकाते या ठहराते हो, रोकते या अड़ाते हो, बाँधते हो।
कैसे लै नोई पग बाँधत, ले गया अटकाव हु-४०१।
सो प्रभु दधिदानी कहवावैं। गोपिन कौ मारग अटकावैं--११८६।
स्याम कर मुरली अतिहिं बिराजति ……..| ग्रीव नवाइ अटकि बसी पर कोटि मदनछबि लाजति--६४५।
मुकुट लट कि अरु भृकुटी मटक देखौ कुंडल की चटक सौं अटकि परी दुगानि लपट-८३९।
ललित कपोल निरखि कोउ अटकी; सिथिल भई ज्यों पानी। देह गेह की सुधि नहिं काहूं हरषति कोउ पछितानी-६४४।
देखी हरि राधा उत अटकी। चितै रही इकटक हरि ही तन ना जाइयै (जानिये ?) कौन अँग अटकी---१३०१।
ऐसी कहौ बनिज का अटकी। मुख-मुख हेरि तरुनि मुसुकानी नैन सैन दै दै सब मटकी-११०५।
घर पहुंच अबहीं नहिं कोई। मारग में अटके सब लोई----१०३६।
(क) लोचन भए स्याम के चर।.... ललित त्रिभंगी छबि पर अट के फटके मोसा तारि--पृ० ३२२।
(ख) छूटत नहीं प्रान क्यौं अटके कठिन प्रेम की फाँसी-३४०९।
प्रीति से फेंसे, प्रेम करने लगे, पग गए।
तुमहिं दियौ बहराइ इतेै को वे कुबिजा सौं अटके-३ १०७।
(ख) सूर स्याम सुन्दर रस अटके हैं मनो उहँहि छएरी-सा ० उ०-७।
जनम सिरानौ अट के अटकेै है। राजकाज, सुत बित की डोरी, बिनु बिवेक फिर्र्यौ फटकें---१.२९२।
रोकने से मना करने से, ठहरने से।
नैंना न रह री मरे अटकै पृ० २३९।
अज गजराज ग्राह सौं अटक्योै, बली बहुत दुख पायौ। नाम लेत ताही छिन हरि जू, गरुड़हिं छाँड़ि छुड़ायौ---१-३२।
अकाज हुआ, आवश्यकता पड़ी, हर्ज हुआ।
अति आतुर नृप मोहिं बुलायौ। कौन काज ऐसौ अटक्यौ है, मन मन सोच बढ़ायौ-२४६५।
(क) कहा करों चित चरन अटक्यौ सुधा-रस कै चाई-३-३।
(ख) सूर दास प्रभु सौ मन अटक्यौ से देह गेह की सुधि बिसराई८७८।
(ग) तनु लीन्हे डोलत फिरेैं रसना अटक्यौ। जस---११७७।
जीव जल-थल जिते, वेष धरि धरि तिते, अटत दुरगम अगम अचल भारे-१-१२०।
घूमने फिरने की क्रिया, यात्रा, भ्रमण।
[सं. अट्ट = अटारी, हिं. अटा]
(क) सखी री वह देखौ रथ जात। कमलनैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात। लई जाइ जब ओर अट न की चीर न रहत कृष गात-२५३९।
(ख) ऊँच अटन पर छत्रन को छबि सी सन मानो फूली-२५६१।
(ग) ऊँचे अटनि छाज की सोभा सीस उचाइ निहारी--२५६२।
[सं. उट = घास-फूस, हिं. ओट]
[सं. अट = चलना + पट = गिरना]
ऊटपटाँग, उल्टा सीधा, बेठिकाने।
अटपट आसन बेैठि कैं गो-धन कर लीन्हौं---४०९।
[सं. अट = चलना + पट = गिरना]
[सं. अट = चलना + पट = गिरना]
(लियौ) अचल :- अंचल डाल कर थोड़ा मुंह ढक लिया। उ.- रुद्र कौ देखि के मोहिनी लाज करि, लियो अचल, रुद्र तब अधिक मोह्यौ---८-१०।
अंचले जोरे :- दीनता दिखाकर। उ.- अंचल जोरे करत बीनती, मिलिबे को सब दासी३४२२।
अंचल दै :- आँचल की ओट करके, घूँघट काढ़ कर। उ.- पीताम्बर वह सिर ते ओढ़त अंचल दै मुसुकात–१०-३३८।
पीते (हुए) पान करते (ही)।
अँचवत पय तातौ जब लाग्यौ रोवत जीभ डढ़ै---१०-१७४।
माधौ, नैंकु हटकौ गाइ। ....अष्टदस घट नीर अँचवति, तृषा तउ न बुझाति--१-५६।
भोजन के पीछे हाथ मुँह धोना, कुल्ली करना; और आचमन का जल या आचमन किया हुआ जल।
अँचवन लै तब धोए कर-मुख-३९६।
(ख) सूरस्याम अब कहत अघाने, अँचवन माँगत पानी-४४२।
आचमन करूँगा, पान करूगा, पिऊँगा।
आजु अजोध्या जल नहिं अँचवौं, मुख नहिं देखौं माई-९-४७।
(क) सुत-दारा को मोह अँचै विष, हरि-अमृत-फल डार्यौ-३६६।
(ख) दवानल अँचै ब्रजजन बचायौ--५९७।
प्यारी नैननि को अंजन लै अपने लोचन अंजत है—पृ० ३११।
अंजन आड़ तिलक आभूषन सचि आयुध बड़ छोट- सा ० उ० १६।
उदित अंजन पै अनोषी देव अगिन जराय–सा. ३२।
[सं. अट = चलना + पट = गिरना]
घबड़ाकर, अटक कर, लड़खड़ाकर।
(क) स्याम करन माता सौं झगरौ, अटपटात कलबल करि बोल--१०९४।
(ख) कबहुँ जम्हात कबहुँ अँग मोरत अटपटात मुख बात आवै, रोैन कहूँ धौं था के--२०८०। मूच्छम चरन चलावत बल करि। अटपटात कर देति सुंदरी, उठत तबै सुजतन तनमनधरि-१०-१२०।
(क) कर हरि सौं सनेह मन साँचौ। निपट कपट की छाँड़ि अटपटी, इंद्रिय बस राखहि किन पाँचौं----१-८३
(ख) सूधे दान काहे न लेत। और अटपटी छाँड़ि नंदसुत रहहु कॅपावत बेत–१०३६।
अनरीतियुत, अनुचित, नटखटपन से भरी हुई।
मधुकर छाँड़ि अटपटी बातें---३०२४।
लडखडाती हुई, गिरती पड़ती है.
छाँड़ि देहु तुम लाल लटपटी यहि गति मंद मराल १०-२२३।
[सं. अट् = चलना + पट् = गिरना (अटपट)]
निरतत लाल ललित मोहन, पण परत अटपटे भू मैं--१०-१४७।
[सं. अट् = चलना + पट् = गिरना (अटपट)]
ऊटपटाँग, अंङबंड, उदासीधा, बेठिकाने।
आए हो सुरति किए ठाठ करख लिए सकस की धकवकी हिये। छूटे बन्धन अरु पाग का बाँधनि छटी लटपटे पेट अटपटे दिये---२००९।
गूढ़, जटिल, गहरा, अनोखा'।
राखो सब इह योग अटपटो ऊधौ पाइ परोैं --३०२७।
[सं. अ = नहीं + टल = चंचल होना]
(क) पतितपावन जानि सरन आयौ। उदधि संसार सुभ नाम-नौका तरन, अटल अस्थान निजु निगम गायौ---१-११९।
[सं. अ = नहीं + टल = चंचल होना]
जो सदा बना रहे, नित्य चिरस्थायी।
(क) दास ध्रव कौं अटल पद दियौ, राम-दरबारी१-१७६।
(ख) बौरे मन, रहन अटल करि जान्यौ--१-३१९।
[सं. अ = नहीं + टल = चंचल होना]
[सं. अ = नहीं + टल = चंचल होना]
जिसका घटना निश्चय हो, अवश्यंभावी
चिरंजीवि सीता तरुवर तर अटल न कबहूँ टरई-९-९९।
(क) नँदनंदन को रूप निहारत अहनिसि अटा चढ़ी-२७९४।
(ख) बिधि कुणाल कीन्हें काचे घट ते तुम आनि पकाए।••••••••। याते गरे न नैन मेंह हैं अवधि अरा पर छाए--३ १९१
मकान के ऊपर की कोठरी या छत।
तुम्हरे हिँ तेज-प्रताप रही बिच, तुम्हरी य है अटारी-९-१००।
[सं. अष्टपाद, पा. अटठपाद, प्रा. अटठपाव]
चोंचले करना, नखरा दिखाना।
उन्मत्त होना, मस्ती दिखाना।
किसी को छेड़कर अनजान बनना।
[सं. स्थान, पा, ठान = ठहराव]
अयोग्य | कर्म। वैर, शत्रुता, झगड़ा।
[सं. स्थान = स्थिति, ठहराव, ठामना; प्रा. ठान]
[सं. अष्टादश, पा, अट्ठादस, प्रा. अट्ठारस]
दम और आठ मिलने से बनी हुई संख्या।
काव्य में पुराण सूचक संकेत या शब्द।
ढारि पासा साधु-संगति केरि रसना हारि। दाँव अबकै परयो पूरो कुमति पिछली हारि। राखि सत्ररह मुनि अठारह चोर पाँचौं मार।
चौसर की एक दाँव, पासे की एक संख्या।
[से. अष्टासीति, प्रा. अट्ठासीइ, अप. अट्ठासि]
[हिं. अठलाना ( = ऐंठ + लाना )]
ऐंठते हो, इतराते हो, ठसक दिखाते हो।
(क) नद दोहाई देत कहा तुम कंस दोहाई। काहे को अठिलात कान्ह छाँडौ लरिकाई-पृ. २३५।
(ख) बात कहत अठिलात जाति सब हँसत देति कर तारि। सूर कहा ये हम को जातै छ। छिहि बेचनहारि---१०९९।
मदोन्मत्त होती हुई, इठलाई हुई।
सूरदास प्रभु मेरो नन्हीं तुम तरुणी डोलति अठिलानी ढ़-१ ०५७।
[सं. अलु === वारण करना, हिं. अड़ना]
सहि न सकत अति विरह त्रास तन आग सलाकनि जारी। ज्यों जल थाके मीन कहा करेै ते उ हरि मेल अडारी----सा. उ. ३५ और ३२४६।
[सं. अ---नहीं == हिं. डिगना]
जो न डिगे, निश्चल, स्थिर।
[सं. अदष्ट, या अदिष्ट प्रा. अडिट्ठ]
[सं. अ = नहीं + हिं. डोलना]
[सं. अ = नहीं + हिं. डोलना]
इह उर माखन चोर गड़े। अब कैसे निकसत सुन ऊधौ तिरछे ह्व जो अड़े-३१५१।
[सं. अ = अच्छी तरह + टक् = बंधन =रोक, हिं. अढ़ूूुक]
[सं. अ = अच्छी तरह + टक् = बंधन =रोक, हिं. अढ़ूूुक]
[आ + जा = बोध कराना, आज्ञापन, या अभ्भापनं, प्रा, आणदनं]
आज्ञा देना, काम में लगाना।
जब तै तृनावतं ब्रज अयौ, तब तै मो जिय संके। वैननि ओट होत पल एको, मैं मन भरति अतंक-६० ५।
एक अलंकार जिसमें एक वस्तु का अपने निकट,की वस्तु के गुण को ग्रहण न करना दिखाया जाय।
आजु रन कोप्यौ भी मकुमार।….। बैंठे जदपि जुधिष्ठिर सामे सुनत सिखाई बात। भयौ अतदगुन सूर सरस बढ़ बली बीर बिख्यात। सा, ७४।
जिम पर तर्क-वितर्क न हो सके, अचिंत्य
अलमी जिसके फूल नीले और बहुत सुन्दर होते हैं।
(क) स्यामा स्याम सुभग जमुना-जल नि भ्रम करत विहार। …..। अतसी कुसुम कलेवर बूंदे प्रतिबिंबत निरधार-----१८४७।
(ख) आवत बन ते साँझ देखे मैं गायन माँझ काहू के ढोटा री एक सीस मोरखियाँ। अतसी कुसुम जैसे चचल दीरघ नैन मानों रस भरी जो लरति युगल अँखियाँ---२३६६।
देत नंद कान्ह अति सोवत। भूखे भए आजु बन भीतर, यह कहि कहि मुख जोवत-५ १६।
सूर स्याम मेरी अति बालक मारत ताहिं रिगाई--५१०।
यह कालीदह के फूल मॅगए, पत्र लिखा इ ताहि कर दी हौ। यह कहियौ ब्रज जाइ नंद सौं कंसराज अति काज मेगायौ----५२३।
एक अलंकार जिसमे गुणों का बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अतथ्य वर्णन किया जाता है।
सेस ना कहि सकत सोभा जान जो अति उक्त। कहै बाचिके बाचते हे कहा सूर अनुक्त--सा. ९३।
अति आतुर आरोधि अतिक दुख तोहिं कहा डर तिन यम कालहि----८९८।
छह ईतियों में से एक जिसमें पानी बहुत बरसता है।
सब यादव मिलि हरि सौं इहे कह्योै सुफलक सुत जहँ होइ। अनावृष्टि अतिवृष्टि होत नहिं इह जानत सब कोइ---१० उ.-२७।
चित चकोर-गति करि अतिसय रति, तजि स्रम सघन बिषय लोभ.-१-६९।
कह्यौ हरि कैं भय रवि-ससि फिरै। बायु वेग अतिसै नहिं करै-३-१३।
गुन अतीत, अबिगत, न जनवै। जस अपार, सुत पार न पावै---१०-३।
संगीत में सम' से दो मात्राओं के उपरांत आनेवाली स्थान।
बसी रो बन कान्ह बजावत। ......। सुर स्रुति तान बयान अमित अति सप्त अतीत अनागत आवत--..-६४८।
(क) तुरत जाइ लै आउ उहाँ , निलंब न करि मो भाई। सूरदास प्रभु ब वन सुनत हीं हनुमत चल्यौ अतुराई ९-१४९।
वाकौ सावधान करि पठ्यौ चली आपु जल कौं अतुराई-१०-८५१।
चलौ सखी, हमहूं मिलि जैऐ, नैकु करौ अतुराई-१०-२२।
(ख) कीरति महरि लिवावन आई। जाहु न स्याम करहु अतुराई-१०-७५७।
आतुर होता है। छबड़ाता है।
(क) तुरत हीं तोरि, गनि, कोरि सकटनि जोरि, ठाढ़े भए पैरिया तब सुनाए। सुनत यह बात, अनुरात और डरत मन, महल तै निकसि नृप आपु आए-५८४।
(ख) एक एक पल युगअ सबन को मिलन को अतुरात--२९५५
आतुर होना, घबड़ाना, अकुलाना।
घबड़ा गई, हड़बड़ ई, अकुलाई, जल्दी मचाने लगी।
(क) सुनत बात यह सखी अतुरानी----८ ४७।
(ख) सूर स्याम मूखधाम, राधा है जाहि नाम, आतुर पिय जानि गवन प्यारी अतुरानी।
(ग) सूर स्याम वनघाम जानि कै दरसन को अतुरानी-१८८८।
आतुर हुए, हड़ बड़कर, घबड़ाकर।
(क) कर सौं ठोंकि सुतहिं दुलरावत, चटपटाइ बैठ अतुराने---१०-१९७।
(ख) बालक बछरा धेनु सबै मन अतिहिं सकाने। अंध कार मिटि गयौ देखि जहँ तहँ अतुराने--४३२।
धेनु रही बन भूलि कहूँ ह्वै बालक, भ्रमत न पाए। यातै स्याम अतिहिं अतुराने, तुरत तहाँ उठि धए---४३६।
कै रघुनाथ अतुन बल राच्छस दसकधर डरहीं---९-९१।